पानी बचाने के नाम पर पाखंड, क्या विलेन बनेगा किसान? हर्बिसाइड का बड़ा खेल

एक समय था जब देश भूख से मर रहा था, तब सरकार ने किसानों से अनुरोध किया था कि वे देश को इस संकट से बचाएं. किसान पूरी शिद्दत से आगे भी आए. लेकिन अफसोस आज किसानों का दर्द कोई नहीं समझना चाहता. आज उन्हें लालची बताया जा रहा है और यूरिया डालकर जमीन जहरीली करने का आरोप लगाया जा रहा है. कल तक जो 'अन्नदाता' थे, आज 'गुनहगार' कैसे बन गए.

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दुनिया भर के स्वतंत्र वैज्ञानिक कह रहे हैं कि लगातार सालों-साल मिट्टी में हर्बिसाइड डालने का अंजाम भयानक होगा. (Photo: ITG) दुनिया भर के स्वतंत्र वैज्ञानिक कह रहे हैं कि लगातार सालों-साल मिट्टी में हर्बिसाइड डालने का अंजाम भयानक होगा. (Photo: ITG)

ओम प्रकाश

  • नई दिल्ली,
  • 22 जून 2026,
  • अपडेटेड 5:11 PM IST

आजादी मिलने के बाद 1950-60 के दशक में जब देश भूखा मर रहा था, तब सरकारों और कृषि वैज्ञानिकों ने हमारे पिताओं और दादाओं के सामने हाथ जोड़े थे. नारा लगा था कि यूरिया झोंको, डीएपी डालो, नई किस्में अपनाओ और देश को भूखा मरने से बचाओ. किसान ने अपनी मिट्टी की परवाह किए बिना देश का पेट भर दिया.

वैज्ञानिकों की छाती पर मेडल टंग गए, खाद कंपनियों के टर्नओवर आसमान छू गए. लेकिन चालीस साल बाद कहानी बदल गई. जब पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जमीन का पानी पाताल में चला गया, मिट्टी बेजान होने लगी और 'कैंसर ट्रेन' चलने लगी, तो किसी वैज्ञानिक या कंपनी को जिम्मेदार नहीं ठहराया गया. 

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आज सारा दोष किसानों के सिर मढ़ दिया जाता है कि किसान लालची हैं, पानी बहाते हैं और यूरिया डालकर जमीन जहरीली कर रहे हैं. अन्नदाता को रातों-रात 'गुनहगार' बना दिया गया.

आज ठीक वैसा ही एक और चक्रव्यूह धान की सीधी बिजाई यानी डीएसआर (Direct Seeded Rice) के नाम पर बुना जा रहा है, जिसे किसानों को गहराई से समझने की जरूरत है. पानी की बचत का ढोल पीटकर शुरू की गई यह तकनीक असल में किसानों को हर्बिसाइड का गुलाम बनाकर हमारी जमीन को और जहरीला बना देगी.

पानी बचाने का पुण्य या कुछ और?

कृषि वैज्ञानिक और एसी कमरों में बैठे नीति निर्माता चिल्ला रहे हैं कि पानी बचाओ, धान की रोपाई बंद करो, सीधी बिजाई (DSR) करो. तर्क दिया जा रहा है कि इससे 20 से 30 परसेंट पानी बचेगा. यह सुनने में बहुत बड़ा राष्ट्रहित और पुण्य का काम लगता है, लेकिन जरा इसके पीछे छिपे बाजार के गणित को भी तो समझिए.

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पारंपरिक खेती में जो काम प्रकृति का मुफ्त 'पानी' करता था, डीएसआर में वह काम बहुराष्ट्रीय कंपनियों के महंगे 'केमिकल' करेंगे. रोपाई वाले खेत में पानी खड़ा रहता है, तो ऑक्सीजन न मिलने से घास के बीज उग नहीं पाते. पानी खुद में एक प्राकृतिक खरपतवारनाशी है. लेकिन जैसे ही आप सीधी बिजाई करेंगे, पानी का सुरक्षा कवच हट जाएगा और खेत में धान के साथ-साथ घास का जंगल उगेगा.

यही तो इस पूरे खेल का सबसे बड़ा विरोधाभास है. वैज्ञानिक और नीतियां कागज पर किसान का जो 'पानी का खर्च' बचा रही हैं, असल में वह पैसा किसान की जेब से निकलकर 'हर्बिसाइड के खर्च' के रूप में सीधे कंपनियों के खाते में जा रहा है. जब धान की रोपाई से डीएसआर की तरफ शिफ्ट होने पर किसान का पानी बचता है, तो वह पानी मुफ़्त का होता है. लेकिन उस बचे हुए पानी की पूरी कीमत किसान घास खत्म करने के लिए केमिकल खरीद कर चुकाता है.

