सतलुज पार 'मुखब‍िर' कुत्‍तों का कत्‍लेआम, खाल‍िस्‍तानियों के दौर में गुनाह था उनका भौंकना

द‍िलजीत दोसांझ की फ‍िल्‍म सतलुज कथ‍ित पुल‍िस ज्‍यादती से पंजाब में मारे गए अनाम लोगों के ल‍िए न्‍याय मांगती है. जबक‍ि, इसके दूसरी ओर कई आवाजें हैं जो खाल‍िस्‍तानी आतंकवाद का श‍िकार हुए लोगों के ल‍िए यही गुहार लगाती हैं. लेक‍िन, न्‍याय की इस लड़ाई में भुला द‍िए जाते हैं पंजाब के कुत्‍ते. ज‍िनका कत्‍लेआम खाल‍िस्‍तानी आतंकवाद का बेहद क्रूर और अमानवीय चेहरा है.

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खालिस्तानी आतंकियों के फरमान पर मार दिए गए पंजाब के हजारों कुत्ते भी एक ‘सतलुज’ जैसी दास्तान का हक रखते हैं. (फोटो में दूसरा दृश्य चौथी कूट फिल्म से) खालिस्तानी आतंकियों के फरमान पर मार दिए गए पंजाब के हजारों कुत्ते भी एक ‘सतलुज’ जैसी दास्तान का हक रखते हैं. (फोटो में दूसरा दृश्य चौथी कूट फिल्म से)

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 13 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 7:43 AM IST

द‍िलजीत दोसांझ की फ‍िल्‍म सतलुज 1990 के दौर में पुल‍िस की कथ‍ित ज्‍यादती से पंजाब में मारे गए अनाम स‍िखों और उनके ल‍िए न्‍याय मांगने वाले जसवंत स‍िंह खालड़ा की कहानी कहती है. खाल‍िस्‍तानी आतंकवाद के दौर में मौतों का ह‍िसाब-क‍िताब मोटे तौर पर तीन कैटेगरी में होता है- आम लोग, पुल‍िसकर्मी और आतंकी. फ‍िर और भी सब-कैटेगरी हैं, जैसे क‍ितने ह‍िंदू मरे, क‍ितने स‍िख, क‍ितने नामधारी, क‍ितने पत्रकार, क‍ितने नेता, क‍ितने जज, आद‍ि-आदि. लेक‍िन, न्‍याय की इस लड़ाई में एक बेगुनाह प्राणी हमेशा छूट जाता है- पंजाब का कुत्‍ता. खाल‍िस्‍तान‍ियों के फरमान से पंजाब में अनग‍िनत कुत्‍ते कत्‍ल कर द‍िए गए थे. आतंक‍ियों की कुत्‍तों से दुश्‍मनी मानवता की सबसे दर्दनाक दास्‍तानों में से एक है.

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वो खौफनाक दृश्‍य

खाल‍िस्‍तानी आतंकवाद का चरम झेल रहे पंजाब के गांव की एक सहमी रात. आतंकवादियों के हमले और पुलिस की कार्रवाई के बीच गांव का सन्‍नाटा भी डर का कारण बना हुआ है. हर लम्‍हा क‍िसी न क‍िसी अन‍िष्‍ट की आशंका से भरा है. ऐसे में गांव का एक कुत्ता भौंकने लगता है.

उसका भौंकना सामान्य नहीं लगता. गांव के लोगों को डर है कि कहीं उसकी आवाज सुनकर पुलिस या सीआरपीएफ गांव में न आ जाए. दूसरी ओर, यह भी डर है कि अगर आतंक‍ियों को लगा कि कुत्ता उनके आने-जाने का संकेत दे रहा है, तो वे गांव वालों को दुश्‍मन मान लेंगे. यानी एक कुत्ते का साधारण भौंकना भी उस माहौल में यमराज का बुलावा समझा जाता है.

गांव के लोग पहले उसे चुप कराने की कोशिश करते हैं. कोई उसे डांटता है, कोई पत्थर फेंकता है, कोई पुचकारता है. लेकिन कुत्ता अपनी प्रवृत्ति के मुताब‍िक भौंकता जाता है. वह इस बात से अंजान है क‍ि इंसानों की दुनिया में भय के कारण सामान्य जीवन के नियम बदल गए हैं.

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गांव वालों की बेचैनी बढ़ती जाती है. अब कुत्ता उन्हें अपना वफादार साथी नहीं, बल्कि खतरा लगने लगता है. अंततः उसे किसी तरह गांव से दूर भगाने या उससे छुटकारा पाने की कोशिश की जाती है, ताकि उसकी आवाज गांव के लिए मुसीबत न बन जाए.

