Premanand Maharaj: गंगा-यमुना में सिक्के डालना सही है या गलत? प्रेमानंद महाराज ने दूर किया असमंजस

Premanand Maharaj: प्रेमानंद महाराज ने गंगा और यमुना में सिक्के डालने की परंपरा को लेकर बड़ी बात कही है. जानें क्या है इसकी सच्चाई, क्या कहता है धर्म और दान का सही तरीका क्या होना चाहिए.

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प्रेमानंद महाराज (Photo: Screengrab_YT/bhajanmarg) प्रेमानंद महाराज (Photo: Screengrab_YT/bhajanmarg)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 23 जून 2026,
  • अपडेटेड 11:49 AM IST

Premanand Maharaj: भारत समेत दुनिया भर की कई संस्कृतियों में नदियों, कुओं या झरनों में सिक्का डालकर मन्नत या इच्छा मांगने की यह परंपरा सदियों से चली आ रही है. धार्मिक नजरिए से तो इसे भगवान के प्रति श्रद्धा और अपनी मनोकामना पूरी करने की इच्छा से जोड़ा जाता है. अगर धार्मिक ग्रंथों की बात करें, तो नदियों में सिक्के डालने की कोई स्पष्ट या अनिवार्य मान्यता नहीं मिलती है. इसे अधिकतर एक व्यक्तिगत विश्वास के रूप में ही देखा जाता है, न कि धार्मिक नियम के रूप में.

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इसी को लेकर एक भक्त ने मथुरा-वृंदावन के जाने माने बाबा प्रेमानंद महाराज से सवाल किया कि क्या महाराज जी पवित्र नदियों में सिक्के डालने चाहिए?

नदियों में सिक्के डालने की परंपरा

इस पर प्रेमानंद महाराज ने उत्तर दिया कि, 'गंगा जी हो या यमुना जी हो, उनके लिए 1 रुपये का आटा ले लो और फिर उस आटे से छोटी छोटी गोलियां बनाकर नदियों में डाल दो. उससे नदियों में रह रहे जीव जैसे मछली या कछुआ, वह ये सब खा लेंगे. रुपये गंगाजी में डालने से कुछ नहीं होगा, ऐसी कोई शास्त्र आज्ञा नहीं है. ये सब मनमानी आचरण है.'

खाने की चीजें करें दान

'लोगों में आजकल अपनी मनमर्जी करना शुरू कर दिया है. सिक्के डालने से कुछ नहीं होता है. उससे हमारी नदियां सिर्फ प्रदूषित हो रही हैं. हमने केसी घाट पर देखा है कि वहां छोटे छोटे लड़के नदियों में चुंबक डालकर सारे सिक्के निकाल लेते हैं. उससे किसी का भला नहीं हो रहा है. जहां ज्यादा यात्रियों का आवागमन होता है, वहां ये लड़के पहुंच जाते हैं.'

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'अगर दान में तुम 100 रुपये देना ही चाहते हो तो 100 रुपये देने के बजाय उसका चारा खरीदकर गाय को दे दो या 100 रुपये किसी बीमार आदमी के काम में दे दो या 100 रुपये का भोजन किसी को खिला दो. ऐसा रुपये फेंकने से कुछ हासिल नहीं होगा. इसलिए, आस्था के साथ-साथ विवेक का इस्तेमाल करना भी जरूरी है, ताकि हमारी श्रद्धा का सही और सार्थक उपयोग हो सके.'

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