क्रिमिनल सिस्टम की कमजोर कड़ी? देश को और पुलिस चाहिए, लेकिन वकीलों की जरूरत ज्यादा

भारत में न्याय मिलने में होने वाली देरी के लिए अक्सर पुलिस को जिम्मेदार ठहराया जाता है, लेकिन असली कमजोरी हमारी लचर और बोझ से दबी सरकारी वकील (अभियोजन) व्यवस्था में है. जब तक पुलिस थानों और अदालतों के बीच की इस भूली-बिसरी कड़ी को मजबूत नहीं किया जाएगा, तब तक केवल नई गिरफ्तारियों से करोड़ों लंबित मुकदमों का बोझ कम नहीं होने वाला.

Advertisement
भारत में प्रति 1,00,000 नागरिकों पर केवल 153 पुलिस अधिकारी हैं भारत में प्रति 1,00,000 नागरिकों पर केवल 153 पुलिस अधिकारी हैं

अनिल भसीन

  • नई दिल्ली,
  • 15 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 7:50 AM IST

मशहूर हस्तियों और उनसे जुड़े मामलों को मीडिया में सबसे ज्यादा जगह मिलती है. सिया गोयल मामले में, पुलिस की इस बात के लिए काफी आलोचना हुई कि उन्होंने बिना किसी पक्के और सीधे सबूत के एक सोची-समझी हत्या को साबित करने के लिए बहुत लंबी और दिशाहीन जांच की. जब भी कोई अपराध देश को झकझोर देता है, तो सबसे पहले पुलिस को ही कठघरे में खड़ा किया जाता है.

Advertisement

मीडिया जांच, पुलिस बल की संख्या, पुलिस के मौके पर पहुंचने के समय और कानून-व्यवस्था की नाकामियों पर सवाल उठाता है. यह सच है कि भारत में पुलिसकर्मियों की भारी कमी है. यहां प्रति 1,00,000 नागरिकों पर केवल 153 पुलिस अधिकारी हैं, जबकि संयुक्त राष्ट्र (UN) मानकों के अनुसार यह संख्या 222 होनी चाहिए. लेकिन जनता के इस गुस्से और शोर-शराबे के बीच एक बहुत बड़ी रुकावट अनदेखी रह जाती है, और वह है—अभियोजन (Prosecution), मुकदमा चलाने वाली व्यवस्था.

FIR दर्ज होने के बाद, आगे की कार्रवाई में हफ़्तों की देरी हो जाती है. यह हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली की उस हकीकत को दिखाता है जहां पुलिस से तो मामले को साबित करने (सजा दिलाने) की उम्मीद की जाती है, लेकिन पुलिस जांच को अदालत में एक सफल मुकदमे में बदलने वाली सरकारी वकीलों की व्यवस्था में कर्मचारियों की भारी कमी है.

Advertisement

पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो (BPR&D) के अनुसार, भारत में राज्यों के पुलिस बल के लिए स्वीकृत 26.23 लाख पदों के मुकाबले असल में केवल 20.91 लाख कर्मी ही तैनात हैं. लगभग 5.31 लाख से ज्यादा पद खाली पड़े हैं, यानी स्वीकृत पदों में से हर पांचवां पद खाली है. देश की राजधानी दिल्ली इसका एक अपवाद है. अन्य शहरों की तुलना में यहाँ पुलिसकर्मियों की संख्या ज्यादा है, लेकिन दिल्ली पुलिस के स्वीकृत पदों की संख्या 83,700 से अधिक होने के बावजूद, साल 2025 में संसद को बताया गया था कि बल में 9,200 से अधिक पद खाली हैं.

लेकिन असल समस्या सिर्फ पुलिसवालों की संख्या की नहीं है. एक पुलिस अधिकारी का काम मामले की जांच करना, सबूत जुटाना, गवाहों के बयान दर्ज करना और चार्जशीट (आरोप पत्र) दाखिल करना होता है. इसके बाद मामले की सफलता या विफलता उसके हाथ से बाहर हो जाती है. फिर बात को आगे बढ़ाना सरकारी वकील और अदालत के हाथ में होता है. काम के बोझ से दबी इस व्यवस्था में, देरी होने के कारण लोगों को न्याय नहीं मिल पाता.

