सिंघम कॉप से कॉमन मैन, राजनीति के नए अवतार में अन्नामलाई

तमिलनाडु में बीजेपी की पहचान बन चुके पूर्व आईपीएस अधिकारी के. अन्नामलाई ने पार्टी से इस्तीफा देकर 'कॉमन मैन' के रूप में एक नए और अनोखे राजनीतिक सफर की शुरुआत की है. 'वी द लीडर्स' नाम से एक नए डिजिटल आंदोलन की नींव रखकर उन्होंने यह साफ कर दिया है कि वे राज्य की पारंपरिक द्रविड़ राजनीति और बीजेपी के केंद्रीय ढर्रे, दोनों से अलग एक नया विकल्प तैयार करना चाहते हैं.

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के. अन्नामलाई ने चुना लीक से हटकर रास्ता (Photo-ITG) के. अन्नामलाई ने चुना लीक से हटकर रास्ता (Photo-ITG)

टी एस सुधीर

  • नई दिल्ली,
  • 05 जून 2026,
  • अपडेटेड 5:02 PM IST

19 मई को के. अन्नामलाई ने कक्षा 9 के छात्रों के लिए तीन भाषाओं को सीखना अनिवार्य करने के सीबीएसई (CBSE) के फैसले पर बीजेपी की स्थापित लाइन से अलग हटकर बात की. उन्होंने इस कदम की आलोचना करते हुए रेखांकित किया कि बोर्ड अपने उस पिछले ऐलान से पीछे हट रहा है, जिसमें कहा गया था कि इसे केवल शैक्षणिक वर्ष 2029-30 से लागू किया जाएगा. अन्नामलाई ने तर्क दिया कि कक्षा 9 के छात्रों को तीन भाषाएं सीखने के लिए कहना उनके मानसिक तनाव का कारण बनेगा और उन्होंने इस आदेश को वापस लेने की मांग की.

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यह पहला संकेत था कि आईपीएस अधिकारी से नेता बने अन्नामलाई, जिन्हें आमतौर पर पार्टी की नीतियों का पूरी वफादारी से पालन करने और नरेंद्र मोदी के कसीदे पढ़ने के लिए जाना जाता था, अब कुछ अलग सुर अलाप रहे थे. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह थी कि यह इस एहसास की अभिव्यक्ति थी कि यदि कोई तमिलनाडु की राजनीति में सफल होने की महत्वाकांक्षा रखता है, तो उसके लिए 'तमिल फर्स्ट' का ढर्रा अपनाना बेहद जरूरी है. 

2 जून का उनका इस्तीफा पत्र इस मतभेद को बिल्कुल साफ कर देता है. यह रेखांकित करते हुए कि राष्ट्रीय पार्टियां कभी भी वह भाषा नहीं बोल पाईं, जिसे तमिलनाडु के लोग समझ सकें. उन्होंने कहा कि बीजेपी में अपने कार्यकाल के दौरान इस धारणा को बदलने की कोशिश की थी, लेकिन जब वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि तमिलनाडु को लेकर उनके और पार्टी नेतृत्व के विचार एक जैसे नहीं हैं तो अन्नामलाई ने राहें जुदा कर लेना ही सबसे बेहतर समझा.

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अन्नामलाई अब कहां जाएंगे?

इस्तीफा देते समय अन्नामलाई ने कुछ ऐसा किया जो आम तौर पर देखने को नहीं मिलता. बीजेपी आलाकमान से अपने रिश्ते पूरी तरह खराब न करने की इच्छा के चलते, उन्होंने दिल्ली में वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात में वक्त बिताया, जबकि दूसरी तरफ यह अटकलें तेज थीं कि शायद उन्हें अपना फैसला बदलने के लिए मना लिया जाएगा. आखिरकार, कई दौर की इन 'एग्जिट वार्ताओं' से कुछ हासिल नहीं हुआ या तो पार्टी की तरफ से कोई वैकल्पिक प्रस्ताव नहीं दिया गया या फिर मतभेद इतने गहरे हो चुके थे कि किसी भी तरह की मान-मनौव्वल उनका मन बदलने के लिए काफी नहीं थी. असल में, अन्नामलाई ने अपने वीडियो संदेश में इस बात का जिक्र भी किया कि वह पिछले साल दिसंबर में ही पार्टी छोड़ना चाहते थे, लेकिन उन्हें तमिलनाडु के चुनाव खत्म होने तक पद पर बने रहने के लिए मना लिया गया था. 