अब एंट्री होती है बड़ी-बड़ी विदेशी कंपनियों की. बिजाई के 48 घंटे के भीतर पेंडीमेथिलिन छिड़को, फिर 20 दिन बाद बिस्पायरीबैक सोडियम डालो. यानी जो पैसा पहले प्रकृति के भरोसे किसान की जेब में बचता था या गांव के स्थानीय मजदूर के घर जाता था, वह अब सीधे तौर पर एग्रो केमिकल कंपनियों के खातों में ट्रांसफर हो रहा है.

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फ़ुलपेज और सुपर वीड्स 

बाजार का यह चक्रव्यूह यहीं नहीं रुकता. दुनिया के सबसे छोटे और अमीर देशों में से एक लिकटेंस्टीन के प्रिंस के फाउंडेशन के स्वामित्व वाली अमेरिकी कंपनी राइसटेक भारत के बाजार में हर्बिसाइड-टॉलरेंट डीएसआर तकनीक लेकर आई है. जिसे फ़ुलपेज कहते हैं. भारत में यह अपनी सहायक कंपनी सवाना सीड्स के माध्यम से काम करती है.

कंपनी ने जीन म्यूटेशन के जरिए धान के इस विशेष बीज को ऐसा बना दिया है कि इस पर इमेजाथापायर जहर का कोई असर नहीं होता. यानी इस नॉन सेलेक्टिव हर्बिसाइड से घास खत्म होती है जबकि राइसटेक का धान सुरक्षित रहता है.

इसी तकनीक पर भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा ने भी काम किया. उसने 2021 में दो सबसे लोकप्रिय बासमती किस्मों (1121 और 1509) को सुधारकर 'पूसा बासमती-1979' और 'पूसा बासमती-1985' नाम से देश की पहली गैर-जीएम हर्बिसाइड टॉलरेंट बासमती किस्में रिलीज कीं, जिसे 2024 में बाजार में उतारा गया.

पहली नजर में यह तकनीक किसानों को बहुत जादुई और 'टेंशन-फ्री' लगती है. लेकिन जब आप इसकी तकनीकी परतों को उखाड़ेंगे, तो इसके पीछे छिपा सबसे बड़ा व्यावहारिक खतरा सामने आएगा जो कि खरपतवारों में प्रतिरोधक क्षमता का महा-संकट है. 

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जब किसान इस तकनीक के लालच में आकर अपने खेत में बार-बार, साल-दर-साल केवल एक ही केमिकल इमेजाथापायर का छिड़काव करेगा, तो प्रकृति अपना काम करेगी. कुछ ही सालों के भीतर खेत की घास इस जहर को पचाना सीख जाएगी और इसके प्रति प्रतिरोध विकसित कर लेगी. नतीजा यह होगा कि वह दवा अनचाही घास को मारना पूरी तरह बंद कर देगी. यानी सुपर वीड्स का खतरा पैदा हो सकता है.

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जब यह पूरी तकनीक निष्प्रभावी हो जाएगी, तब किसान के पास कोई रास्ता नहीं बचेगा. घास को मारने के लिए उसे और भी ज्यादा जहरीले, नए और बेतहाशा महंगे केमिकल के जाल में फंसना पड़ेगा. जो तकनीक आज खर्च बचाने के नाम पर बेची जा रही है, वह कल किसान की लागत बढ़ा सकती है. यह तकनीक वैज्ञानिक रूप से एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन व्यावसायिक रूप से यह किसान को बीज+स्पेसिफिक केमिकल के एक ऐसे चक्रव्यूह में बांधती है जहां से बाहर निकलना मुश्किल होता है.

पानी के लिए पाखंड और इथेनॉल

अब आते हैं उस कड़वे सच पर, जो इस पूरी व्यवस्था के पाखंड की पोल खोल देता है. एक तरफ किसानों को उपदेश दिया जा रहा है कि धान में पानी मत बहाओ, वहीं दूसरी तरफ सरकार इसी चावल को फैक्ट्रियों में भेजकर 'पेट्रोल में मिलाने के लिए' इथेनॉल बनवा रही है. जबकि आंकड़े गवाह हैं कि चावल से सिर्फ  एक लीटर इथेनॉल बनाने में कुल पानी का खर्च लगभग 10 हजार लीटर का होता है. यानी जिस चावल को उगाने में पाताल का पानी खाली हुआ, उसे इंसानों के पेट में भेजने के बजाय गाड़ियों का टैंक भरने के लिए फैक्ट्रियों में झोंका जा रहा है.

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अगर हमारे देश के कृषि वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं को पानी की इतनी ही चिंता है, तो वे चावल से इथेनॉल बनाने का यह तमाशा क्यों चला रहे हैं? इसकी जगह मक्का और कृषि कचरे से इथेनॉल बनाने का प्रमोशन आक्रामक तरीके से क्यों नहीं होता? क्यों मक्का पीछे छूट गया है. किसानों को इसका एमएसपी तक नहीं मिल रहा है. जबकि मक्का से एक लीटर इथेनॉल बनाने का वाटर फुटप्रिंट लगभग 4,670 लीटर है जो कि चावल के मुकाबले बिल्कुल आधा है.

