क्या आज भी चल रहा है CIA का ‘माइंड कंट्रोल’ एक्सपेरिमेंट? एमके अल्ट्रा प्रोजेक्ट के स्याह पन्नों ने उड़ाई दुनिया की नींद

आजादी की 250वीं वर्षगांठ मना रहे अमेरिका में CIA के कुख्यात माइंड कंट्रोल प्रोग्राम 'MK ULTRA' की फाइलें खोलने की मांग उठी है. संसद की विस्फोटक सुनवाई में इसके तार कोविड वायरस फंडिंग और डॉ. फाउची विवाद से जोड़े जा रहे हैं, जिसने 'मानवाधिकार रक्षक' अमेरिका का असली और डरावना चेहरा बेनकाब कर दिया है.

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CIA के 50 साल पुराने सीक्रेट प्रोजेक्ट एमके अल्ट्रा की परतें जैसे-जैसे खुल रही हैं, ह्यूमन एक्सपेरिमेंट के नाम पर यातनाओं की खौफनाक तस्वीर उभर रही है. (फोटो - AI generated) CIA के 50 साल पुराने सीक्रेट प्रोजेक्ट एमके अल्ट्रा की परतें जैसे-जैसे खुल रही हैं, ह्यूमन एक्सपेरिमेंट के नाम पर यातनाओं की खौफनाक तस्वीर उभर रही है. (फोटो - AI generated)

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 06 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 11:35 AM IST

साल 2026 में अपनी आजादी की 250वीं वर्षगांठ मना रहा अमेरिका आज एक बार फिर अपने ही इतिहास के सबसे घिनौने और काले अध्याय के सामने खड़ा है. अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA (सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी) के कुख्यात और खतरनाक माइंड कंट्रोल प्रोग्राम 'एमके अल्ट्रा' (MK Ultra) को लेकर अमेरिकी संसद में एक ऐसी सुनवाई हुई है, जिसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है.

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एक तरफ जहां अमेरिका में कोविड वायरस को लैब में विकसित करने, उसमें अमेरिकी एजेंसियों की फंडिंग और डॉ. एंथनी फाउची की भूमिका को लेकर पहले से ही भारी आक्रोश है, वहीं अब एमके अल्ट्रा की फाइलों को पूरी तरह सार्वजनिक करने की मांग ने अमेरिकी सरकार और उसकी साख पर बहुत बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है. क्योंकि यह दिखाता है कि 'लोकतंत्र और मानवाधिकार' का ढोल पीटने वाले देश का असली चेहरा अंदर से कितना डरावना है.

एमके अल्ट्रा प्रोजेक्टः जब इंसानों को 'कठपुतली' बनाने की कोशिश हुई

एमके अल्ट्रा अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA का एक सीक्रेट और अवैध ह्यूमन एक्सपेरिमेंट प्रोग्राम था, जो आधिकारिक तौर पर साल 1953 से 1973 तक चलाया गया. शीत युद्ध (Cold War) के दौरान अमेरिका को डर था कि सोवियत संघ, चीन और उत्तर कोरिया के लोग अमेरिकी कैदियों का माइंड कंट्रोल कर उनसे राज उगलवा रहे हैं. इसी के जवाब में CIA ने इंसानी दिमाग को पूरी तरह वश में करने, याददाश्त मिटाने और किसी को भी 'कठपुतली हत्यारा' (Manchurian Candidate) बनाने के लिए यह प्रोजेक्ट शुरू किया.

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इस प्रोजेक्ट के तहत अमेरिकी नागरिकों, जेल के कैदियों, अस्पतालों के मानसिक मरीजों और यहां तक कि आम लोगों पर उनकी बिना मर्जी और जानकारी के खतरनाक ड्रग्स (जैसे LSD), बिजली के झटके (इलेक्ट्रोशॉक), सम्मोहन (हिप्नोसिस), और बेहद दर्दनाक मानसिक प्रताड़ना के प्रयोग किए गए. कई लोगों का मानसिक संतुलन हमेशा के लिए बिगड़ गया और कई की जान चली गई. 1973 में जब यह बंद हुआ, तो तत्कालीन CIA डायरेक्टर ने इसकी ज्यादातर फाइलें नष्ट करवा दी थीं, ताकि सच कभी बाहर न आ सके.

CIA के केमिस्ट सिडनी गोटलिएब 50 साल पहले कुख्यात एमके अल्ट्रा प्रोग्राम को हेड कर रहे थे.

संसद की सुनवाई में फूटा सच: 'यह मानवता के खिलाफ अपराध है'

30 जून 2026 को अमेरिकी संसद की 'फेडरल सीक्रेट्स डीक्लासिफिकेशन टास्क फोर्स' की प्रमुख एना पॉलिना लूना की अगुवाई में एक बेहद विस्फोटक सुनवाई हुई.

लूना ने कहा कि एमके अल्ट्रा कोई छोटी-मोटी सरकारी चूक नहीं थी, बल्कि यह सरकार द्वारा जानबूझकर चलाया गया एक सुनियोजित नेटवर्क था, जिसे छुपाने के लिए बाद में सबूतों को नष्ट कर दिया गया. 

’लोगों को उनकी जानकारी या सहमति के बिना ड्रग्स देना, इंसानों को मानसिक प्रताड़ना देना, और कैदियों व अस्पताल के मरीजों का बिना सहमति के रिसर्च सब्जेक्ट के रूप में इस्तेमाल करना मानवता के खिलाफ अपराध हैं. पीड़ित और उनके परिवार न्याय और जवाबदेही के हकदार हैं.’

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अमेरिकी संसद में बुलाए गए गवाहों में इस विषय पर किताबें लिखने वाले प्रमुख लेखक शामिल थे, उन्होंने गवाही दी कि जर्मनी में CIA की सीक्रेट जेल थीं और शीत युद्ध के दौरान जैविक हथियारों पर भी काम हो रहा था. एमके अल्ट्रा प्रोजेक्ट के एक्सपेरिमेंट जापान और फिलिपींस के डिटेंशन सेंटर में भी किए गए.

सुनवाई के दौरान गवाह के तौर पर शामिल इनवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट डॉ. स्टीफन किंजर ने कमेटी से मांग की कि अब समय आ गया है जब सरकार इन फाइलों को पूरी तरह सार्वजनिक करे. उन्होंने कहा: ’मेरी जानकारी में केंटकी की लेग्सिंगटन फेडरल जेल में अफ्रीकन-अमेरिकन कैदियों के एक ग्रुप को पहले अलग किया गया था. फिर उन्हें नशीले ड्रग LSD की दोगुनी, तीन गुनी, चौगुनी खुराक दी गई. ये सब लगातार 77 दिनों तक चला.’

किंजर से सांसद नैंसी मेस ने पूछा गया, ’फिर उनका क्या हुआ, वो जिंदा बचे?'

किंजर का जवाब था, ’मुझे नहीं पता. और इस बारे में किताब लिखने से लेकर अब तक यही बात मुझे परेशान करती है.’

सांसद मेस ने पूछा कि ’क्या आज भी कैदियों पर या कहीं और ऐसे एक्सपेरिमेंट किए जा रहे हैं?' किंजर का जवाब था इस बारे में मैं नहीं जानता.

कोविड, डॉ. फाउची और एमके अल्ट्रा का कनेक्शन

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एमके अल्ट्रा पर हुई सुनवाई की खास बात ये रही कि इसे सिर्फ इतिहास खंगालने के लिए इस्तेमाल नहीं किया गया. बल्कि इसे आज के खतरे कोविड-19 वायरस के ओरिजिन और वैक्सीन विवाद से जोड़ा गया. अमेरिकी जनता के मन में यह शक गहरा रहा है कि क्या अमेरिकी एजेंसियां आज भी जनता की पीठ पीछे ऐसे ही खतरनाक और सीक्रेट बायो एक्सपेरिमेंट कर रही हैं?

संसद सदस्य एली क्रेन ने नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ (NIH) की पूर्व वैज्ञानिक अधिकारी डॉ. एलिजाबेथ गिनेक्सी से तीखे सवाल पूछे. उन्होंने पूछा कि जिस तरह NIH और अमेरिकी एजेंसियों ने कोविड-19 की उत्पत्ति और लैबोरेट्री फंडिंग को लेकर पारदर्शिता नहीं दिखाई, क्या उसी ढर्रे ने आज नागरिकों के मन में सरकार और विज्ञान के प्रति भरोसे को पूरी तरह खत्म नहीं कर दिया है?

इसके जवाब में डॉ. एलिजाबेथ गिनेक्सी ने स्वीकार किया कि पारदर्शिता की कमी से भारी नुकसान हो रहा है. उन्होंने कहा:

’अमेरिकी विज्ञान में जनता के भरोसे को खत्म करने वाली जो सबसे बड़ी चीज मुझे दिख रही है, वह है क्लिनिकल ट्रायल्स को बीच में ही रद्द कर देना. यह उन मरीजों के लिए बेहद नुकसानदेह है जो प्रयोग के बतौर इलाज पा रहे होते हैं.’

रिपब्लिकन सांसद एना पॉलिना लूना ने तो यहां तक अंदेशा जता दिया कि यह माइंड कंट्रोल का खेल आज भी खत्म नहीं हुआ है. उन्होंने गवाहों से सवाल किया कि क्या अमेरिकी एजेंसी USAID का इस्तेमाल विदेशों में युद्धबंदियों पर एमके अल्ट्रा जैसे सीक्रेट प्रयोगों को जारी रखने के लिए तो नहीं किया गया? लूना ने बताया कि उन्हें हाल ही में ऐसी रिपोर्ट्स मिली हैं कि एमके अल्ट्रा से जुड़े नए बॉक्स मिले हैं, जिनमें सीआईए के किसी जालसाजी या जाली दस्तावेजों से जुड़े राज दफन हैं.

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फिल्म से भी ज्यादा भयानक है असलियत

2022 में आई हॉलीवुड फिल्म 'एमके अल्ट्रा' ने इस दर्दनाक दास्तान को पर्दे पर उतारा था, जिसमें दिखाया गया था कि कैसे मानसिक इलाज की आड़ में मरीजों को एलएसडी (LSD) ड्रग्स देकर तड़पाया जाता था. लेकिन संसद की इस ताजा सुनवाई से जो बातें सामने आ रही हैं, वह किसी भी काल्पनिक फिल्म या वेब सीरीज से हजार गुना ज्यादा खतरनाक और डरावनी हैं.

फिल्मों में तो कहानी कुछ किरदारों के इर्द-गिर्द सिमट कर खत्म हो जाती है, लेकिन असलियत यह है कि इस प्रोजेक्ट का जाल दर्जनों विश्वविद्यालयों, अस्पतालों और दवा कंपनियों तक फैला हुआ था. सबसे डरावनी बात यह है कि यह डर आज भी जिंदा है कि क्या वैक्सीन और वायरस रिसर्च के नाम पर आम जनता को बिना बताए आज भी किसी बड़े ग्लोबल एक्सपेरिमेंट का हिस्सा तो नहीं बनाया जा रहा है?

आजादी के जश्न के बीच अमेरिका के चेहरे पर लगा बट्टा

भारत और अमेरिका के रिश्ते आज जितने मजबूत हैं, ऐसे में भारतीय नागरिक हमेशा अमेरिका को एक आदर्श लोकतंत्र के रूप में देखते हैं. लेकिन अपने ही नागरिकों को बिना बताए बंधक बनाकर उन पर जानवरों की तरह प्रयोग करने का यह सच अमेरिका के इस 'सुपरपावर' और 'मानवाधिकार रक्षक' वाले मुखौटे को उतार फेंकता है.

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यह काला अध्याय दुनिया को यह सोचने पर मजबूर करता है कि जो देश पूरी दुनिया को नैतिकता का पाठ पढ़ाता है, उसकी खुद की खुफिया एजेंसियां सत्ता और नियंत्रण की भूख में किस हद तक गिर सकती हैं. जब तक अमेरिकी सरकार एमके अल्ट्रा और कोविड की फंडिंग से जुड़े सभी सीक्रेट्स को पूरी तरह सार्वजनिक नहीं कर देती, तब तक दुनिया का उस पर भरोसा बहाल होना नामुमकिन है.

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