यहां से अन्नामलाई अब कहां जाएंगे? क्या वह राजनीति के ढलते सूरज की तरह ओझल हो जाएंगे, या फिर लगातार मिले चुनावी झटकों की राख से एक फिनिक्स की तरह फिर से उठ खड़े होंगे?

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उनका तात्कालिक पड़ाव एक वेबसाइट है 'वी द लीडर्स' (We the Leaders) जो जनता के अपने आंदोलन को खड़ा करने की बात करती है. अपनी प्रस्तावना में बेहद ऊंचे लक्ष्य रखने वाले इस मंच को लेकर अन्नामलाई का कहना है कि उनका उद्देश्य ऐसे कई जन-नेता तैयार करना है जो सही मुद्दों के लिए लड़ सकें. यह वेबसाइट शिक्षा, स्वास्थ्य, स्थिरता और युवा नेतृत्व जैसे मुद्दों को छूती है, जबकि एक्स पर अन्नामलाई का बायो अब उन्हें "अच्छी राजनीति की तलाश में एक आम आदमी के रूप में वर्णित करता है. 

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लॉन्च होने के कुछ ही घंटों के भीतर, इसके 4 लाख से ज़्यादा सदस्य बन गए, जो अन्नामलाई की ऑनलाइन लोकप्रियता को दिखाता है. यह बात स्वाभाविक रूप से याद दिलाती है कि कैसे डेढ़ दशक पहले, इंडियन रेवेन्यू सर्विस के पूर्व अधिकारी अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी बनाकर राष्ट्रीय राजधानी में हलचल मचा दी थी. अब एक पूर्व IPS अधिकारी ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाने के लिए 'आम आदमी' शब्द को चुना है.

पारंपरिक राजनेता शायद ऑनलाइन-फर्स्ट  दृष्टिकोण पर उंगली उठाएं, लेकिन अन्नामलाई के पास ऐसा करने की अपनी वजहें होंगी. पहली बात तो यह कि तमिलनाडु चुनावों में अभिनेता से नेता बने जोसेफ विजय की जीत ने यह दिखा दिया है कि वर्चुअल स्पेस  युवाओं का राजनीतिक खेल का मैदान बन चुका है. अब इंस्टाग्राम रील्स के एक्सप्रेसवे पर विचार बदले जाते हैं और जनमत तैयार किया जाता है. उनके लिए एक और प्रेरणा 'कॉकरोच जनता पार्टी' की भारी ऑनलाइन सफलता भी हो सकती है, जिसने अपने लॉन्च के एक हफ्ते के भीतर इंस्टाग्राम पर 2 करोड़ से अधिक फॉलोअर्स जुटाने का कारनामा कर दिखाया था. 

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तमिलनाडु के संदर्भ में, अन्नामलाई उन शिक्षित युवाओं को अपने साथ जोड़ सकते हैं जो द्रविड़ राजनीति के तौर-तरीकों से निराश हो चुके हैं और बीजेपी के 'हिंदी-हिंदुत्व' वाले ढर्रे से भी दूरी बनाकर रखना चाहते हैं. अन्नामलाई को यह उम्मीद होगी कि बीजेपी का चोला उतार फेंकने के बाद वह समझदार और जागरूक युवाओं के लिए अधिक स्वीकार्य बन पाएंगे. नेता बनने से पहले आईआईएम लखनऊ से एमबीए का उनका शानदार शैक्षणिक रिकॉर्ड और एक आईपीएस अधिकारी के रूप में उनका पेशेवर ट्रैक रिकॉर्ड भी उन्हें कई शिक्षित तमिल युवाओं के लिए एक रोल मॉडल बनाता है.

लेकिन क्या अन्नामलाई वाकई एक ऐसे राज्य में कोई बड़ा धमाका कर सकते हैं जो पहले से ही तमाम क्षेत्रीय दलों से भरा पड़ा है?

भले ही विजय के स्तर पर न सही, लेकिन अन्नामलाई सोशल मीडिया की दुनिया और शहरी युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हैं. इसके साथ अगर शिक्षित मध्यम वर्ग के मतदाताओं और द्रविड़-विरोधी मतदाताओं के एक वर्ग को जोड़ दिया जाए, तो अन्नामलाई अपना एक अलग वोट बैंक खड़ा कर सकते हैं.

