अभिजीत डिपके की “कॉकरोच जनता पार्टी” हमें यह तो बताती है कि भारत के युवा कितने नाराज और तंग आ चुके हैं. मजाक और व्यंग्य के तौर पर यह शानदार काम करती है. लेकिन जब बात असली राजनीति की आती है, तो इसके सामने कई गंभीर समस्याएं नजर आती हैं और यही फर्क मायने रखता है.
हम उस दौर में हैं, जहां डिजिटल स्पेस में किसी चीज का वायरल होना ही क्रांति का पैमाना बन चुका है, लेकिन इतिहास गवाह है कि महज आक्रोश से कभी भी स्थायी तब्दीली नहीं आती. 'कॉकरोच पार्टी' ने युवाओं के भीतर पनप रहे असली दर्द और परेशानियों को बेबाकी से सामने तो रखा, लेकिन यह भी दिखा दिया कि जब कोई आंदोलन ठोस और व्यावहारिक एजेंडे की जगह सिर्फ प्रतीकों और परफॉर्मेंस के इर्द-गिर्द सिमट जाता है, तो वह बदलाव लाने के बजाय सिर्फ एक तमाशा बनकर रह जाता है.
पूरा आंदोलन तंज, व्यंग्य और मीम्स पर चलता है. इससे लोगों का ध्यान जरूर खींचा जा सकता है, लेकिन किसी देश को सिर्फ चुटकुलों के सहारे नहीं चलाया जा सकता. एक वक्त के बाद मुश्किल सवालों के जवाब देने ही पड़ते हैं. नौकरियां कैसे पैदा होंगी? अर्थव्यवस्था को लेकर क्या योजना है? टैक्स, पुलिस सुधार या विदेश नीति पर क्या सोच है? कॉकरोच पार्टी इन सवालों से ज्यादातर बचती हुई नजर आती है और यह कोई संयोग नहीं है. अस्पष्टता का फायदा यह होता है कि हर कोई साथ बना रहता है. जैसे ही कोई ठोस स्टैंड लिया जाता है, मतभेद शुरू हो जाते हैं.
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क्या सच में युवाओं की आवाज है कॉकरोच जनता पार्टी?
एक खतरा यह भी है कि यह आंदोलन लोगों को लगातार नकारात्मक और निराशावादी बना सकता है. सरकार की आलोचना करना लोकतंत्र के लिए जरूरी है, लेकिन लोकतंत्र को ऐसे लोगों की भी जरूरत होती है जो मानें कि हालात सुधर सकते हैं. जब अदालतें, मीडिया, चुनाव और विश्वविद्यालय जैसी हर संस्था सिर्फ मज़ाक का विषय बन जाए, तो लोग उन्हें सुधारने की कोशिश ही छोड़ देते हैं. यह बगावत नहीं, बल्कि हार मान लेना है.
आंदोलन दावा करता है कि वह संघर्ष कर रहे आम युवाओं की आवाज़ है. लेकिन जरा देखिए कि इसे आगे बढ़ाने वाले लोग कौन हैं. ज्यादातर अंग्रेज़ी बोलने वाले, शहरों में रहने वाले और लगातार ऑनलाइन रहने वाले युवा. भारत के गांवों के युवा, प्रवासी मजदूर और वे लोग जिनके पास स्मार्टफोन तक नहीं हैं, इस तस्वीर में लगभग गायब हैं. इंटरनेट पर लोकप्रिय होना और जमीनी समर्थन हासिल करना, दोनों अलग-अलग बातें हैं.
दूसरी बड़ी समस्या यह है कि यह लगभग एक व्यक्ति का शो बनकर रह गया है. इस आंदोलन के इर्द-गिर्द जितनी चर्चा है, उसका बड़ा हिस्सा खुद डिपके को लेकर है. जो आंदोलन किसी एक चेहरे पर टिके होते हैं, वे उस व्यक्ति के लड़खड़ाते ही बिखरने लगते हैं. असली राजनीतिक संगठनों को ढांचा चाहिए, प्रशिक्षित लोग चाहिए और साफ विचारधारा चाहिए. सिर्फ करिश्माई चेहरा काफी नहीं होता. अरविंद केजरीवाल का उदाहरण सामने है.
