दिल्ली में जवाबदेही की आखिरी कड़ी भी 'खत्म', लोग तो मरेंगे ही

बीते वर्ष 19 जून 2025 को दिल्ली के एलजी वी.के. सक्सेना ने एक आदेश को मंजूरी दी, जिसके तहत अब होटल, गेस्ट हाउस, स्विमिंग पूल, ऑडिटोरियम, डिस्कोथेक, वीडियो गेम पार्लर और एम्यूजमेंट पार्कों को चलाने के लिए दिल्ली पुलिस से लाइसेंस लेने की जरूरत नहीं होगी.

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2015-2018 के बीच दिल्ली पुलिस ने अवैध निर्माण के बारे में नगर निगम के अधिकारियों को 42,000 से ज्यादा सरकारी नोटिस भेजे. (Photo: PTI/ITG) 2015-2018 के बीच दिल्ली पुलिस ने अवैध निर्माण के बारे में नगर निगम के अधिकारियों को 42,000 से ज्यादा सरकारी नोटिस भेजे. (Photo: PTI/ITG)

अनिल भसीन

  • नई दिल्ली,
  • 08 जून 2026,
  • अपडेटेड 8:56 AM IST

द‍िल्‍ली में यह सिलसिला इतनी बार दोहराया जा चुका है कि अब लोग इस पर ध्यान भी नहीं देते. एक इमारत गिरती है. धूल का गुबार उठता है. मीड‍िया आता है. दुख जताया जाता है. जांच का भरोसा दिया जाता है. और फिर सब भूला द‍िया जाता है- अगली इमारत गिरने तक, अगले अग्निकांड तक, या किसी ऐसी अगली मौत तक जिसे रोका जा सकता था. इसी माहौल के बीच, 19 जून 2025 को द‍िल्‍ली के एलजी वी.के. सक्सेना ने एक आदेश को मंजूरी दी, जिसे एक सामान्य प्रशासनिक फेरबदल की तरह पेश किया गया.

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इसके तहत अब होटलों, गेस्ट हाउसों, स्विमिंग पूलों, ऑडिटोरियमों, डिस्कोथेक, वीडियो गेम पार्लरों और एम्यूजमेंट पार्कों को चलाने के लिए दिल्ली पुलिस से लाइसेंस लेने की जरूरत नहीं होगी.

मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने इसे सरकार के 'दूरदर्शी दृष्टिकोण' (विजनरी अप्रोच) और 'न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन' (मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस) के वादे के रूप में सराहा. लेकिन इस घोषणा में जिस बात को छुपाया गया, और जिसे सामने लाने की हिम्मत सरकार में नहीं थी, वह यह है कि पुलिस के ये लाइसेंस असल में क्या थे.

ये एक स्वतंत्र एजेंसी के पास आखिरी ऐसा जरिया था जिसके जरिए वह खतरनाक इमारतों की निगरानी कर सकती थी, कमी होने पर टोक सकती थी और लाशें गिनने की नौबत आने से पहले उन्हें खाली करवा सकती थी. इस ताकत को छीनने से शासन व्यवस्था आसान नहीं होती, बल्कि यह जवाबदेही की आखिरी नस को काटने जैसा है.

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42 हजार चेतावनियां, जो बेकार गईं

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने संसद के सामने कुछ ऐसे आंकड़े रखे हैं, जिन्हें देखकर नागरिक व्यवस्था की नाकामी पर देश भर में बहस छिड़ जानी चाहिए थी. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. 2015 से फरवरी 2018 के बीच यानी सिर्फ तीन साल से थोड़े ज्यादा समय में दिल्ली पुलिस ने अवैध निर्माण के बारे में नगर निगम के अधिकारियों को 42,000 से ज्यादा सरकारी नोटिस (चेतावनियां) भेजे थे.

सरकार ने साफ तौर पर बताया था कि जिम्मेदारी किसकी है: 'दिल्ली पुलिस की भूमिका सिर्फ इतनी है कि जब भी उसकी नजर में कोई अवैध निर्माण आए, तो वह उसकी जानकारी नगर निगम के अधिकारियों को दे दे. अवैध निर्माण पर कार्रवाई करने का काम संबंधित स्थानीय निकाय (लोकल बॉडी) का है.'

