तुम्हीं से बगावत, नेता तुम्हीं हो... ममता बनर्जी के नाम से क्यों ‘चिपके’ हुए हैं TMC के बागी विधायक, क्या हैं कानूनी मजबूरियां

बंगाल विधानसभा नतीजों के बाद टीएमसी विधायकों ने बगावत कर दी है. लेकिन, इसका दिलचस्प पहलू ये है कि न तो वे अपनी अलग पार्टी बना रहे हैं, और न ही किसी दूसरी पार्टी में अपना विलय कर रहे हैं. बल्कि, ऋतब्रत बनर्जी तो अब भी ममता बनर्जी को ही अपना ‘मार्गदर्शक’ कह रहे हैं. आखिर, इन बागी विधायकों की ऐसी क्या रणनीति है, या वे किन कानूनी मजबूरियों के चलते ऐसा कर रहे हैं?

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TMC के बागी विधायक यदि ममता बनर्जी को अपना ‘मार्गदर्शक’ कह रहे हैं, तो ये उनकी भावना नहीं, कानूनी मजबूरी है. TMC के बागी विधायक यदि ममता बनर्जी को अपना ‘मार्गदर्शक’ कह रहे हैं, तो ये उनकी भावना नहीं, कानूनी मजबूरी है.

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 09 जून 2026,
  • अपडेटेड 3:33 PM IST

पश्चिम बंगाल की राजनीति में चल रहा हाई-वोल्टेज ड्रामा अब एक बेहद दिलचस्प और ऐतिहासिक मोड़ पर पहुंच गया है. विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) रथींद्र बोस ने एक बड़ा फैसला लेते हुए तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बागी गुट के नेता ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में 'नेता प्रतिपक्ष' (LoP) के रूप में मान्यता दे दी है. इसके बीच सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि ये बागी विधायक न तो कोई नई पार्टी बना रहे हैं और न ही किसी दूसरी पार्टी में शामिल हो रहे हैं. उलटे, वे ममता बनर्जी को ही अपना ’मार्गदर्शक’ (एडवाइजर) बता रहे हैं.

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ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि जब विधायक अपनी ही पार्टी के फैसलों के खिलाफ हैं, तो वे अपनी अलग पार्टी क्यों नहीं बना लेते? ममता बनर्जी का नाम बार-बार क्यों लिया जा रहा है? दरअसल, इस राजनीतिक पैंतरेबाज़ी के पीछे इन विधायकों का तृणमूल या ममता से कोई भावनात्मक लगाव नहीं, बल्कि देश का कानून और संविधान की जटिलताएं हैं. आइए इन बागी विधायकों की पूरी रणनीति और उनकी मजबूरी को समझते हैं.

हालिया घटनाक्रम में टीएमसी के 80 विधायकों में से लगभग 59 विधायकों ने बगावत का झंडा बुलंद करते हुए ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता बनाने की मांग की थी. स्पीकर के इस नए फैसले के बाद अब हर कोई हैरान है.

पैंतरेबाजी की असली वजह: ममता बनर्जी को ही नेता क्यों बता रहे हैं बागी?

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इस पूरे विवाद की शुरुआत 19 मई को टीएमसी विधायक की बैठक के बाद से हुई. अव्वल तो कई विधायक इस बैठक में पहुंचे नहीं, लेकिन जब बाद में उन्हें पता चला कि अभिषेक बनर्जी ने कथित तौर पर कुछ अनुपस्थित विधायकों के हस्ताक्षर करवाकर नेता प्रतिपक्ष के नाम का प्रस्ताव बंगाल विधानसभा स्पीकर को भेजा है, तो बवाल मच गया. अभिषेक के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवा दी गई. इसके नतीजे में ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी से निकाल दिया. इसके बावजूद टीएमसी के बागी विधायकों ने सिर्फ अभिषेक बनर्जी के खिलाफ मोर्चा खोला, ममता बनर्जी को लेकर वे सॉफ्ट बने रहे. उनके इस ’मध्यम मार्ग’ के पीछे रणनीति अब सामने आ रही है:

गद्दार के टैग से बचना: पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का पूरा वजूद ममता बनर्जी के चेहरे पर टिका है. बागी विधायक अच्छी तरह जानते हैं कि अगर वे ममता बनर्जी का सीधा विरोध करेंगे, तो जनता उन्हें 'गद्दार' मान सकती है और उनकी राजनीति खत्म कर सकती है. उनके पास यह बताने की वजह नहीं है कि ऐसा क्या हुआ जो सवा महीने पहले तक ममता बनर्जी उनकी नेता थी, और अब नहीं हैं. इसलिए वे यह संदेश दे रहे हैं कि हम ममता दीदी के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि पार्टी को कंपनी की तरह चलाने वाले अभिषेक बनर्जी और उनके जैसे कुछ चुनिंदा नेताओं के खिलाफ हैं.

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असली टीएमसी पर दावा ठोकना: बागी विधायकों की कोशिश कोई नया दल बनाने की नहीं है. वे खुद को ’असली तृणमूल कांग्रेस’ साबित करना चाहते हैं. स्पीकर द्वारा ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष की मान्यता दिए जाने के बाद अब बागी गुट का यह दावा और मजबूत हो गया है कि विधानसभा के भीतर उनका गुट ही असली पार्टी का प्रतिनिधित्व कर रहा है, क्योंकि उनके पास बहुमत है.

कानूनी और संवैधानिक मजबूरियां: दल-बदल विरोधी कानून का चक्रव्यूह

अगर ये बागी विधायक अपनी अलग पार्टी बनाना चाहें, तो संविधान की दसवीं अनुसूची, जिसे हम 'दल-बदल विरोधी कानून' (Anti-Defection Law) कहते हैं, उनकी सदस्यता रद्द करवा सकती है. इस कानून को 1985 में इसीलिए लाया गया था ताकि पैसे या पद के लालच में विधायकों-सांसदों के पाला बदलने की राजनीति को रोका जा सके.

इस कानून के तहत कोई भी बागी विधायक अपनी मर्जी से कदम नहीं उठा सकता. इसके मुख्य नियम इस प्रकार हैं:

अलग होने या 'विभाजन' का नियम खत्म: साल 2003 से पहले इस कानून में एक नियम था कि अगर किसी पार्टी के एक-तिहाई विधायक अलग गुट बना लेते हैं, तो उनकी विधायकी नहीं जाएगी. लेकिन 91वें संविधान संशोधन (2003) के जरिए इस 'विभाजन' वाले नियम को पूरी तरह खत्म कर दिया गया. यानी, अब कोई भी गुट केवल अलग होने के नाम पर अपनी सदस्यता नहीं बचा सकता.

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केवल विलय (Merger) को ही मंजूरी: मौजूदा कानून के मुताबिक, बागी विधायकों की सदस्यता तभी बच सकती है जब उनकी मूल राजनैतिक पार्टी किसी दूसरी पार्टी में 'विलय' (मर्जर) कर ले. इसके लिए शर्त यह है कि सदन में मौजूद उस पार्टी के कम से कम दो-तिहाई विधायक इस विलय के समर्थन में हों.

टीएमसी के पास वर्तमान में विधानसभा में कुल 80 विधायक हैं. दल-बदल कानून के तहत किसी भी कार्रवाई से बचने और दो-तिहाई का आंकड़ा पार करने के लिए कम से कम 54 विधायकों का एक साथ होना जरूरी है. बागी गुट के पास 58 से 59 विधायकों का समर्थन है, जो कानूनी रूप से दो-तिहाई के आंकड़े से ज्यादा है. लेकिन वे किसी दूसरी पार्टी में शामिल नहीं हो रहे हैं, क्योंकि ऐसा करने के लिए संगठन के स्तर पर विलय की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए, जो कि संगठन पर ममता बनर्जी के नियंत्रण के कारण संभव नहीं है. इसीलिए वे खुद को मूल पार्टी का हिस्सा बता रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट के बड़े फैसले जो बागियों की राह में रोड़ा बन सकते हैं