यह संकट सबसे ज्यादा निचली अदालतों और सरकारी वकीलों के काम में देखने को मिलता है. उदाहरण के लिए, नोएडा-एनसीआर में हर दिन 300 से ज्यादा नए आपराधिक मामले अदालतों में पहुंचते हैं, लेकिन उन्हें संभालने के लिए सिर्फ तीन सरकारी वकील उपलब्ध हैं. इसका नतीजा यह होता है कि तारीख पर तारीख मिलती है, बहस में देरी होती है और सरकारी वकीलों पर काम का बोझ बहुत बढ़ जाता है, जिससे मुकदमों की सुनवाई लंबी खिंचती चली जाती है.

Advertisement

पंचकुला जिला अदालतों में डिप्टी डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी और असिस्टेंट डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी की इतनी भारी कमी सामने आई है कि जूनियर वकीलों को उनके तय अधिकार क्षेत्र से बाहर की अदालतों में भी पेश होना पड़ रहा है. वहाँ के वकीलों ने शिकायत की है कि उन्हें एक साथ कई अदालतों का काम संभालना पड़ता है, जिससे भारत की अदालतों में पहले से लंबित पड़े करोड़ों मामलों के बीच मुकदमों की तैयारी और उनकी गुणवत्ता पर बहुत बुरा असर पड़ता है. नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक, केवल जिला और निचली अदालतों में ही 3.8 करोड़ से ज्यादा आपराधिक मामले लंबित हैं. जिला अदालतों में कुल पेंडिंग केस की संख्या 5 करोड़ से भी ज्यादा है. हर महीने लाखों नए मामले दर्ज होते हैं और लाखों का निपटारा भी होता है, लेकिन कुल मिलाकर लंबित मामलों का पहाड़ वैसा ही बना रहता है.

सरकारी वकीलों की कमी और अदालतों की क्षमता मुकदमों के नतीजों को कैसे प्रभावित करती है, इसका एक बड़ा उदाहरण दिल्ली है. पॉक्सो (POCSO) मामलों में, दिल्ली ने साल 2025 में एक अनोखा रिकॉर्ड बनाया. जहां दर्ज हुए नए मामलों से कहीं ज्यादा पुराने मामलों का निपटारा किया गया. इसके बावजूद, 3,500 से अधिक मामले लंबित रह गए और इनमें से 2,000 से अधिक मामले तो पिछले छह से दस सालों से फैसले के इंतजार में थे. जानकारों का कहना है कि इस देरी की बड़ी वजह विशेष अदालतों और जरूरी बुनियादी सुविधाओं की कमी है.

Advertisement

आमतौर पर लोग सोचते हैं कि अगर कोई आरोपी बरी हो जाता है, तो इसका मतलब पुलिस ने खराब जांच की थी. कभी-कभी यह सच भी होता है. लेकिन अनुभवी जज, वकील और जांचकर्ता जानते हैं कि हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली का अपना एक अजीब सच है: एक कमजोर जांच भले ही पूरे मामले को बिगाड़ सकती है, लेकिन एक बेहतरीन जांच भी तब बेकार साबित हो जाती है जब सरकारी वकील गवाहों को ठीक से तैयार न कर पाएं, जमानत का मजबूती से विरोध न कर सकें, सबूतों को सही ढंग से पेश न कर पाएं या बचाव पक्ष के वकीलों की दलीलों का तुरंत जवाब न दे सकें. जब एक ही सरकारी वकील कई अदालतों में सैकड़ों मुकदमों की पैरवी कर रहा हो, तो काम का स्तर गिरना तय है.

भारतीय न्याय संहिता और इससे जुड़े नए कानूनी सुधारों के लागू होने के बाद यह बोझ और ज्यादा बढ़ गया है. नए कानूनों में समय-सीमा, फॉरेंसिक सबूतों, डिजिटल रिकॉर्ड और नियमों के पालन पर बहुत ज्यादा जोर दिया गया है. इन बदलावों के कारण अब ऐसे विशेषज्ञ सरकारी वकीलों की जरूरत है जो जटिल आपराधिक मामलों को अच्छे से संभाल सकें.

विडंबना यह है कि सरकारें अक्सर पुलिस कांस्टेबलों की भर्ती की घोषणाएं तो करती हैं, लेकिन सरकारी वकीलों के खाली पदों को नजरअंदाज कर देती हैं. पुलिस की कमी साफ दिखाई देती है क्योंकि इसका सीधा असर सड़कों पर सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ता है. इसके विपरीत, सरकारी वकीलों की कमी तुरंत दिखाई नहीं देती, बल्कि सालों बाद बार-बार तारीख मिलने, गवाहों के बयानों में देरी होने और दोषियों को सजा मिलने की दर में गिरावट के रूप में सामने आती है.

