नसीमुद्दीन सिद्दीकी के कांग्रेस छोड़ने से राहुल गांधी को यूपी में कितना फर्क पड़ेगा?

कांग्रेस से नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने समर्थकों के साथ इस्तीफा दे दिया है. करीब एक साल बाद, 2027 में यूपी विधानसभा के लिए चुनाव होने वाले हैं. नसीमुद्दीन सिद्दीकी का अगला कदम क्या होगा, ये बताने के लिए चार दिन की मोहलत ली है.

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2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया है. (Photo: ITG) 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया है. (Photo: ITG)

मृगांक शेखर

  • नई दिल्ली,
  • 27 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 2:04 PM IST

नसीमुद्दीन सिद्दीकी बीएसपी के बाद कुछ दिनों के लिए ब्रेक पर थे. अपनी पार्टी बनाकर खुद और अपने समर्थकों को प्रासंगिक बनाए रखने की कोशिश की, और नए सिरे से बात बनते ही कांग्रेस के हो गए - लेकिन जब कांग्रेस से भी जी भर गया, तो वहां भी अलविदा कह दिया. समर्थकों के साथ ही इस्तीफा दिया है. 

और, ये नसीमुद्दीन सिद्दीकी का सपोर्ट बेस ही है, जो अब भी उनको प्रासंगिक बनाए हुए है, तब भी जबकि बरसों से वो कहीं कोई करिश्मा नहीं दिखा सके हैं. नसीमुद्दीन सिद्दीकी से कांग्रेस को कोई खास फायदा तो नहीं मिला, लेकिन उनके पार्टी छोड़ने के बाद काफी नुकसान की आशंका जताई जा रही है. तभी तो यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय की तरफ से उनको मनाने के प्रयास किए जाने की खबर आई है. 

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नसीमुद्दीन सिद्दीकी के कांग्रेस छोड़ने की खबर दो दिन पहले ही आई है. और, इस्तीफा तीन दिन पहले दिया है. इस्तीफे वाली चिट्ठी पर 24 जनवरी, 2026 की तारीख लिखी है. मीडिया के पूछने पर नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने चार दिन की मोहलत मांगी है. 

जब तक नसीमुद्दीन सिद्दीकी की तरफ से नया ऐलान नहीं हो जाता, तब तक उनके बीएसपी में लौटने और समाजवादी पार्टी में शामिल होने से लेकर भीम आर्मी वाले चंद्रशेखर आजाद के साथ जाने के भी कयास लगाए जा रहे हैं - और फिरसे अपनी नई पार्टी बना लेने के विकल्प तो हमेशा ही खुला रहता है. 

मुस्लिम नेता और वोट बैंक पर प्रभाव 

बीएसपी के बाद नसीमुद्दीन सिद्दीकी के लिए कांग्रेस ही विकल्प थी. क्योंकि समाजवादी पार्टी में तो मोहम्मद आजम खान जैसे नेता पहले से ही दबदबा बनाए हुए थे. अब वो बात भले न रही हो, लेकिन समाजवादी पार्टी नेतृत्व के लिए आजम खान को नजरअंदाज करना अब भी मुश्किल है. फिर भी कानूनी पचड़ों में उनके बुरी तरह फंस जाने के बाद कुछ न कुछ स्कोप तो बनता ही है. 

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कांग्रेस में भी माना जा रहा है कि सहारनपुर सांसद इमरान मसूद का कद काफी बढ़ चुका है. वो प्रियंका गांधी के करीबियों में शामिल किए जाने लगे हैं. और इमरान प्रतापगढ़ी का अपना ही दबदबा है. उनकी राहुल गांधी के दरबार में धाक बनी हुई है - जो माहौल बन रहा था, 2027 विधानसभा चुनाव का वक्त नजदीक आने के साथ साथ नसीमुद्दीन सिद्दीकी कांग्रेस में अपने भविष्य को लेकर परेशान बताए जा रहे थे. 

बीएसपी के संस्थापक कांशीराम के जमाने से पार्टी से जुड़े नसीमुद्दीन सिद्दीकी का यूपी की राजनीति में काफी प्रभाव रहा है. 2007 में मायावती ने जब दलित और ब्राह्मणों की सोशल इंजीनियरिंग के साथ बीएसपी की सरकार बनाई थी, तो नसीमुद्दीन सिद्दीकी की अलग से तूती बोलती थी. 

हाल फिलहाल मुस्लिम नेताओं का अलग प्रभाव देखा गया है. बीजेपी के बढ़ते प्रभाव के बीच ही असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेता तेजी से राष्ट्रीय फलक पर उभरते जा रहे हैं. पांच साल बाद भी बिहार चुनाव में ओवैसी ने अपना राजनीतिक दखल बरकरार रखा है, नतीजे गवाह हैं. उससे पहले ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उनकी राष्ट्रवादी छवि भी चौतरफा छाप छोड़ रही थी. 

