-24 परगना के नामखाना का पंचायत सदस्य और टीएमसी नेता माधबचंद्र लाया ऐलान करके ग्रामीणों से ली गई कट-मनी लौटा रहा है. उसका कहना है कि ये उगाही उसने अपने बड़े नेताओं के कहने पर की थी. उसके जैसे कई पंचायत सदस्य टीएमसी से पीछा छुड़ा रहे हैं. क्योंकि, टीएमसी के प्रति गुस्से का कोप इन्हें ही भुगतना पड़ रहा है.
-कूचबिहार में 9 वार्डों वाली छोटी सी म्युनिसिपलिटी पर तीन दिन पहले तक टीएमसी का कब्जा था. 8 में से पांच टीएमसी पार्षदों ने अचानक कांग्रेस ज्वाइन कर ली. इसके अलावा कोलकाता मेयर पद से फिरहाद हकीम, चंदन नगर मेयर राम चक्रवर्ती, बिधान नगर मेयर कृष्णा चक्रवर्ती और कटवा म्युनिसिपलिटी चेयरमैन कमलकांता चक्रवर्ती ने सौ से अधिक पार्षदों सहित इस्तीफा दे दिया है.
-बंगाल विधानसभा में टीएमसी की दरार 19 मई को हुई बैठक के बाद से ही दिखने लगी थी. 80 में से करीब 60 विधायकों ने ममता बनर्जी वाले गुट से अलग पहचान बनाकर नेता प्रतिपक्ष का पद हथिया लिया है. ऋतब्रत बनर्जी बागियों के नेता बन गए हैं.
-टीएमसी के टूटने का सिलसिला बंगाल से बाहर दिल्ली तक जारी है. 28 लोकसभा सांसदों में से 20 के टूट जाने की खबर है. ऊपरी सदन राज्यसभा से ममता के लिए अच्छी खबर नहीं है. सुखेंदु शेखर रॉय ने इस्तीफा दे दिया है. टीएमसी के ये सांसद आगे क्या करेंगे, अभी सस्पेंस है. लेकिन, इतना तय है कि तृणमूल कांग्रेस टुकड़े-टुकड़े होने जा रही है.
एक समय था जब पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी का सिक्का चलता था. उनकी एक आवाज पर लाखों की भीड़ जमा हो जाती थी और दिल्ली से लेकर कोलकाता तक विरोधी कांपते थे. लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद से बंगाल की हवा पूरी तरह बदल चुकी है. तृणमूल कांग्रेस आज इतिहास के सबसे बड़े संकट से गुजर रही है. वो इतिहास बनने के कगार पर है. पार्टी बंगाल से लेकर दिल्ली तक, ताश के पत्तों की तरह बिखरती नजर आ रही है. पंचायत से लेकर संसद तक, हर स्तर पर बगावत की आग भड़क चुकी है और दीदी का साथ देने वाले पुराने और भरोसेमंद चेहरे एक-एक कर उनका साथ छोड़ रहे हैं. पार्टी में हर स्तर पर भारी असंतोष है. नतीजे में तृणमूल कांग्रेस का यह मजबूत किला हर स्तर पर ढहता जा रहा है.
1. पंचायत और जमीनी स्तर पर बगावत: जहां से शुरू हुआ बिखराव
किसी भी राजनीतिक दल की असली ताकत उसकी जमीन होती है, और बंगाल में तृणमूल की जमीन उसकी ग्राम पंचायतें थीं. लेकिन चुनाव नतीजों के बाद जमीनी कार्यकर्ताओं और पंचायत स्तर के नेताओं में ममता बनर्जी के खिलाफ खुला विद्रोह देखने को मिल रहा है. जिलों-जिलों में टीएमसी के पंचायत प्रधान, उप-प्रधान और जिला परिषद के सदस्य सामूहिक रूप से इस्तीफे दे रहे हैं या दूसरी पार्टियों का रुख कर रहे हैं.