दिल्ली नगर निगम (MCD) के पास ऐसी ताकतें हैं जो पुलिस के पास नहीं हैं- जैसे सील करना, ढहाना, मुकदमा चलाना और कानून लागू करना. जब 42,000 चेतावनियों के बाद भी अवैध निर्माण के ढर्रे में कोई बदलाव नहीं आया, तो यह नाकामी उन नगर निकायों की है, न कि उस पुलिस की जिसने रिपोर्ट दर्ज कराई थी.

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अब, जून 2025 के आदेश के तहत, इन सात बड़ी जगहों को लाइसेंस देने की ताकत पुलिस से लेकर उन्हीं स्थानीय निकायों MCD, NDMC और दिल्ली छावनी बोर्ड (दिल्ली कैंट) को सौंप दी गई है.

यानी उन्हीं संस्थाओं को जिन्होंने पिछले एक दशक में यह साबित किया है कि वे कार्रवाई करने में या तो असमर्थ हैं या उनकी ऐसी कोई इच्छा ही नहीं है. जब बार-बार चेतावनी मिलने के बाद भी अवैध निर्माण जारी रहता है, तो सवाल यह नहीं रह जाता कि क्या अधिकारियों को इसकी जानकारी थी. सवाल यह बन जाता है कि जानकारी होने के बाद भी असरदार कार्रवाई क्यों नहीं हुई.

हर आपदा से पहले दिखता है एक जैसा पैटर्न

ये नाकामियां सिर्फ कागजी बातें नहीं हैं. इनके बाकायदा पते-ठिकाने हैं.

साकेत, 2026: दिल्ली पुलिस ने मार्च 2026 में एमसीडी (MCD) को दो बार पत्र लिखकर उस जगह पर हो रहे अवैध निर्माण के बारे में आगाह किया था, जो बाद में ढह गई. वे चिट्ठियां सिस्टम में चली गईं, लेकिन इमारत तब तक खड़ी रही जब तक कि वह खुद ही गिर नहीं गई.

महरौली: महरौली पुलिस ने तीन महीनों में इलाके की लगभग 200 से 300 अवैध इमारतों के बारे में चिट्ठियां भेजीं. जमीन पर काम करने वाले अफसरों को पता था, फाइलें आगे बढ़ीं, लेकिन इमारतें भी अपनी जगह तनी रहीं.

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सैनिक फार्म: एक RTI से पता चला कि पुलिस ने सैनिक फार्म में करीब 120 अवैध संपत्तियों के बारे में जानकारी भेजी थी. उन जानकारियों का क्या हुआ, यह सवाल आखिरकार केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) तक पहुंच गया.

इमारतें रातों-रात खड़ी नहीं हो जातीं. कंक्रीट मिलाने वाली गाड़ियां (मिक्सर) साफ दिखती हैं. एक्‍स्‍ट्रा फ्लोर बनने में हफ्तों और महीनों का समय लगता है. पड़ोसी उन्हें देखते हैं. सवाल कभी यह था ही नहीं कि दिल्ली के अधिकारियों को पता चल सकता था या नहीं. सवाल यह है कि सब कुछ जानने के बाद भी कार्रवाई होना अपवाद क्यों बन गया.

भ्रष्टाचार से जूझती संस्थाओं को जिम्मेदारी सौंपना

दिल्ली पुलिस ने पिछले कई सालों में नागरिक एजेंसियों को अवैध निर्माण के बारे में हजारों चेतावनियां भेजी हैं. साकेत में इमारत गिरने के मामले में भी पुलिस ने इमारत ढहने से पहले एमसीडी को वहां हो रहे अवैध निर्माण के बारे में चेतावनी दी थी. अदालतों ने भी अवैध निर्माण को रोकने में नाकाम रहने के लिए कई बार आलोचना की है और सवाल उठाया है कि सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत या लापरवाही के बिना ऐसी इमारतें कैसे खड़ी हो सकती हैं.

पिछले कई सालों में एमसीडी के कई अधिकारियों को भ्रष्टाचार की जांच, गिरफ्तारी और सजा का सामना करना पड़ा है. सरकार लाइसेंस देने के अधिकार के इस ट्रांसफर को 'काम का सरलीकरण' बता रही है यानी कम एजेंसी, कम रुकावटें और जल्दी मंजूरी. यह भाषा इज ऑफ डूइंग ब‍िजनेस वाले व‍िभाग की तो हो सकती है, लेकिन यह पब्‍लि‍क सेफ्टी की ज‍िम्‍मेदारी संभालने वालों की भाषा नहीं है.