भले ही स्पीकर रथेंद्र बोस ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दे दी हो, लेकिन बागी विधायकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती सुप्रीम कोर्ट द्वारा समय-समय पर दिए गए कड़े फैसले हैं. टीएमसी के आधिकारिक नेतृत्व ने अब इन फैसलों को आधार बनाकर कलकत्ता हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने के स्पीकर के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी है. आइये, टीएमसी की इस बगावत के कानूनी पहलू को समझते हैं:

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सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र राज्यपाल (2023 - शिवसेना विवाद): महाराष्ट्र के राजनैतिक संकट के दौरान सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला दिया था. अदालत ने साफ किया था कि 'मूल राजनीतिक दल' और 'विधायक दल' दो अलग-अलग चीजें हैं. इसका मतलब यह है कि विधानसभा के भीतर बैठे विधायक खुद को पार्टी का मालिक नहीं समझ सकते. व्हिप (पार्टी का आधिकारिक निर्देश) जारी करने और फैसले लेने का असली अधिकार मूल राजनीतिक संगठन और उसके अध्यक्ष के पास ही रहता है. इस फैसले के आधार पर, टीएमसी नेतृत्व यह तर्क दे सकता है कि विधायकों का बहुमत होने के बावजूद वे पार्टी के आधिकारिक फैसले को नहीं बदल सकते.

राजेंद्र सिंह राणा बनाम स्वामी प्रसाद मौर्य (2007): इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) को यह अधिकार नहीं है कि वह मनमर्जी से किसी भी बागी गुट को सीधे 'विभाजन' या 'विलय' के आधार पर नई पार्टी या गुट के रूप में मान्यता दे दे. जब तक जमीनी स्तर पर मूल राजनीतिक पार्टी का फैसला नहीं होता, तब तक केवल विधायकों का दस्तखत कर देना कानूनी रूप से काफी नहीं है.

रवि नाइक बनाम भारत सरकार (1994): इस ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि दल-बदल साबित करने के लिए किसी विधायक का लिखित इस्तीफा देना ही जरूरी नहीं है. अगर किसी विधायक की गतिविधियां अपनी ही पार्टी के आधिकारिक नेतृत्व और उसकी नीतियों के खिलाफ पाई जाती हैं, तो उसे भी 'स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ना' माना जाएगा और उसकी सदस्यता रद्द की जा सकती है.

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इसके अलावा, हाल ही में वर्ष 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने दोबारा स्पष्ट किया है कि दल-बदल कानून के तहत विधायकों का दो-तिहाई बहुमत केवल एक 'सत्यापन' (वेरिफिकेशन) का जरिया है. असली विलय या बदलाव तभी माना जाएगा जब मूल राजनैतिक संगठन भी इसके लिए राजी हो. हालांकि, बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा बेंच ने पूर्व में दो-तिहाई विधायकों के पाला बदलने को वैध माना था, लेकिन उन मामलों की अंतिम वैधता भी अब सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अधीन है.

स्पीकर रथींद्र बोस द्वारा ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष की मान्यता दिए जाने के बाद बागी गुट ने पहली बाजी भले ही जीत ली हो, लेकिन कानूनी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है. टीएमसी के बागी विधायक बहुत फूंक-फूंककर कदम रख रहे हैं. वे जानते हैं कि अगर उन्होंने नई पार्टी बनाई या सीधे किसी अन्य दल का दामन थामा, तो सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों की नजर से उनकी विधायकी तुरंत रद्द हो सकती है. यही वजह है कि वे कानूनी सुरक्षा कवच के रूप में ममता बनर्जी का नाम ले रहे हैं.

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