जब फैक्ट्रियों में अरबों-खरबों लीटर पानी फूंककर 'ग्रीन फ्यूल' के नाम पर खेल होता है, तब हमारे कृषि वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं की 'पानी बचाओ' वाली चिंता कहां घास चरने चली जाती है? तब किसी को पर्यावरण संकट क्यों नहीं दिखता? साफ बात है कि फैक्ट्रियों और तेल कंपनियों के मुनाफे के आगे पानी का संकट बौना हो जाता है, लेकिन जब बात किसान के खेत की आती है, तो सबको पानी याद आने लगता है. ऐसा दोहरा रवैया क्यों?

मिट्टी की चीख कौन सुनेगा?

दुनिया भर के स्वतंत्र वैज्ञानिक (जो कंपनियों के फंड पर नहीं पलते) चीख-चीख कर कह रहे हैं कि लगातार सालों-साल मिट्टी में  हर्बिसाइड डालने का अंजाम बहुत भयानक होगा. मिट्टी महज धूल नहीं है, वह जीवित मां है. रासायनिक दवाएं इसके मित्र बैक्टीरिया और केंचुओं को मार डालती हैं. मिट्टी 'केमिकल एडिक्ट' बन जाती है. ये केमिकल मिट्टी की संरचना को बिगाड़ देते हैं. ज़मीन पानी सोखने की क्षमता खो देती है और सूखने पर पत्थर जैसी सख्त हो जाती है.

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भविष्य की स्क्रिप्ट तैयार है

अगर इसी ढर्रे पर आंख मूंदकर खेती चलती रही, तो अगले 15-20 साल बाद की पटकथा आज ही लिखी जा चुकी है. वैज्ञानिक- अफसर डीएसआर के लिए  कागजों पर लाखों लीटर पानी की बचत का डेटा दिखाकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वाहवाही लूटेंगे, पर्यावरण पुरस्कार पाएंगे और मोटे प्रमोशन लेंगे. दूसरी ओर कंपनियां बीज, हाइब्रिड तकनीक और हर्बिसाइड बेचकर मालामाल हो चुकी होंगी.

फिर हमारे किसान का क्या होगा?  जब डीएसआर तकनीक की वजह से धान के खेतों में उगने वाली घास को मारने के लिए जमीन में लगातार हर्बिसाइड का जहर जाएगा और मिट्टी खराब होगी, तब एक बार फिर वैसे ही किसानों को विलेन बनाया जाएगा जैसे आज हरित क्रांति के साइड इफेक्ट के लिए पंजाब और हरियाणा के किसानों को बनाया गया है. तब यही अफसर टीवी पर आकर कहेंगे कि हमने तो पानी बचाने को कहा था, इन अनपढ़ और लालची किसानों ने अंधाधुंध हर्बिसाइड डालकर जमीन को जहरीला बना दिया और पानी भी खत्म कर दिया. यानी विलेन फिर से किसान ही बनेगा.

सवाल यह है कि क्या तब बीज और कीटनाशक बेचने वाली देसी-विदेशी कंपनियां मिट्टी खराब करने की जिम्मेदारी लेंगी. हर्बिसाइड का इस्तेमाल बढ़ने से जो इंसानी जीवन और पर्यावरण को नुकसान होगा उसकी जिम्मेदारी डीएसआर को प्रमोट करने वाले अफसर, कृषि वैज्ञानिक और संस्थाएं लेंगी?

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पानी बचाने की जिम्मेदारी किसानों पर ही क्यों?

किसान पानी बचाने के विरोधी नहीं हैं, पानी उनकी भी जरूरत है. लेकिन पानी बचाने की सारी ठेकेदारी सिर्फ किसानों की ही क्यों? अगर वैज्ञानिक और सरकार वाकई पानी बचाने को लेकर ईमानदार हैं, तो सबसे पहले चावल से इथेनॉल बनाना तुरंत बंद करके इसे मक्का और एग्रीकल्चर कचरे पर शिफ्ट करें. 

DSR के नाम पर किसानों को सिर्फ केमिकल और 'हर्बिसाइड-टॉलरेंट' बीजों का सौ फीसदी गुलाम न बनाएं. धान से पहले ढैंचा जैसी हरी खाद अनिवार्य करें जो मिट्टी के लिए जहर-नाशक का काम करती है. कतारों में बुवाई करके दवाओं की जगह 'कोनो वीडर' जैसी छोटी मशीनों को बढ़ावा दिया जाए, ताकि कंपनियों की जेब भरने के बजाय मिट्टी की सेहत और केंचुए बचे रहें.

वक्त आ गया है कि किसान अब पॉलिसी बनाने वालों की आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछें. पानी बचाने के नाम पर किसी साजिश के शिकार न हो जाएं. वरना इतिहास गवाह है कि जीत हमेशा वैज्ञानिकों, अधिकारियों और एग्रीकल्चर इनपुट कंपनियों की होती है और ठीकरा किसान के सिर फूटता है.

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