अन्नामलाई के लिए एक और मददगार बात यह है कि विजय की सफलता ने तमिलनाडु के बारे में कुछ रूढ़ियों को गलत साबित कर दिया है. सालों से यह माना जाता था कि द्रविड़ राजनीति का एकाधिकार किसी नई ताकत के लिए कोई जगह नहीं छोड़ता, तमिलनाडु में केवल जाति के आधार पर वोट पड़ते हैं और वोटों के लिए पैसे बांटे बिना चुनाव जीतना असंभव है. विजय ने इस मनोवैज्ञानिक बाधा को तोड़ा और यह भी दिखाया कि जो लोग राजनीतिक व्यवस्था से बाहर के हैं, वे भी सीधे प्रवेश कर सत्ता के दावेदार बन सकते हैं. मतदाताओं ने दिखा दिया है कि वे राजनीति में नए प्रयोग करने के लिए तैयार हैं, और यही लचीलापन ( ऐसे अवसर पैदा करता है जो पहले मौजूद नहीं थे.

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जहां एक तरफ नई टीम तैयार करना समय लेने वाला काम है और इसके लिए काफी संसाधनों की आवश्यकता होती है, वहीं दूसरी तरफ जो बात अन्नामलाई के खिलाफ जाएगी, वह है 'विश्वास की कमी'. तमिलनाडु की जनता आखिर इस बात पर भरोसा क्यों करेगी कि बीजेपी से उनका यह अलगाव पूरी तरह वास्तविक है, खासकर तब जब ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि उन्होंने दिल्ली से अपने रिश्ते पूरी तरह खत्म कर लिए हैं? यह संदेह हमेशा बना रहेगा कि वह तमिलनाडु में बीजेपी के 'धुरंधर' हो सकते हैं. यानी तमिलनाडु को जीतने के लिए बीजेपी की कोई लीक से हटकर बनाई गई बेहद चौंकाने वाली योजना.

बीजेपी कोई ऐसी पार्टी नहीं है जिसे नरेंद्र मोदी और अमित शाह के दौर में नेताओं के इस तरह पार्टी छोड़ने की आदत हो. ऐसे में, उनके इस तरह बाहर जाने से पार्टी की छवि और उसके कार्यकर्ताओं के मनोबल पर क्या असर पड़ेगा?

अपने पूर्ववर्ती के इस्तीफे पर अपनी पहली प्रतिक्रिया में तमिलनाडु इकाई के प्रमुख नैनार नागेंद्रन ने तीखे लहजे में कहा, "बीजेपी को कोई नुकसान नहीं हुआ है. " यह शुतुरमुर्ग के रेत में सिर छुपाने जैसा है, यह ढोंग करने जैसा कि अन्नामलाई के जाने से बीजेपी के पास खोने के लिए कुछ नहीं है. भले ही अन्नामलाई को चुनावी सफलता न मिली हो, लेकिन उनका बीजेपी को छोड़ देने का फैसला पार्टी की छवि के लिए बेहद खराब है. अपने इस्तीफे के तरीके से अन्नामलाई ने व्यावहारिक रूप से तमिलनाडु में पार्टी को एक घाटे के सौदे के रूप में पेश कर दिया है, जिसका रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट बेहद निराशाजनक है. जब आपका सबसे लोकप्रिय नेता ही आपका साथ छोड़ दे, तो बीजेपी के लिए तमिलनाडु के लोगों के बीच खुद को नए सिरे से स्थापित करना बेहद मुश्किल होगा.

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ऐसा भी नहीं है कि बीजेपी नेतृत्व ने तमिलनाडु को लेकर अपनी रणनीति सही रखी थी. एआईएडीएमके (AIADMK) के साथ गठबंधन कर अल्पकालिक चुनावी लाभ लेने के लिए अन्नामलाई के दीर्घकालिक दृष्टिकोण 'एन वज़ी तनी वज़ी' (मेरा रास्ता बिल्कुल अलग है/मैं अकेला चलूंगा) को त्यागने का पार्टी का फैसला एक राजनीतिक आत्महत्या जैसा था. अन्नामलाई को नागेंद्रन के पक्ष में पद छोड़ने के लिए कहकर और उन्हें अपमानित कर, बीजेपी ने यह दिखा दिया कि वह एक घमंडी पलानीस्वामी के हाथों फुटबॉल बनने के लिए तैयार थी. भले ही राज्य के कुछ बीजेपी नेता अन्नामलाई के जाने पर अंदर ही अंदर खुश हो रहे हों, लेकिन हकीकत यही है कि पार्टी के पास अब तमिलनाडु में आगे का कोई रोडमैप नहीं बचा है और उसका जीपीएस सिग्नल पूरी तरह खो चुका है. 

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