कुत्ता किसी पक्ष में नहीं है. वह न पुलिस का है, न आतंक‍ियों का. वह केवल वही कर रहा है जिसके लिए प्रकृति ने उसे बनाया है- अनजान आहट पर भौंकना. आख‍िर में वो इस हिंसा और अविश्वास के माहौल का शिकार बन जाता है.

-ये दृश्‍य है पंजाबी लेखक वरयाम स‍िंह संधू की मशहूर कहानी चौथी कूट (चौथी द‍िशा) का. जिसे सन् 2000 में साह‍ित्‍य अकादमी पुरस्‍कार म‍िला था.

खालिस्तानी दौर के आतंक को रेखांकित करती वरयाम सिंह संधू की किताब ‘चौथी कूट’ मानवीय दर्द का जीता जागता दस्तावेज है.

एक सच्‍ची कहानी का हवाला

2015 में डायरेक्‍टर गुरव‍िंदर स‍िंह ने ‘चौथी कूट’ नाम से ही एक पंजाबी मूवी भी बनाई है. ये कहानी किसी कल्पना पर नहीं, बल्कि संधू साहब के अपने भाई के परिवार के साथ घटी एक बेहद दर्दनाक और सच्ची घटना पर आधारित है.

वरयाम सिंह संधू उस दौर को याद करते हुए एक इंटरव्‍यू में बताते हैं, 'मेरे भाई, उनकी पत्नी और बच्चे अपने दो पालतू कुत्तों से बेतहाशा प्यार करते थे. लेकिन एक दिन खाल‍िस्‍तान‍ियों की तरफ से फरमान आया कि इन कुत्तों को तुरंत मार दो. काम आसान करने के ल‍िए वे परिवार को सायनाइड के कैप्सूल दे गए, जिसे दही में मिलाकर उन कुत्तों को खिलाना पड़ा. इंसान और जानवर के बीच जीवन के इस क्रूर चुनाव में, अंततः जानवर हार गया. इस घटना ने मुझे जो दर्द दिया, वह राजनीति और सांप्रदायिक पहचान की लड़ाई से कहीं आगे मानवता के खत्म होने का दर्द था.'

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ग्राउंड र‍िपोर्ट की गवाही

1991 में इंडिया टुडे मैगजीन के लिए पंजाब की म‍िल‍िटेंसी को कवर कर रहे वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता की स्‍पेशल ग्राउंड रिपोर्ट ‘द रूल ऑफ द गन’ (The Rule of the Gun) इस त्रासदी की पुष्टि करती है. 15 जून, 1991 के अंक में वे लिखते हैं:

'आतंक का सीधा संबंध सूर्यास्त के बाद पसरे खौफनाक सन्नाटे से था. उस दौर में कुत्ते भी पूरी तरह शांत करा दिए गए थे. कई गोलियों से उड़ा दिए गए थे, तो कई को जहर देकर मार दिया गया था. और यह काम ज्यादातर उनके अपने मालिकों ने ही किया था. आतंक‍ियों का साफ नियम था क‍ि अगर वे आपकी गली या सड़क से गुजर रहे हैं और आपके कुत्ते ने एक हल्की सी कूं-कूं भी कर दी, तो वे कुत्ते को छोड़कर सीधे आपको ही गोली मार देंगे.'

दरअसर, खाल‍िस्‍तान‍ियों की नजर में ये कुत्ते 'सुरक्षाबलों के अनौपचारिक मुखबिर' थे. रात के अंधेरे में जब सुरक्षाबलों की गश्त होती या आतंकी छिपने के लिए गांवों की तरफ भागते, तो कुत्तों का भौंकना उनकी मौजूदगी को उजागर कर देता था. अपनी पहचान और अपनी मूवमेंट को गुप्त रखने के लिए उग्रवादियों ने पूरे पंजाब के गांवों में कुत्तों को खत्म करने का अभियान चला रखा था. ये बेजुबान अचानक अपनी वफादारी की सबसे भयानक कीमत चुका रहे थे. दुर्भाग्‍य ये है क‍ि उनकी लाशों को कोई 'सतलुज' नसीब नहीं हुई.

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कुत्‍तों के अलावा और क्‍या-क्‍या खामोश हुआ

अपने उत्‍सव, भांगड़े, गिद्दे और लाऊड म्‍यूज‍िक के लिए मशहूर पंजाब की रातें सिर्फ कुत्तों के मारे जाने से ही खामोश नहीं हुई थीं. इस खामोशी के पीछे खालिस्तानी आतंक‍ियों द्वारा 'सोशल रिफॉर्म' (सामाजिक सुधार) के नाम पर थोपे गए क्रूर कायदे-कानून थे.