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एमसीडी का इतिहास भरोसा जगाने वाला नहीं है. अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल के दौरान नगर निगम के अधिकारियों ने भ्रष्टाचार की जांच, विजिलेंस जांच, गिरफ्तारियों और मुकदमों का सामना किया है. RTI से मिली जानकारियों से पता चला है कि नगर निगम के कर्मचारियों से जुड़े भ्रष्टाचार के हजारों मामले पेंडिंग हैं. कॉमनवेल्थ गेम्स के स्ट्रीट-लाइटिंग घोटाले में सीबीआई की एक विशेष अदालत ने एमसीडी के कई अधिकारियों को दोषी ठहराया था.

इस बात के पुख्ता और अदालती सबूत मौजूद हैं कि अवैध निर्माण को मंजूरी देने के लिए रिश्वत के रैकेट चलाए जाते हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि एमसीडी का हर अधिकारी भ्रष्ट है. लेकिन इसका मतलब यह जरूर है कि जिस संस्था को ऐसी जगहों पर नियंत्रण का बढ़ा हुआ अधिकार दिया जा रहा है, वह खतरनाक और असुरक्ष‍ित इमारतों को दबाव के कारण नजरअंदाज करती रही हैं.

बिना किसी जवाबदेही के इस जिम्मेदारी को उनके पोर्टफोलियो में जोड़ना कोई र‍िफॉर्म नहीं है, बल्कि खतरे को न्योता देना है. किसी भी नागरिक निकाय (सिविक बॉडी) के शीर्ष पद पर रहने के लिए आपको राजनीतिक समर्थन की जरूरत होती है. इसी वजह से आज तक कोई भी बड़ा अधिकारी जेल नहीं गया, गाज छोटे कर्मचारियों पर ही गि‍रती है.

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भ्रष्टाचार के सवाल को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता

नियम लागू करने में बार-बार होने वाली नाकामियां तब और भी चिंताजनक हो जाती हैं, जब इन्हें दिल्ली नगर निगम (MCD) के भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों के लंबे इतिहास के साथ देखा जाता है. RTI से उजागर हुआ है कि एमसीडी अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के हजारों मामले दर्ज हैं. विजिलेंस के रिकॉर्ड बताते हैं कि 3,000 से ज्यादा नगर निगम कर्मचारियों के खिलाफ 4,000 से अधिक भ्रष्टाचार के मामले पेंडिंग हैं. पिछले कई सालों में, एमसीडी अधिकारियों ने रिश्वतखोरी, पद के दुरुपयोग से लेकर अवैध निर्माण रैकेट जैसे मामलों में जांच, गिरफ्तारी और सजा का सामना किया है.

कॉमनवेल्थ गेम्स के स्ट्रीट-लाइटिंग घोटाले में एमसीडी के कई अधिकारी शामिल थे. सीबीआई अदालत ने पाया कि इस साजिश के कारण नगर निगम को लगभग 1.15 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था. अन्य जांच में यह आरोप भी सामने आए हैं कि अधिकारियों ने अवैध निर्माण को अनदेखा करने या नियमों के उल्लंघन को बढ़ावा देने के बदले पैसे लिए. इस सब से यह साबित नहीं होता कि हर इमारत का गिरना भ्रष्टाचार का ही नतीजा है.

लेकिन इससे यह भी गले नहीं उतरता कि बार-बार होने वाले हादसे बस कुछ अनचाहे इत्‍तेफाक हैं. जब दशकों तक हजारों भ्रष्टाचार की शिकायतें, बार-बार रिश्वतखोरी के मामले, सजा, विजिलेंस जांच और अवैध निर्माण की जांच सामने आती हैं, तो नागरिकों को यह पूछने का पूरा हक है कि क्या दिल्ली का यह ब‍िल्‍ड‍िंंग-सेफ्टी क्राइस‍िस केवल कमजोर रेगुुलेशन के कारण है? कहीं ये 'कुछ भी करके बच निकलने की संस्कृति' का नतीजा तो नहीं? यह सवाल तब और भी जरूरी हो जाता है जब चेतावनियां लगातार दी जाती रहती हैं, कमियां पकड़ी जाती रहती हैं, और फिर भी खतरनाक इमारतें बनती चली जाती हैं.

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जून 2025 का यह आदेश एक ऐसा खालीपन पैदा कर रहा है, जिसकी कीमत किसी न किसी मोड़ पर इंसानी जानों से चुकानी पड़ेगी. जब किसी बिना लाइसेंस वाले डिस्कोथेक में आग लगेगी, या किसी गेस्ट हाउस की छत सोते हुए पर्यटकों पर गिर जाएगी, तो जवाबदेही की लकीर सीधे एमसीडी के उस दफ्तर तक जाएगी जहां फाइलें रोकी जाती हैं, जांच टाली जाती है और सिर्फ एक फोन कॉल पर लाइसेंस जारी कर दिए जाते हैं.