आने वाले यूपी चुनाव में भी मुस्लिम वोट बैंक राजनीति को प्रभावित करेगा. पीडीए फॉर्मूले के साथ चुनावी तैयारी कर रहे, पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की मुस्लिम वोट बैंक पर पहली दावेदारी है. समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में शामिल कांग्रेस की भी अलग से दावेदारी है. 

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नसीमुद्दीन सिद्दीकी अपनी हैसियत तो जानते ही हैं, यूपी की चुनावी राजनीति में अपना रोल भी उसी हिसाब से देख रहे होंगे. मायावती भी 2027 के यूपी चुनाव की तैयारी कर रही हैं, और मैदान में नई तैयारी के साथ नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद भी उतरने वाले हैं, जैसा कि बताया जा रहा है - नसीमुद्दीन सिद्दीकी के लिए बड़ा मौका तो है ही. 

नसीमुद्दीन का धैर्य जवाब दे गया या कोई नया प्लान है?

पिछले हफ्ते राहुल गांधी रायबरेली के दौरे पर गए थे. कांग्रेस के बड़े नेताओं ने राहुल गांधी का अमौसी एयरपोर्ट पर हमेशा की तरह स्वागत किया. नसीमुद्दीन सिद्दीकी को वहां एंट्री नहीं मिली. बाकियों के लिए बस इतनी सी बात हो सकती है, लोग कह रहे हैं नसीमुद्दीन सिद्दीकी को मौके की तलाश थी, और वो मिल भी गया. 

नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने मौका माकूल देखकर इस्तीफा भेज दिया. नसीमुद्दीन सिद्दीकी के इस्तीफे का मजमून भी काफी दिलचस्प है. अमूमन इस्तीफे पार्टी के नेता या अध्यक्ष के नाम संबोधित होते हैं, और कार्बन-कॉपी के तौर पर बाकी लोगों को भी प्रेषित होता है. लेकिन, नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने सभी बड़े नेताओं को क्रमवार संबोधित किया है. पहले नंबर पर नाम तो कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का ही है, उसके बाद सोनिया गांधी, फिर राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, अविनाश पांडे और अजय राय के नाम भी लिखे हुए हैं. 

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और, सिद्दीकी ने इस्तीफा भी अकेले नहीं दिया है. 70 से ज्यादा उनके समर्थक नेता और कार्यकर्ता भी साथ हैं. कई पूर्व विधायक भी शामिल हैं. नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने लिखा है, 'महोदय/महोदया, मैं अपरिहार्य कारणों से कांग्रेस पार्टी व कांग्रेस पार्टी की सभी जिम्मेदारियों और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से संलग्न सूची में उल्लिखित साथियों के साथ त्यागपत्र देता हूं... कृपया स्वीकार करने का कष्ट करें.'

नसीमुद्दीन सिद्दीकी का कहना है, मैं राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और सोनिया गांधी का सम्मान करता हूं, और आगे भी करता रहूंगा. लेकिन, पार्टी में मेरे लिए कोई काम नहीं था... मैं कांग्रेस में इसलिए शामिल हुआ था कि सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई लड़ सकूं... लेकिन अब ऐसा नहीं हो पा रहा था.

एक कबूलनामा भी है, मैं कांग्रेस में जातिवाद की लड़ाई लड़ने आया था... आठ साल से जमीन पर काम नहीं कर पाया... मुझमें जंग लग रही थी.

2022 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले वो सीनियर कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद के साथ कांग्रेस के पक्ष में मुस्लिम वोट बैंक पर काफी काम किए थे. कई सम्मेलनों में वो काफी एक्टिव देखे गए थे - लेकिन, पूरे प्रदेश में कांग्रेस को सिर्फ दो सीटें ही मिल पाई थीं. कांग्रेस से पहले 2017 की चुनावी तैयारियों के लिए बीएसपी नेता मायावती के उनको पश्चिम यूपी का प्रभारी बनाया था, लेकिन बीएसपी के हाथ कुछ खास नहीं लगा. और बीएसपी छोड़नी पड़ी, वैसे मायावती का दावा था कि उनको निकाल दिया गया था.

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पश्चिम यूपी में सहारनपुर और मुजफ्फरनगर के आसपास के जिलों में मुस्लिम वोट बैंक पर नसीमुद्दीन सिद्दीकी की खासी पकड़ मानी जाती है. ये बात अलग है कि बीते कई साल से वो अलग से कोई करिश्मा नहीं दिखा पाए हैं.

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