दिल्ली का जंतर-मंतर. यानी वह दहलीज़ जहां से देश का ग़ुस्सा अपने हुक्मरानों से फ़रियाद करता है. ये फ़रियादें दराबर के किस हिस्से तक पहुंचने में कामयाब होती हैं. इसी बात से फ़रियाद के क़द और उसकी हैसियत का अंदाज़ा लगाया जाता है. लेकिन इस बार चोट थोड़ी गहरी है. इस बार जंतर मंतर पर ग़म और ग़ुस्से का अजीब संगम है. किसी को छत्रों और आम लोगों का त्योहार देखना हो तो उसे जंतर मंतर का नज़ारा ज़रूर करना चाहिए.