1987 में, 'खालिस्तान कमांडो फोर्स' के तथाकथित चीफ जनरल लाभ सिंह और 'सिख स्टूडेंट्स फेडरेशन' के अध्यक्ष गुरजीत सिंह हरीहर झोक ने मिलकर पंजाब में एक 'समाज सुधार लहर' की शुरुआत की. इस आंदोलन का मकसद सामाजिक शुचिता के नाम पर बंदूक की नोंक पर लोगों के रहन-सहन और संस्कृति को कंट्रोल करना था. तय कर दिया गया था कि किसी भी प्रकार का आधुनिक मनोरंजन या संगीत प्रतिबंधित रहेगा. इस दमनकारी 'सोशल रिफॉर्म' का पंजाब के जनजीवन पर असर बहुत गहरा हुआ:

शाद‍ियों से जश्‍न गायब: खालिस्तान कमांडो फोर्स जैसे गुटों ने कड़े फरमान जारी कर शादियों और सार्वजनिक समारोहों में तेज म्‍यूज‍िक, ढोल और डांस परफॉर्मेंस को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया. शादियां केवल दिन के उजाले में और बेहद कड़े धार्मिक अनुशासन के दायरे में ही हो सकती थीं.

कलाकारों के स्‍टेज शो बंद: इस फरमान का सबसे डरावना चेहरा तब सामने आया, जब 1988 में पंजाब के सबसे लोकप्रिय लोक गायक अमर सिंह चमकीला और उनकी पत्नी अमरजोत की सरेआम गोलियों से भूनकर हत्या कर दी गई. खाल‍िस्‍तान‍ियों का मानना था कि उनके गीत सिख विचारधारा के खिलाफ थे. इस हत्याकांड के बाद समूचे म्यूजिक इंडस्ट्री में ऐसा खौफ पसरा कि रेडियो और कैसेट प्लेयर पूरी तरह खामोश हो गए.

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रातों का स्‍वघोषित कर्फ्यू: रात में होने वाले खूनखराबे से बचने के लिए समूचे पंजाब में सूरज ढलते ही एक अघोषित कर्फ्यू लग जाता था. लोग द‍िन में कहीं भी जाएं, शाम होने से पहले खुद को घरों में कैद कर लेते थे. रात में किसी भी मोटरसाइकिल या गाड़ी की दूर से आती आवाज लोगों की धड़कनें बढ़ा देती थी, कि न जाने आज मौत किसके दरवाजे दस्तक देने आ रही है.

धार्मिक और वैचारिक बंदिशें: आम लोक संगीत, गीतों या टीवी-रेडियो पर मनोरंजन को पूरी तरह से बैन कर दिया गया था. सार्वजनिक और निजी स्थानों पर केवल धार्मिक या खाल‍िस्‍तानी विचारधारा को बढ़ावा देने वाले क्रांतिकारी गीतों को ही बजाने की छूट थी.  'जन-गण-मन' गाने पर भी पाबंदी लगा दी गई थी.

इन बंद‍िशों के बारे में पढ़कर हो सकता है क‍ि आपको ताल‍िबानी फरमान याद आ जाएं, जो उन्‍होंने बाद में अफगान‍िस्‍तान में लागू क‍िए गए. पंजाब का वह दौर इस बात का गवाह है कि बंदूक के कानून ने कैसे समाज की जीवंतता छीन ली थी. हर कोई शक के दायरे में था. जान का खतरा सबको था. लेक‍िन, एक मासूम जीव इस उथल-पुथल को समझ नहीं पाया.

पंजाब के कुत्तों की खामोश मौत, उस दौर के अनकहे दर्द की कहानी है, जिसका हिसाब आज भी इतिहास की किताबों में दर्ज होना बाकी है. अपने-अपने एजेंडे के ह‍िसाब से सबने हताहतों की सूची बना रखी है. द‍िलजीत दोसांझ की 'सतलुज' अनाम लाशों के अंत‍िम संस्‍कार की कहानी कहती है और उनकी आवाज उठाने वाले जसवंत स‍िंह खलड़ा के ल‍िए जस्‍ट‍िस मांगती है. काश क‍ि पंजाब के उन मरहूम कुत्‍तों को न्‍याय द‍िलाने के ल‍िए भी कोई सतलुज ल‍िखी जाती.

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