Advertisement

इसका समाधान सिर्फ नए सरकारी वकीलों की भर्ती करना नहीं है, बल्कि इस पूरी व्यवस्था को एक पेशेवर सेवा के रूप में नए सिरे से तैयार करना है.

पहला, हर राज्य को वैज्ञानिक तरीके से काम के बोझ का आकलन करना चाहिए, जिसके तहत सरकारी वकीलों की संख्या पुराने नियमों के बजाय अदालतों में आने वाले रोज के नए मामलों की संख्या के आधार पर तय की जाए. अगर किसी जिले में रोज 300 नए मामले आ रहे हैं, तो स्टाफ की संख्या भी उसी हिसाब से होनी चाहिए न कि दशकों पुराने प्रशासनिक नियमों के आधार पर.

दूसरा, सरकारी वकील सेवा को रोजमर्रा के प्रशासनिक नियंत्रण से अलग किया जाना चाहिए ताकि इसे एक विशेषज्ञ करिअर के रूप में विकसित किया जा सके, जहां वकीलों को फॉरेंसिक, साइबर अपराध, वित्तीय धोखाधड़ी और पीड़ितों की मदद से जुड़े मामलों की विशेष ट्रेनिंग दी जाए.

तीसरा, गंभीर अपराधों के मामलों में पुलिस जांचकर्ताओं और सरकारी वकीलों को शुरुआत से ही मिलकर काम करना चाहिए. दुनिया के कई विकसित देशों में, सरकारी वकील चार्जशीट दाखिल होने से पहले ही जांच में पुलिस की मदद करते हैं, जिससे सबूतों की वे कमियां दूर हो जाती हैं जिनकी वजह से आरोपी बाद में बरी हो जाते हैं.

Advertisement

चौथा, राज्यों को महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों, संगठित अपराधों, साइबर अपराधों और बच्चों से जुड़े अपराधों के लिए अलग से विशेष वकील विंग (यूनिट) बनाने चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे कई जगहों पर अब विशेष अदालतें बनाई जा रही हैं. दिल्ली सरकार द्वारा हाल ही में यूएपीए (UAPA) और संगठित अपराधों के लिए विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतें बनाने का फैसला इसी दिशा में एक कदम है.

पांचवां, इस पूरी व्यवस्था में टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाना चाहिए. डिजिटल फाइलें, कंप्यूटर (AI) की मदद से दस्तावेजों का रख-रखाव, इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को पेश करने के तरीके और गवाहों की तारीखें तय करने वाले सिस्टम से निष्पक्षता को बनाए रखते हुए काम की रफ़्तार को बहुत ज्यादा बढ़ाया जा सकता है.

आखिर में, नीति निर्माताओं को लंबित मामलों को केवल अदालतों की समस्या मानना बंद करना होगा. अदालतें अकेले काम नहीं करती हैं. पेंडिंग पड़ा हर एक क्रिमिनल केस एक ऐसी जंजीर की तरह है जिसमें पुलिस, फॉरेंसिक लैब, सरकारी वकील, बचाव पक्ष के वकील और जज आपस में जुड़े होते हैं. इस जंजीर की एक भी कड़ी कमजोर हुई, तो पूरी व्यवस्था ठप हो जाती है.

इसमें कोई शक नहीं कि भारत को और अधिक पुलिसकर्मियों की जरूरत है. पांच लाख से ज्यादा खाली पुलिस पदों की समस्या बेहद गंभीर है और इसे जल्द से जल्द हल किया जाना चाहिए. लेकिन सिर्फ पुलिस की भर्तियां कर देने से न्याय नहीं मिलेगा. कोई भी आपराधिक न्याय प्रणाली केवल गिरफ्तारियां करके लंबित मामलों के बोझ को कम नहीं कर सकती. इसके लिए अदालतों में मुकदमों को मजबूती से लड़ना और उन्हें अंजाम तक पहुंचाना जरूरी है.

Advertisement

जब तक भारत पुलिस थानों और अदालतों के बीच की इस भूली-बिसरी कड़ी (सरकारी वकीलों) को मजबूत नहीं करता, तब तक अखबारों की सुर्खियां पुलिस को ही उन नाकामियों के लिए जिम्मेदार ठहराती रहेंगी जिनकी असली वजह बोझ से दबी हमारी वकील व्यवस्था और करोड़ों लंबित मुकदमों के नीचे दबी निचली अदालतें हैं. असल संकट सिर्फ यह नहीं है कि अपराधी को कौन पकड़ता है, बल्कि यह है कि उस मामले को उसके सही अंजाम तक कौन पहुंचाता है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »