रेलवे स्टेशनों को आधुनिक बनाने की दिशा में लगेज ट्रॉली, लिफ्ट और एस्केलेटर जैसी सुविधाओं का लगातार विस्तार किया जा रहा है.इन सुविधाओं ने यात्रियों का सफर आसान बनाया है, लेकिन दूसरी ओर दशकों से स्टेशन की पहचान रहे कुलियों के सामने आजीविका का संकट गहराने लगा है. तकनीक के बढ़ते उपयोग ने उनके रोजगार पर सीधा असर डाला है और आमदनी लगातार घटती जा रही है.
रेलवे स्टेशन पर कार्यरत कुलियों का कहना है कि पहले यात्रियों का भारी सामान प्लेटफॉर्म से बाहर तक पहुंचाने का काम नियमित रूप से मिलता था, जिससे परिवार का खर्च आसानी से चल जाता था. अब अधिकांश यात्री ट्रॉली, लिफ्ट और एस्केलेटर का इस्तेमाल कर खुद ही सामान लेकर निकल जाते हैं. ऐसे में कुलियों को काम के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता है.
करौली निवासी महेश, जो कई वर्षों से स्टेशन पर कुली का कार्य कर रहे हैं, बताते हैं कि अब कुली का काम कम और पूछताछ केंद्र का काम ज्यादा रह गया है. यात्री उनसे ट्रेन, प्लेटफॉर्म और अन्य जानकारियां तो लेते हैं, लेकिन सामान उठाने की जरूरत कम ही पड़ती है. उनका कहना है कि पहले कोटा में बड़ी संख्या में विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों की आवाजाही होती थी, जिससे काम मिलता था, लेकिन अब परिस्थितियां बदल गई हैं.
कुलियों के अनुसार वर्तमान में दिनभर में मुश्किल से एक-दो ग्राहक ही मिल पाते हैं.इससे उनकी दैनिक आय घटकर महज 200 से 300 रुपये तक सिमट गई है.कई बार स्थिति ऐसी बन जाती है कि परिवार का भरण-पोषण करना भी कठिन हो जाता है.
कुलियों का कहना है कि सात-आठ वर्ष पहले तक स्टेशन पर लिफ्ट और एस्केलेटर जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं.उस समय यात्रियों को सामान ढोने के लिए कुलियों की जरूरत पड़ती थी और उनका रोजगार बेहतर चलता था.लेकिन नए स्टेशन भवन और आधुनिक सुविधाओं के विस्तार के बाद उनकी आय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है.
उन्होंने बताया कि पहले बिहार और पश्चिम बंगाल जाने वाली कई लंबी दूरी की ट्रेनों का स्टेशन पर अधिक समय तक ठहराव होता था.इस दौरान यात्रियों के सामान उठाने का पर्याप्त काम मिल जाता था, लेकिन समय के साथ परिस्थितियां बदलने से रोजगार के अवसर भी कम हो गए हैं.
स्टेशन पर कार्यरत एक अन्य कुली ने बताया कि वर्ष 2010 से इस पेशे में होने के बावजूद उनकी मासिक आय 10 से 12 हजार रुपये से अधिक नहीं पहुंच पाती. इसमें से कमरे का किराया, भोजन और अन्य जरूरी खर्च निकालने के बाद बचत लगभग नहीं के बराबर रह जाती है. देखें VIDEO:-
कुलियों ने सरकार और रेलवे प्रशासन से मांग की है कि वर्ष 2008 की तर्ज पर उन्हें रेलवे के ग्रुप-डी पदों में समायोजित किया जाए.उनका कहना है कि पहले कुछ कुलियों को ग्रुप-डी में शामिल किया गया था, लेकिन आज भी कई कुली ऐसे हैं जो वर्षों से स्टेशन पर सेवाएं दे रहे हैं और स्थायी रोजगार की प्रतीक्षा कर रहे हैं.
इसके अलावा उन्होंने बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने की भी मांग उठाई है.कुलियों का कहना है कि आधुनिक सुविधाएं यात्रियों के लिए जरूरी हैं, लेकिन स्टेशन की पहचान रहे इन श्रमिकों के रोजगार और भविष्य की सुरक्षा के लिए भी ठोस कदम उठाए जाने चाहिए, ताकि वे सम्मानजनक जीवन जी सकें.
चेतन गुर्जर