डांसिंग गर्ल: 4500 साल पुरानी वो ‘आजाद लड़की’ आज पर्दे में है

4500 साल पुरानी कांसे की मूर्ति ‘डांसिंग गर्ल’ फिर विवादों में है. NCERT की 9वीं कक्षा में छपी इस मूर्ति का स्वरूप बदला हुआ है. हड़प्पा सभ्यता की खोज में लगे एक अंग्रेज पुरातत्ववेत्ता का यह मूर्ति 1926 में खुदाई के दौरान मिली थी. उन्हें यह देखने में एक नाचने वाली लड़की लगी. लेकिन, भारतीय इतिहासकारों में इसे अलग-अलग मत हैं.

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हड़प्पा सभ्यता की पहचान बन चुकी सौ साल पहले खुदाई में मिली ‘डांसिंग गर्ल’ स्टैच्यू विवादों में है. हड़प्पा सभ्यता की पहचान बन चुकी सौ साल पहले खुदाई में मिली ‘डांसिंग गर्ल’ स्टैच्यू विवादों में है.

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 15 जून 2026,
  • अपडेटेड 4:07 PM IST

सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे मशहूर और ऐतिहासिक धरोहरों में से एक, मोहनजोदड़ो की ‘डांसिंग गर्ल’ (नाचती हुई लड़की) की मूर्ति आज एक बार फिर देश की सबसे बड़ी बहसों के केंद्र में है. 10.5 सेंटीमीटर (चार इंच से कुछ अधिक) की यह छोटी सी कांसे की मूर्ति आज से करीब 4500 साल पहले ‘लॉस्ट-वैक्स कास्टिंग’ (मोम की ढलाई) तकनीक से बनाई गई थी. साल 1926 में जब ब्रिटिश पुरातत्ववेत्ता अर्नेस्ट मैके को मोहनजोदड़ो में खुदाई के दौरान यह मिली, तब से लेकर आज यानी साल 2026 तक, इस मूर्ति को देखने, समझने और इसकी व्याख्या करने के नजरिए में जमीन-आसमान का अंतर आ चुका है.

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इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के बीच इस मूर्ति को लेकर दो तरह की बहसें साफ दिखाई देती हैं- एक है इसकी ‘ताजा बहस’ जो हाल ही में NCERT की किताबों में इसके चित्रण और सेंसरशिप को लेकर शुरू हुई है, और दूसरी है इसकी ‘सनातन बहस’ जो दशकों से इसके धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक अस्तित्व को लेकर चली आ रही है.

इस मूर्ति के साथ इतिहासकारों और समाज ने कुछ वैसा ही बर्ताव किया है, जैसा कि एक लोककथा में ‘छह अंधों ने एक हाथी’ के साथ किया था. जिसके हाथ में हाथी की पूंछ आई, उसने कहा कि यह तो रस्सी है, जिसने धड़ को पकड़ा उसे वह दीवार लगा, जिसने पैर छुए उसे पेड़ लगा, कान छूने वाले को पंखा, सींग पकड़ने वाले को भाला और सूंड छूने वाले को वह सांप जैसी लगी. ठीक यही हश्र इस 4500 साल पुरानी कलाकृति का भी हुआ है. किसी को यह नाचने वाली अल्हड़ लड़की लगती है, किसी को यह आदि-पार्वती का रूप, तो किसी को यह मातृत्व की प्रतीक ‘मदर गॉड’ नजर आती है. आइए, कला, इतिहास और राजनीति के इस कॉकटेल को विस्तार से समझते हैं.

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ताजा बहस: NCERT की नई किताब और कपड़ों का विवाद

साल 2026 में डांसिंग गर्ल एक बार फिर तब सबसे बड़े विवादों में घिर गई, जब राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत कक्षा 9वीं के लिए कला शिक्षा की अपनी पहली नई किताब ‘मधुरिमा’ जारी की. इस किताब के पहले चैप्टर ‘इतिहास की कलाएं’ (History of Arts) में इस ऐतिहासिक मूर्ति की एक ऐसी तस्वीर छापी गई है, जिसमें उसका धड़ धुंधला किया हुआ दिखाई देता है. मूर्ति से ब्रेस्ट और प्राइवेट पार्ट को उभार हटा दिए गए हैं. मानो मूर्ति के नग्न स्वरूप को ढकने के लिए उसे कपड़े पहना दिए गए हों या उसे छुपाया गया हो.

