Garud Puran: दामाद क्यों नहीं करता अपने ससुर का अंतिम संस्कार? क्या कहता है गरुड़ पुराण

Garud Puran: अंतिम संस्कार एक धार्मिक कर्तव्य है, लेकिन उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है मृतक के प्रति सम्मान, भावना और सच्ची श्रद्धा. समय के साथ परंपराएं बदल रही हैं. आज जरूरत है उन्हें समझदारी और संवेदनशीलता के साथ अपनाने की. तो ऐसे में जानते हैं कि क्या घर का दामाद अपने ससुर का अंतिम संस्कार कर सकता है कि नहीं

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गरुड़ पुराण (Photo: ITG) गरुड़ पुराण (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 18 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 1:00 PM IST

Garud Puran: हिंदू धर्म और गरुड़ पुराण में अंतिम संस्कार बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है. मान्यता है कि सही रीति-रिवाज से किए गए संस्कार से मृतक की आत्मा को शांति मिलती है. लेकिन अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या दामाद अंतिम संस्कार कर सकता है या नहीं? तो आइए जानते हैं गरुड़ पुराण में क्या लिखा है.

अंतिम संस्कार का पारंपरिक नियम

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गरुड़ पुराण के अनुसार, अंतिम संस्कार का अधिकार आमतौर पर मृतक के सबसे निकट पुरुष सगे संबंधियों को दिया गया है जैसे पुत्र, पोता या भाई. पहले के समय में केवल पुत्र को ही मुखाग्नि देने का अधिकार माना जाता था. यहां तक कि बेटियों को भी यह अधिकार नहीं दिया जाता था. 

दामाद को लेकर क्या कहते हैं नियम?

गरुड़ पुराण के अनुसार, जहां तक दामाद का सवाल है, तो परंपरागत रूप से उन्हें अंतिम संस्कार करने का अधिकार नहीं दिया गया है. इसका मुख्य कारण सामाजिक और गोत्र संबंधी मान्यताएं हैं. हिंदू परंपरा में विवाह के बाद बेटी को पराया धन माना जाता था, और कन्यादान के बाद वह अपने पति के कुल और गोत्र से जुड़ जाती है. इस वजह से दामाद को मृतक के मूल परिवार का हिस्सा नहीं माना जाता था, और उन्हें इस धार्मिक कर्तव्य से दूर रखा जाता था.

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क्या दामाद अंतिम संस्कार कर सकता है?

आज के समय में कई चीजें बदल रही हैं. यदि परिवार में पुत्र या अन्य निकट संबंधी मौजूद न हों, तो कई समुदायों और परिवारों में दामाद को अंतिम संस्कार करने की अनुमति दी जाती है. यह पूरी तरह से परिवार की सोच और परंपरा पर निर्भर करता है. 

बेटियों को क्यों नहीं दिया जाता था अधिकार?

गरुड़ पुराण के मुताबिक, इसके पीछे यह मान्यता थी कि महिलाएं स्वभाव से कोमल होती हैं. अंतिम संस्कार जैसी कठिन प्रक्रिया को देखना उनके लिए भावनात्मक रूप से कठिन हो सकता है. लेकिन समय के साथ यह सोच बदली है. आज कई बेटियां अपने माता-पिता का अंतिम संस्कार स्वयं कर रही हैं और अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं.

बदलता समय और नई सोच

आज बेटियां भी अपने माता-पिता की जिम्मेदारी निभा रही हैं. कई परिवारों में दामाद भी बेटे की तरह भूमिका निभाता है. ऐसे में इन पुराने नियमों पर पुनर्विचार करना जरूरी हो गया है.

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