औरंगजेब समर्थक और राणा सांगा विरोधी के साथ खड़े होकर क्यों फंस गए हैं अखिलेश यादव?

कभी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की रीढ़ हुआ करते थे राजपूत. अखिलेश यादव के मंत्रिमंडल में 11 राजपूतों का होना इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है. घोसी उपचुनाव में भी वहां के राजपूतों ने बीजेपी के बजाए सपा को वोट देना उचित समझा था. पर क्या राणा सांगा का अपमान राजपूत बर्दाश्त करेंगे?

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समाजवादी पार्टी के मुखिया पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेय यादव समाजवादी पार्टी के मुखिया पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेय यादव

संयम श्रीवास्तव

  • नई दिल्ली,
  • 24 मार्च 2025,
  • अपडेटेड 5:55 PM IST

पिछले कुछ दिनों समाजवादी पार्टी के मुखिया और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव लगातार सेल्फ गोल कर रहे हैं. या तो वह ऐसा जानबूझकर कर रहे हैं या उत्तर प्रदेश की जनता की नब्ज को अभी वो ठीक से समझ नहीं सके हैं. वरना पहले औरंगजेब और अब राणा सांगा के अपमान के मुद्दे पर जिस तरह का रुख उन्होंने अपनाया वो उनके जैसे कद्दावर नेता के लिए असंभव था. 

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राजधानी लखनऊ में रविवार को सपा मुखिया अखिलेश यादव ने राणा सांगा पर दिए राज्यसभा सांसद रामजीलाल सुमन के विवादित बयान का समर्थन किया. उन्होंने कहा कि यदि भाजपा नेता औरंगजेब पर चर्चा करने के लिए इतिहास को पलट सकते हैं, तो रामजीलाल सुमन ने भी इतिहास के एक पन्ने का जिक्र किया है. सांसद रामजी लाल सुमन ने 21 मार्च को राज्यसभा में बोलते हुए राणा सांगा को 'गद्दार' करार दिया था. तब से राजनीतिक पार्टियों के बीच इस मुद्दे को लेकर जबरदस्त बहस छिड़ गई है. समाजवादी पार्टी जहां अपनी मुस्लिम और दलित -पिछड़ा समर्थक बनाए रखना चाहती है वहीं बीजेपी समाजवादी पार्टी की छद्म धर्मनिरपेक्षता को बेनकाब करने के लिए दिन रात एक किए हुए है. भाजपा ने अखिलेश को निशाने पर लेते हुए कहा कि यह पूरे हिंदू समुदाय का अपमान है.

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स्वामी प्रसाद मौर्य की तरह डैमेज करेंगे सुमन

उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित और पिछड़ी राजीनीति के एक अहम प्यादे रहे हैं स्वामी प्रसाद मौर्य.बीएसपी की राजनीति करते हुए चर्चा में आए स्वामी प्रसाद वाया बीजेपी होते हुए समाजवादी पार्टी में पहुंचे थे. समाजवादी पार्टी में रहते हुए इन्होंने सवर्ण हिंदुओं और हिंदू देवी देवताओं पर ऐसी टिप्पणियां की थीं कि किसी दूसरे धर्म के रहे होते तो लिंचिंग हो गई होती. स्वामी प्रसाद हिंदुओं के खिलाफ जहर उगलते रहे और उनकी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव उन्हें शह देते रहे. जाहिर है कि अखिलेश को लगता था कि पिछड़ों और मुसलमानों को साधे रखने के लिए स्वामी प्रसाद जो कर रहे हैं उस पर रोक लगाना ठीक नहीं होगा. पर बाद में स्थितियां और खराब हो गईं और अखिलेश को स्वामी प्रसाद से छुटकारा पाना पड़ा.

2024 के लोकसभा चुनावों में अखिलेश को मिली सफलता बताती है कि स्वामी प्रसाद को किनारे करने का फैसला सही साबित हुआ.हो सकता है कि अखिलेश स्वामी प्रसाद को और पहले बाहर का रास्ता दिखाये होते तो बीजेपी को और नुकसान पहुंचाने में सफल हुए होते. पर शायद अखिलेश न तब समझे न अब समझ रहे हैं. पहले औरंगजेब पर अबू आजमी को समर्थन और अब  राणा सांगा को देशद्रोही बताने वाले सांसद रामजी लाल सुमन की बातों का खंडन न करके उन्होंने जानबूझकर मुसीबत मोल ली है. आने वालों दिनों में एक बार फिर अखिलेश यादव को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी.

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राजपूतों में समाजवादी पार्टी की अच्छी खासी पैठ, क्या अखिलेश को उनकी चिंता नहीं

आज बीजेपी के साथ जा चुका राजपूत वोट कभी बड़ी संख्या में समाजवादी पार्टी का हिस्सा होता था. यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खुद राजपूत बिरादरी से होने के बावजूद राजपूत समाजवादी पार्टी को वोट अभी पिछले 4 चुनावों में भी दिए हैं.  2003 में बीजेपी और बसपा का गठबंधन टूटने के बाद मायावती ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था. इसके बाद योगेश प्रताप सिंह और राजेश सिंह राणा के नेतृत्व में बसपा के 13 विधायकों ने मुलायम सिंह यादव का समर्थन कर उनकी सरकार बनवा दी.

2012 के चुनाव तक भी क्षत्रिय वोट पर सपा की पकड़ मजबूत थी. अखिलेश मंत्रिमंडल में थे 11 ठाकुर इस बात के सबूत थे कि समाजवादी पार्टी को राजूपत वोटों पर भरोसा रहा है. अखिलेश सरकार में रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया, विनोद कुमार सिंह उर्फ पंडित सिंह, अरविंद सिंह गोप, राधे श्याम सिंह, राजा आनंद सिंह, योगेश प्रताप सिंह, राजा महेंद्र अरिदमन सिंह समेत कुल 11 ठाकुर मंत्री थे. आज की तस्वीर देखें तो इनमें से कुछ नेता ही सपा के साथ बचे हैं. समाजवादी पार्टी का हिंदू विरोधी रवैया, सवर्णों को गाली देते सपा नेताओं के चलते राजपूत नेताओं ने अपनी अलग राह पकड़ ली. 

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राजा भैया ने अपनी पार्टी बना ली तो कुछ नेताओं ने बीजेपी का दामन थाम लिया. पर समाजवादी पार्टी अपने पुराने परंपरागत वोट को फिर से वापस लाने के लिए प्रयासरत नहीं दिख रही है. 2027 के विधानसभा चुनावों तक बीजेपी और योगी को लेकर जनता में जो निराशा पैदा होगा उसे अखिलेश कैश करा सकते हैं. पर जिस तरह अखिलेश अपने दुश्मन बना रहे हैं उससे तो यही लगता है कि अगला चुनाव भी वो अपने हाथ से निकल जाने देंगे.

अखिलेश यादव सभी वर्गों के नेता बनकर उभर रहे थे

अखिलेश यादव को यह समझना चाहिए कि 2024 लोकसभा चुनावों में मिली सफलता केवल पिछड़े और दलित-मुसलमान के समर्थन मिलने के चलते नहीं हुई थी. इसमें बहुत बड़ी संख्या के रूप में सवर्णों का वोट भी शामिल था. गुजरात के मंत्री पुरुषोत्तम रूपाला के मामूली बयान से नाराज एक बयान को लेकर उत्तर प्रदेश के हर जिले में राजपूतों ने समाजवादी पार्टी को वोट देने की कसमें खाईं थीं.

इतना ही नहीं घोसी विधानसभा का उपचुनाप याद करिए योगी आदित्यनाथ की नाक का सवाल होते हुए भी यहां के राजपूतों ने बीजेपी के बजाय समाजवादी पार्टी को वोट दिया था. दारा सिंह चौहान की जीत यहां सुनिश्चित लग रही थी पर कहा जाता है कि राजपूतों ने बीजेपी को वोट नहीं दिया.यह सीधा संदेश है कि राजपूत जरूरत होने पर समाजवादी पार्टी को वोट देते रहे हैं.

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कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि अखिलेश यादव के विकास कार्यों को लेकर देश के सवर्ण युवा भी उनके प्रशंसक हैं. रामजी लाल सुमन जैसे लोग पहले भी अखिलेश का काम बिगाड़ते रहे हैं. राणा सांगा के मुद्दे पर अखिलेश यादव ने जो रुख दिखाया है उससे राजपूत वोटों में उनकी सेंधमारी कम होने से कोई रोक नहीं पाएगा.

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