दिलचस्प बात यह है कि पिछले 25 सालों से अधिक समय से यह मूर्ति NCERT की इतिहास की किताबों में अपने मूल स्वरूप में छपती आ रही थी. यहां तक कि पूर्ववर्ती एनडीए सरकारों के कार्यकाल में भी इसके मूल स्वरूप से छेड़छाड़ नहीं की गई थी. इस ताजा बदलाव पर इंडियन एक्सप्रेस के साथ इंटरव्यू में इतिहासकार मिशेल डैनिनो ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी. वे खुद NCERT की कक्षा 6 की सोशल साइंस किताब की विकास समिति के अध्यक्ष थे. उन्होंने खुलासा किया कि NCERT इस स्टैच्यू की तस्वीर को इंडस वैली सिविलाइजेशन वाले चैप्टर की कवर इमेज बनाने से हिचकिचा रहा था, क्योंकि वह नग्न है और विवाद का कारण बन सकती है. डैनिनो के अनुसार, अगर हम बच्चों को इतिहास का मूल रूप नहीं दिखा सकते, तो फिर उन्हें नेशनल म्यूजियम जाने से भी रोक देना चाहिए, जहां यह मूल मूर्ति और इसके जैसी कई अन्य देवियों व अप्सराओं की अर्ध-नग्न मूर्तियां रखी हुई हैं. हालांकि, NCERT के अधिकारियों का कहना है कि ऐसा जानबूझकर नहीं किया गया है और मामले को समीक्षा के लिए टीम के पास भेज दिया गया है.

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कहां मिली थी यह मूर्ति और इसके जैसे अन्य साक्ष्य?

यह ऐतिहासिक मूर्ति 1926 में मोहनजोदड़ो (जो अब पाकिस्तान के सिंध प्रांत में है) में एक घर की खुदाई के दौरान मिली थी. विभाजन के बाद हुए समझौतों के तहत यह मूर्ति भारत के हिस्से में आई और अब नई दिल्ली के नेशनल म्यूजियम में रखी हुई है.

मूर्ति पूरी तरह नग्न है, लेकिन उसने अपने बाएं हाथ में कंधे से लेकर कलाई तक लगभग 24-25 चूड़ियां पहन रखी हैं और दाएं हाथ में केवल 4 चूड़ियां या कंगन हैं. उसके गले में तीन बड़े पेंडेंट वाला एक हार है. इतिहासकारों का एक धड़ा कहता है कि हाथ में इतनी सारी चूड़ियां पहनने का रिवाज आज भी पश्चिमी भारत, खासकर राजस्थान और गुजरात की आदिवासी महिलाओं (जैसे लाम्बाडी या बंजारा समुदाय) में देखा जाता है. इसलिए, इसे किसी एक वर्ग में बांधना गलत होगा.

हैरानी की बात यह है कि मोहनजोदड़ो से डांसिंग गर्ल की केवल एक ही मूर्ति नहीं मिली थी. पुरातत्वविदों को वहां से इसी तरह की एक और कांसे की मूर्ति मिली थी, जिसे ‘डांसिंग गर्ल-2’ कहा जाता है, हालांकि वह काफी जर्जर और टूटी हुई अवस्था में है. इसके अलावा, सिंधु घाटी सभ्यता के विभिन्न स्थलों जैसे हड़प्पा, लोथल और चन्हुदड़ो से मिट्टी (टेराकोटा) की ऐसी कई आकृतियां और सील मिली हैं, जिन पर स्त्रियों को इसी तरह की मुद्रा में, हाथों में ढेरों चूड़ियां पहने हुए दिखाया गया है. यह दर्शाता है कि उस काल में महिलाओं की यह वेशभूषा और आत्मविश्वास से भरी मुद्रा कोई अपवाद नहीं, बल्कि वहां की संस्कृति का एक अहम हिस्सा थी.

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सनातन बहस: पहचान, नामकरण और धार्मिक दृष्टिकोण

जहां ताजा बहस इस बात पर केंद्रित है कि मूर्ति को स्कूल की किताबों में कैसे दिखाया जाए, वहीं इसकी ‘सनातन बहस’ इस बात पर है कि वास्तव में यह लड़की थी कौन?

औपनिवेशक नामकरण : साल 1926 में जब ब्रिटिश पुरातत्वविद् जॉन मार्शल और अर्नेस्ट मैके ने इस मूर्ति को देखा, तो वे इसके खड़े होने के अंदाज से हैरान रह गए. लड़की ने अपना दायां हाथ अपनी कमर पर रखा हुआ था, उसका सिर थोड़ा पीछे की ओर झुका था, घुटने आगे की ओर थोड़े मुड़े हुए थे, और पैर संगीत की थाप पर थिरकने की मुद्रा में थे. मार्शल ने इसे ‘एक आधुनिक और बेबाक ‘नाच गर्ल’ (नाचने वाली लड़की) की तरह देखा, जो अपने पैरों से संगीत की लय पकड़ रही हो. इसी आधार पर अंग्रेज इतिहासकारों ने इसे ‘डांसिंग गर्ल’ नाम दे दिया. इस औपनिवेशिक दृष्टिकोण को भारत में अलग-अलग समय पर इतिहासकारों ने चुनौती दी थी.