गुस्से से भरे, बिना नेतृत्व वाले ऑनलाइन आंदोलन अक्सर साजिश फैलाने वालों, अफवाहों और गलत तत्वों के आसान निशाने बन जाते हैं. सोशल मीडिया का पूरा मॉडल ही नाराज़गी और उत्तेजना को बढ़ावा देता है. अगर साफ सिद्धांत और सीमाएं न हों, तो ऐसे मंच बहुत जल्दी अराजक और खतरनाक दिशा में जा सकते हैं.
एक असहज सच्चाई यह भी है कि शायद सरकार को इस तरह का विपक्ष पसंद ही आता हो. मीम और वायरल पोस्ट वाले विद्रोह उस ऊर्जा को बिखेर देते हैं, जो गंभीर चुनावी चुनौती में बदल सकती थी. किसी सरकार के लिए मज़ाक उड़ाया जाना उतना बड़ा खतरा नहीं होता. असली डर संगठित, अनुशासित और जमीनी विपक्ष से होता है.
कॉकरोच का चुनाव-चिह्न भी कुछ हद तक उल्टा असर डालता है. हां, कॉकरोच हर हाल में जिंदा रहने वाले जीव माने जाते हैं. लेकिन उनकी पहचान गंदगी और संक्रमण से भी जुड़ी होती है. एक बार कोई प्रतीक लोगों के बीच चला जाए, तो वह अपनी अलग जिंदगी जीने लगता है.
आंदोलन के भीतर एक और प्रवृत्ति बढ़ती दिख रही है. विशेषज्ञों की राय और जटिल नीतियों को “एस्टैब्लिशमेंट की चाल” कहकर खारिज कर देना. लेकिन किसी देश को चलाना सचमुच बेहद जटिल काम होता है. सिर्फ माहौल या भावनाओं के सहारे शासन नहीं चलाया जा सकता.
सोशल मीडिया के आंदोलन का भविष्य कैसा?
सबसे बड़ी समस्या यह है कि लाइक्स और ताकत एक ही चीज नहीं हैं. सोशल मीडिया किसी आंदोलन को बहुत विशाल दिखा सकता है. लेकिन ऑनलाइन लोकप्रियता उतनी ही तेजी से गायब भी हो जाती है, जितनी तेजी से आती है. अगला वायरल मुद्दा आते ही लोग पुराने मुद्दे भूल जाते हैं. असली बदलाव के लिए धैर्य चाहिए, लंबी मेहनत चाहिए और संगठन खड़ा करने का वह उबाऊ काम करना पड़ता है, जिसे इंटरनेट का दौर और भी मुश्किल बना देता है.
इसका मतलब यह नहीं कि युवाओं का गुस्सा झूठा है. भारत के युवा बेरोजगारी, बढ़ती महंगाई और ऐसे राजनीतिक सिस्टम से जूझ रहे हैं जो उन्हें अक्सर अनदेखा करता हुआ लगता है. कॉकरोच पार्टी ने इन मुद्दों को चर्चा के केंद्र में लाने का काम जरूर किया है. लेकिन किसी समस्या की पहचान करना और उसका समाधान निकालना, दोनों बिल्कुल अलग बातें हैं.
संभव है कि यह आंदोलन राजनीतिक ताकत बनने के बजाय एक कल्चरल मूमेंट बनकर रह जाए. एक पूरी पीढ़ी का यह कहना कि “हम ऊब चुके हैं”, और वह भी हास्य और व्यंग्य के जरिए, क्योंकि उन्हें लगता है कि बाकी कोई तरीका काम नहीं कर रहा. इस संकेत को गंभीरता से लेने की जरूरत है. लेकिन जब तक मज़ाक और मीम्स ठोस योजनाओं में नहीं बदलते, तब तक कॉकरोच जनता पार्टी भी शायद उन कई इंटरनेट सनसनीखेज़ घटनाओं की तरह याद की जाएगी, जो बदलाव जैसी लगीं, लेकिन बदलाव बन नहीं सकीं.
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अनिल भसीन