हुगली, नादिया, मुर्शिदाबाद और उत्तर व दक्षिण 24 परगना जैसे गढ़ों में रोज़ाना पंचायत सदस्यों के पाला बदलने की खबरें आ रही हैं. बगावत और डर का आलम यह है कि कूचबिहार और दक्षिण 24 परगना के कई इलाकों में टीएमसी के स्थानीय पंचायत सदस्य जनता के गुस्से और कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए सरेआम 'कट मनी' (वसूली का कमीशन) वापस करने पर मजबूर हो रहे हैं. कई बागी जमीनी नेताओं का तो यह भी कहना है कि ’यह पैसा उन्होंने सिर्फ अपने लिए नहीं लिया था’, जो साफ इशारा करता है कि भ्रष्टाचार की जड़ें ऊपर तक जुड़ी थीं. लेकिन आज जब मुसीबत आई, तो शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें अकेले छोड़ दिया. अब पार्टी में उनकी कोई सुनने वाला नहीं है. सालों तक पार्टी के लिए खून-पसीना बहाने वाले कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर दिया गया है. पंचायत स्तर पर हो रही इस बगावत और सार्वजनिक तौर पर घुटने टेकने की घटनाओं ने टीएमसी के उस मजबूत ढांचे को हिलाकर रख दिया है, जिसके दम पर ममता बनर्जी सालों तक सत्ता में बनी रहीं.
2. म्युनिसिपल और नगर निगमों में भगदड़: शहरों में भी पैर उखड़े
म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन और नगर पालिकाओं में भी टीएमसी के पैर उखड़ रहे हैं. कोलकाता, हावड़ा, सिलीगुड़ी और आसनसोल जैसे बड़े नगर निगमों और कई नगर पालिकाओं में टीएमसी के पार्षदों ने बगावत का झंडा बुलंद कर दिया है.
अकेले कोलकाता नगर निगम के भीतर कई पार्षदों ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल दिया है. कइयों ने पार्टी की बैठकों में जाना बंद कर दिया है, तो कई नेता निर्दलीय या विरोधी दलों के संपर्क में हैं. इन पार्षदों का आरोप है कि शहरों के विकास के नाम पर केवल भाई-भतीजावाद चल रहा है और आम जनता के गुस्से का सामना उन्हें जमीन पर करना पड़ रहा है.
3. विधानसभा में टूट: विधायकों का दीदी से मोहभंग
2026 के चुनाव नतीजों के बाद से विधानसभा के भीतर ममता बनर्जी की ताकत लगातार घटती जा रही है. चुनाव के बाद से ही टीएमसी के विधायकों में भारी असंतोष है. एक के बाद एक कई विधायक पार्टी लाइन से अलग जाकर बयानबाजी कर रहे हैं. ममता बनर्जी की बुलाई गई बैठकों में विधायकों की कम होती हाजिरी इस बात का सबूत है कि अब विधायकों पर दीदी का वो खौफ नहीं रहा.
विधायकों का कहना है कि उन्हें अपने क्षेत्रों में जनता के भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है, और अगर वे अब भी चुप रहे तो उनका राजनीतिक करियर हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा. इसलिए वे ममता बनर्जी का साथ छोड़कर सुरक्षित ठिकानों की तलाश में जुटे हैं.
4. दिल्ली तक हड़कंप: लोकसभा और राज्यसभा सांसदों का किनारा
बगावत की यह आग सिर्फ बंगाल तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की राजधानी दिल्ली तक पहुंच चुकी है. लोकसभा और राज्यसभा में तृणमूल कांग्रेस के नुमाइंदे अब ममता बनर्जी के खिलाफ जा रहे हैं. संसद के भीतर टीएमसी के सांसदों में बिखराव साफ देखा जा सकता है.
पार्टी के कई वरिष्ठ सांसद, जो सालों से दिल्ली में ममता बनर्जी की आवाज बने हुए थे, आज केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के घर डेरा डाले हुए थे. सूत्रों के अनुसार करीब 20 लोकसभा सांसद विद्रोह के लिए कमर कस चुके हैं. टीएमसी के सांसदों का दिल्ली में इस तरह बागी होना यह दिखाता है कि ममता बनर्जी का राष्ट्रीय राजनीति में 'किंगमेकर' बनने का सपना तो छोड़िए, अब उनके लिए टीएमसी की पहचान बरकरार रख पाना भी मुश्किल होने वाला है.
अभिषेक बनर्जी: हर स्तर पर 'विलेन' बनकर उभरे
इस पूरे बिखराव और बगावत के पीछे आखिर कौन है? टीएमसी का हर छोटा-बड़ा नेता, चाहे वह पंचायत का सदस्य हो या दिल्ली का सांसद, इसके लिए सिर्फ एक ही नाम को जिम्मेदार ठहरा रहा है- अभिषेक बनर्जी. ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी को पार्टी में जिस तरह नंबर दो की गद्दी सौंपी गई और जिस तरह उन्होंने पूरी पार्टी को अपने कब्जे में ले लिया, वही टीएमसी के पतन का सबसे बड़ा कारण बना है.
बागी नेताओं का साफ कहना है कि अभिषेक बनर्जी ने अपनी तानाशाही और कॉर्पोरेट स्टाइल से पार्टी को एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बना दिया. पुराने और कद्दावर नेताओं को पूरी तरह से किनारे कर दिया गया. अभिषेक ने अपने कुछ खास सलाहकारों के इशारे पर उन नेताओं के टिकट काट दिए या उन्हें प्रताड़ित किया जिन्होंने 30 साल तक ममता बनर्जी के साथ लाठियां खाई थीं.
हर स्तर के नेता अभिषेक बनर्जी को इस बर्बादी का असली 'विलेन' मान रहे हैं. नेताओं का आरोप है कि अभिषेक जमीनी हकीकत से कोसों दूर हैं और उन्होंने सिर्फ अपने अहंकार को संतुष्ट करने के लिए पार्टी के वफादारों को दूध में से मक्खी की तरह निकाल फेंका. इसी वजह से आज पूरी पार्टी में अभिषेक बनर्जी के खिलाफ नफरत और गुस्से का माहौल है.
खामियाजा सिर्फ और सिर्फ ममता बनर्जी को भुगतना पड़ रहा है
राजनीति का एक सीधा नियम है कि राजा चाहे जितना भी अच्छा हो, अगर उसके दरबारी और सेनापति गलत फैसले लेंगे, तो बदनामी और हार राजा के हिस्से ही आएगी. यहां भी यही हो रहा है. अभिषेक बनर्जी के फैसलों और उनके अहंकार का सीधा नुकसान ममता बनर्जी को उठाना पड़ रहा है.
ममता बनर्जी ने अपने भतीजे के मोह में आकर पार्टी के उन पुराने और भरोसेमंद साथियों की बात सुनना बंद कर दिया, जो कभी उनके सुख-दुख के साथी थे. शुभेंदु अधिकारी से लेकर अब के दौर में दर्जनों बड़े नेताओं के पार्टी छोड़ने के पीछे अभिषेक बनर्जी से अनबन ही मुख्य वजह रही. ममता ने हमेशा भतीजे का बचाव किया और नतीजा यह हुआ कि आज वे बिल्कुल अकेली पड़ गई हैं. जनता के बीच ममता की जो साख थी, वह अभिषेक के भ्रष्टाचार के आरोपों और तानाशाही रवैये की वजह से पूरी तरह खत्म हो गई है.
'स्ट्रीट फाइटर' बन गईं 'लाचार बुआ'
बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी की पहचान हमेशा से एक 'स्ट्रीट फाइटर' की रही है. उन्होंने कम्युनिस्टों के 34 साल के मजबूत शासन को अपने दम पर, सड़कों पर लाठियां खाकर और जनता के बीच रहकर उखाड़ फेंका था. लोग उनकी सादगी, उनकी हवाई चप्पल और उनकी सूती साड़ी के कायल थे. वे बंगाल की 'दीदी' थीं.
लेकिन आज की कड़वी सच्चाई यह है कि 2026 के चुनाव नतीजों के बाद वही ममता बनर्जी अपनी इस पहचान को खो चुकी हैं. अपनी आंखों के सामने अपनी बनाई पार्टी को बिखरते देखना और चाहकर भी कुछ न कर पाना, उनकी सबसे बड़ी बेबसी है. अपनी राजनीतिक विरासत को बचाने की लड़ाई में वे इस कदर हार चुकी हैं कि आज वे सिर्फ और सिर्फ एक महत्वाकांक्षी भाइपो (भतीजे) की लाचार बुआ बनकर रह गई हैं.
धीरेंद्र राय