पार्वती बनाम मदर गॉड की थ्योरी : समय के साथ भारतीय इतिहासकारों ने इस औपनिवेशिक चश्मे को चुनौती दी. साल 2016 में इतिहासकार ठाकुर प्रसाद वर्मा ने भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (ICHR) के एक रिसर्च पेपर में दावा किया कि यह कोई आम नाचने वाली लड़की नहीं, बल्कि हिंदू देवी ‘पार्वती’ का सबसे प्राचीन रूप है. उनका तर्क था कि जहां भी शिव (या पशुपति नाथ) की पूजा के साक्ष्य मिलते हैं, वहां पार्वती का होना स्वाभाविक है. इसके अलावा, कई इतिहासकारों का मानना है कि सिंधु-सरस्वती घाटी सभ्यता के लोग प्रकृति और स्त्री शक्ति के पूजक थे, इसलिए यह मूर्ति ‘मदर गॉड’ (मातृदेवी) या किसी धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा हो सकती है, न कि केवल मनोरंजन करने वाली नर्तकी.

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पुरुषवादी और जातिगत नजरिया : इतिहासकारों का एक धड़ा ऐसा भी है, जो डांसिंग गर्ल को भारत के सामाजिक दृष्टिकोण से देखता आया है. उसे लगता है कि यह प्रतिमा समाज के निचले तबके से आने वाली एक लड़की की है, जिसकी भूमिका केवल पुरुषों के मनोरंजन के लिए थी. इसीलिए वह सजावटी आभूषण पहने है, लेकिन कपड़े नहीं. क्योंकि, पहले के समाज में निचले तबके के लोगों को कपड़े पहनने का अधिकार नहीं था. इतिहासकार रोमिला थापर जोर देती रही हैं कि सरस्वती नदी के वजूद का हड़प्पा सभ्यता से कनेक्शन का कोई साक्ष्य नहीं है.

जब मॉडर्न हुई ‘डांसिंग गर्ल’

डांसिंग गर्ल केवल अकादमिक गलियारों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की सांस्कृतिक कूटनीति का भी हिस्सा बन चुकी है. मई 2023 में अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के प्रगति मैदान में 'अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय एक्सपो' का उद्घाटन किया था. इस आयोजन के शुभंकर (Mascot) के रूप में ‘डांसिंग गर्ल’ के एक आधुनिक, समकालीन और रंगीन संस्करण का अनावरण खुद प्रधानमंत्री द्वारा किया गया था.

तब डांसिंग गर्ल को भारत की 5000 साल पुरानी निरंतरता, नारी शक्ति और रचनात्मक आत्मनिर्भरता का प्रतीक बताया गया था. सरकार का संदेश साफ था कि यह मूर्ति केवल इतिहास के पन्नों में दबी हुई कोई पुरातात्विक वस्तु नहीं है, बल्कि आधुनिक भारत की कलात्मक और सांस्कृतिक चेतना की नींव है.

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ताजा बनाम सनातन बहस का निचोड़

डांसिंग गर्ल को लेकर चल रही ‘ताजा बहस’ और ‘सनातन बहस’ में एक गहरा अंतर्विरोध और समानता है. सनातन बहस इस बात को लेकर थी कि औपनिवेशिक इतिहासकारों ने भारत की एक गौरवशाली नारी आकृति को सिर्फ एक निर्वस्त्र ‘नाचने वाली लड़की’ के रूप में सीमित कर दिया, जबकि वह कोई पूजनीय देवी या समाज की मार्गदर्शक हो सकती थी. यानी, वहां संघर्ष पहचान और सम्मान का था.

दूसरी तरफ, आज की ताजा बहस रूढ़िवादिता और सेंसरशिप के बीच फंसी है. इतिहास को वैसे ही देखा जाना चाहिए जैसा वह था, न कि उसे आज के नैतिक मापदंडों के हिसाब से तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाए. इतिहासकार ठीक ही कहते हैं कि कलाकृति का पेट या धड़ छुपाना असल में इतिहास की उस सच्चाई को छुपाना है जो यह बताती है कि 4500 साल पहले का भारतीय समाज कला, शरीर और अभिव्यक्ति को लेकर कितना सहज, प्रगतिशील और आधुनिक था. 10.5 सेंटीमीटर की इस कांस्य प्रतिमा ने पिछले सौ सालों में इंसानी सोच के कई बदलते रंग देखे हैं, और 2026 की यह ताजा बहस गवाह है कि यह नन्हीं सी लड़की आज भी इतिहास को झकझोरने का माद्दा रखती है.

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