पुल‍िस कोई परफेक्‍ट नहीं, लेक‍िन स‍िस्‍टम में जरूरी थी

पुलिस का लाइसेंस कोई एकदम परफेक्ट व्यवस्था नहीं था. लेकिन यह सिस्टम के ढांचे के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण था: यह एक अलग कार्य संस्कृति और अलग प्राथमिकताओं वाली एजेंसी की 'दूसरी नजर' वाला काम करता था. जिस शहर में पहले से ही हर साल अवैध निर्माण की औसतन 14,000 से ज्यादा शिकायतें आ रही हों, वहां से इस जांच व्यवस्था को हटा देना लालफीताशाही (ब्यूरोक्रेसी) को कम नहीं करता. यह तो बस इस बात की गुंजाइश को कम कर देता है कि किसी भी बड़े हादसे से पहले उन खतरनाक जगहों को पकड़ा जा सके.

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एक सही तरीके से काम करने वाले सिस्टम में, जब इंफ्रास्ट्रक्चर (इमारतें) बार-बार लोगों की जान लेने लगे. जब 42,000 चेतावनियों के बाद भी कोई कार्रवाई न हो, जब किसी इमारत के अवैध होने के सबूत उसके गिरने से पहले ही मिल चुके हों तो सीनियर अफसर सिर्फ 'जांच के आदेश' नहीं देते. वे इस्तीफा देते हैं. वे मुकदमे का सामना करते हैं. उन्हें सिर्फ उनके व्यक्तिगत कामों के लिए नहीं, बल्कि उनके कार्यकाल में हुई पूरी संस्थागत नाकामियों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है.

साकेत और मालवीय नगर में लगी भीषण आग सामान्य जांच और सिर्फ अफसोस जताने से कहीं ज्यादा की मांग करती है. दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट, दोनों ने ही अतीत में जनता की सुरक्षा के गंभीर खतरों और सिस्टम की प्रशासनिक नाकामियों से जुड़े मामलों का खुद संज्ञान लिया है. उन्हें इन मामलों में भी ऐसा ही करना चाहिए. यह त्रासदी राजधानी के सबसे अमीर जिलों में से एक में कानून के अमल, निगरानी और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करती है.

अगर खतरनाक हालातों की पहचान करने, सुरक्षा नियमों को लागू करने या अवैध और असुरक्षित निर्माण को रोकने में कोई लापरवाही हुई थी, तो इसकी जिम्मेदारी सिर्फ छोटे स्तर के अधिकारियों पर खत्म नहीं हो सकती. जवाबदेही को ऊपर के अफसरों तक जाना ही होगा. इस जिले के जिम्मेदार सीनियर अफसर के रूप में एमसीडी के डिप्टी कमिश्नर (साउथ) के खिलाफ पूरी जांच होनी चाहिए और अगर लापरवाही, ड्यूटी में कोताही या जानबूझकर की गई ढिलाई के सबूत मिलते हैं, तो एक क्रिमिनल केस दर्ज किया जाना चाहिए.

कोई भी शहर टाली जा सकने वाली मौतों को महज एक 'दुर्भाग्यपूर्ण हादसा' मानकर आगे नहीं बढ़ सकता. पब्‍ल‍िक सेफ्टी की जिम्मेदारी संभालने वाले लोगों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय किए बिना, सुधार का हर वादा आग बुझने के बाद उठने वाले धुएं से ज्यादा कुछ नहीं रह जाता. दिल्ली में अभी तक ऐसी जिम्मेदारी लेने की आदत नहीं बनी है. इमारतें गिरती हैं. लोग मरते हैं. जांच की घोषणा होती है. सिस्टम जैसा का तैसा बचा रहता है.

और फिर अगली इमारत गिर जाती है. जून 2025 का आदेश इस चक्र को तोड़ने में मदद नहीं करता. बल्कि यह इस चक्र को बिना टूटे चलते रहने में मदद करता है. यह 'न्यूनतम सरकार' (मिनिमम गवर्नमेंट) नहीं है. यह न्यूनतम जवाबदेही (मिनिमम एकाउंटेबिलिटी) है और यही वह चीज है जो लोगों की जान लेती है.

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