ईरान युद्ध का ‘शिखंडी’... कैसे ट्रंप की आड़ में मनमाने होते चले गए नेतन्याहू

ईरान जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा है, पता ये चल रहा है कि सारे सूत्र इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के हाथ में है. डोनाल्ड ट्रंप बस उनकी ढाल बनकर रह गए हैं. बेबस.

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ईरान वॉर में ट्रंप बस एक चेहरा बनकर रह गए हैं, असली सूत्र मानो नेतान्याहू के हाथ में है. ईरान वॉर में ट्रंप बस एक चेहरा बनकर रह गए हैं, असली सूत्र मानो नेतान्याहू के हाथ में है.

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 21 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 1:05 PM IST

महाभारत के भीष्म पर्व की वह शाम याद कीजिये. कुरुक्षेत्र के मैदान में अजेय भीष्म खडे थे. पांडवों की सेना के पास उनकी कोई काट नहीं थी. तब अर्जुन के रथ के आगे एक चेहरा खड़ा किया गया- शिखंडी. भीष्म ने शस्त्र त्याग दिये क्योंकि उनके सामने एक स्त्री (किन्नर रूप में) खडी थी.

शिखंडी का वजूद सिर्फ एक मकसद के लिए था- बदला. पिछले जन्म में वह अंबा थी. भीष्म द्वारा ठुकराई गई. अपमानित और कुंठा से भरी अंबा. उसने अग्नि में कूदते समय कसम खाई थी कि वह भीष्म की मृत्यु का कारण बनेगी. अगले जन्म में वह राजा द्रुपद के यहां पैदा हुई और भीष्म के पतन की ढाल बनी. शिखंडी खुद युद्ध नहीं जीत रहा था, वह तो बस उस मौके का जरिया था जिसका फायदा अर्जुन उठा रहे थे.

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आज के मिडिल ईस्ट के रणक्षेत्र में डोनाल्ड ट्रंप वही शिखंडी बन गए हैं. अपने पिछले कार्यकाल के अपमान और कुंठा से भरे हुए. दुनिया को सबक सिखाने के लिए आतुर. बेशक उनके बैकग्राउंड का अंबा से कोई लेना-देना नहीं है, और ईरान भी कोई भीष्म नहीं है. लेकिन, इतना तो दुनिया देख ही रही है कि ट्रंप को ढाल बनाकर बेंजामिन नेतन्याहू ईरान पर कैसे अपने अचूक बाण चला रहे हैं.

नेतन्याहू का पुराना सपना और ट्रंप का कंधा

इजरायल पिछले 40 साल से ईरान पर सीधा हमला करने की फिराक में था. 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से ही ईरान, इजरायल की आंखों में चुभ रहा था. लेकिन अमेरिका के हर राष्ट्रपति ने, चाहे वो बुश हों, ओबामा हों या बाइडेन, इजरायल की लगाम कसकर रखी. वाशिंगटन को डर था कि ईरान पर हमले का मतलब होगा पूरी दुनिया में तेल की किल्लत और तीसरा विश्व युद्ध.

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लेकिन नेतन्याहू जानते थे कि ट्रंप अलग मिट्टी के बने हैं. ट्रंप के भीतर एक अजीब किस्म का 'इगो' है. वह खुद को दुनिया का सबसे ताकतवर लीडर दिखाना चाहते हैं. नेतन्याहू ने इसी मनोविज्ञान को पकडा. उन्होंने ट्रंप को यह यकीन दिलाया कि ईरान के साथ हुई परमाणु डील ट्रंप की हार है और उसे तोडना उनकी मर्दानगी का सबूत होगा. पिछले साल जून से लेकर इस साल के 28 फरवरी तक, नेतन्याहू ने हर वह चाल चली जिससे ट्रंप इस युद्ध में गहरे धंसते चले जाएं.

अमेरिका में बैठी प्रो-इजरायली लॉबी ने ट्रंप के कान भरने में कोई कसर नहीं छोडी. ट्रंप को लगा कि वह ईरान को घुटने पर लाकर 'डील ऑफ द सेंचुरी' करेंगे. लेकिन नेतन्याहू का मकसद डील नहीं, तबाही था. जब भी ट्रंप ने ईरान के साथ पर्दे के पीछे से सुलह की कोशिश की, नेतन्याहू ने कुछ ऐसा कर दिया कि बातचीत की मेज ही पलट गई.

ईरान पर अटैक के दो चेहरे: अमेरिका बनाम इजरायल

इस जंग में अमेरिका और इजरायल के बीच एक गहरी लकीर खिंच गई है. ट्रंप का उद्देश्य 'लिमिटेड' है. वह सिर्फ मिलिट्री ठिकानों को निशाना बनाकर ईरान को डराना चाहते हैं ताकि वह सरेंडर कर दे. ट्रंप चाहते हैं कि जंग जल्दी खत्म हो ताकि वह अपनी 'पीस मेकर' वाली इमेज बना सकें.

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लेकिन नेतन्याहू का एजेंडा बहुत खतरनाक है. ट्रंप की आड में उन्होंने वे काम कर दिये जो अमेरिका ने कभी सपने में भी नहीं सोचे थे:

टॉप लीडरशिप का सफाया: इजरायल ने चुन-चुनकर ईरान की मिलिट्री और राजनीतिक लीडरशिप को निशाना बनाया है.

आर्थिक कमर तोडना: हालिया हमलों में इजरायल ने ईरान के 'पार्स गैस फील्ड' को तबाह कर दिया. यह ईरान की अर्थव्यवस्था की लाइफलाइन है. ट्रंप कह रहे हैं कि वे सिर्फ मिसाइल डिपो तबाह करना चाहते थे, लेकिन नेतन्याहू ने ईरान को कंगाल करने का रास्ता चुन लिया.

लाचार ट्रंप और जिद्दी नेतन्याहू

आज आलम यह है कि इजरायली हमले ट्रंप के मंसूबों से बहुत आगे निकल गए हैं. ट्रंप अब उस शिखंडी की तरह हैं जिसे समझ नहीं आ रहा कि उसके पीछे से छोडे गए तीर कितनी तबाही मचा रहे हैं. ट्रंप सार्वजनिक तौर पर इजरायल को चेतावनी दे रहे हैं कि वह तेल-गैस के कुओं और न्यूक्लियर साइट्स को न छुए.

नेतन्याहू कैमरे के सामने मुस्कुराकर सिर हिला देते हैं, लेकिन अगले ही पल इजरायली फाइटर जेट ईरान की भीतर बता देते हैं कि इजरायल क्या चाहता है. ट्रंप कह रहे हैं कि "बस बहुत हुआ", लेकिन नेतन्याहू का मौन संदेश है कि "अभी तो ये शुरुआत है."

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ट्रंप बार-बार अपने लक्ष्य बदल रहे हैं. कभी वह कहते हैं कि उन्हें ईरान में सत्ता परिवर्तन चाहिए, कभी कहते हैं कि सिर्फ परमाणु हथियार रोकने हैं. उनके लिए यह एक 'बिजनेस डील' जैसी है.

दूसरी ओर नेतन्याहू का विजन बिल्कुल साफ है. वह ईरान को आने वाले 50 सालों के लिए अपाहिज कर देना चाहते हैं. वह सिर्फ ईरान ही नहीं, बल्कि लेबनान के हिजबुल्लाह और यमन के हूतियों को जड से खत्म करने पर आमादा हैं. वह जानते हैं कि ट्रंप जैसा 'शिखंडी' उन्हें दोबारा नहीं मिलेगा जो खुद बदनाम होकर इजरायल के रास्ते के कांटे साफ कर दे.

महाभारत में शिखंडी सिर्फ एक ढाल है, असली शिकारी तो उसके पीछे छिपा है. आज ईरान युद्ध में भी दुनिया यही देख रही है. ट्रंप दुनिया के सामने दहाड रहे हैं, लेकिन असली बाण नेतन्याहू चला रहे हैं. यह युद्ध अब ट्रंप के कंट्रोल से बाहर जा चुका है.

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