पिछले दिनों कूच बिहार के टीएमसी नेता ने लाऊडस्पीकर पर अनाउंसमेंट करवाया कि जिस-जिस ने मुझे प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के लिए कट-मनी दिया है, वो आकर मुझसे ले जा सकता है. पता चला था कि ग्रामीणों ने इस नेता को पांच हजार से 25 हजार तक कट-मनी दी थी. इसी तरह जलपाईगुड़ी में एक दंपत्ति ने शिकायत की कि उनसे स्थानीय टीएमसी नेता ने PMAY के तहत घर पाने के लिए कट-मनी ली थी, जिसको अब वह लौटा नहीं रहा है. पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार किया है. बंगाल में ऐसे कई मामले रोज खुल रहे हैं. कट-मनी यानी कमीशन, घूस या उगाही. तृणमूल कांग्रेस के चुनावी पतन के पीछे एक बड़ी वजह कट मनी से भी जुड़ती है. भाजपा के बाद अब तृणमूल कांग्रेस के असंतुष्ट नेता भी अभिषेक बनर्जी को कट-मनी का किंगपिन बता रहे हैं.
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के ऐतिहासिक नतीजों ने बंगाल की सियासत को पूरी तरह से पलट दिया है. 15 साल से सत्ता पर काबिज तृणमूल कांग्रेस को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है और वह महज 80 सीटों पर सिमट गई है. इस हार के बाद जहां ममता बनर्जी की साख को गहरा धक्का लगा है, वहीं पार्टी के भीतर सबसे ज्यादा फजीहत और गुस्से का केंद्र उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी बने हुए हैं. टीएमसी के भीतर अभिषेक के खिलाफ खुली बगावत हो रही है और सड़क पर उनके समर्थकों को कार्यकर्ताओं के गुस्से का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि ममता बनर्जी से कहां चूक हो गई और उन्होंने अभिषेक को अपनी 'कमजोर नस' क्यों बन जाने दिया?
भारतीय राजनीति का इतिहास गवाह है कि जब-जब किसी बड़े नेता ने अपने परिवार या किसी खास रिश्तेदार को जरूरत से ज्यादा बढ़ावा दिया है, तब-तब पार्टी के भीतर और बाहर असंतोष भड़का है. ऐसे में वो नेता ज्यादा मंझा हुआ माना गया, जिसने हालात बिगड़ने से पहले संभाल लिया. एक दिलचस्प तुलना ममता बनर्जी और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की जा सकती है, जहां दोनों इसी तरह के चैलेंज से गुजरीं. लेकिन, उनके रिएक्शन अलग-अलग रहे. दोनों राजनीति के ऐसे कद्दावर चेहरे, जिन्होंने शून्य से शुरुआत करके अपने दम पर विशाल साम्राज्य खड़े किए. दोनों ही जुझारू हैं, जमीन से जुड़ी और अपने वोट बैंक पर मजबूत पकड़ रखने वाली नेता हैं. लेकिन 'भतीजा-प्रबंधन' यानी अपने राजनीतिक वारिस को संभालने के मोर्चे पर ममता बनर्जी इस खेल में मायावती से काफी पिछड़ गईं.
अभिषेक का प्री-मेच्योर प्रमोशन!
ममता बनर्जी ने 2011 में बंगाल की सत्ता में आते ही अभिषेक बनर्जी को तृणमूल यूथ कांग्रेस का अध्यक्ष बना. महज 26 साल की उम्र में वे 2014 का लोकसभा चुनाव जीतकर संसद में पहुंच गए. अपनी छोटी से राजनीतिक यात्रा में उन्होंने अपनी पहचान तीखे बयान देने वाले नेता के रूप में बनाई. उनका आत्मविश्वास बढ़ता जा रहा था, और ममता बनर्जी से मिलने वाली ढील भी. 2016 के विधानसभा चुनाव प्रचार में तो वे अमित शाह और मोदी से सीधे मोर्चा ले रहे थे. तृणमूल को बंगाल में दूसरी बार मौका मिला, और ‘नंबर 2’ की पोजिशन. उनके बढ़ते कद के आगे पार्टी के वरिष्ठ नेता किनारे और असंतुष्ट होते जा रहे थे, और ममता बनर्जी इस सबसे बेपरवाह. 2022 में तो अभिषेक को यह कहते हुए भी सुना गया कि राजनेताओं को 60 की उम्र में रिटायर हो जाना चाहिए. विश्लेषकों ने माना कि वे ममता को किनारे कर तृणमूल पर जल्द से जल्द पूरा कब्जा चाहते हैं.
टीएमसी का राष्ट्रीय महासचिव बनने के बाद पार्टी संगठन और चुनाव से जुड़े सारे फैसले अभिषेक के हाथ में चले गए. अभिषेक बनर्जी ने पार्टी के पुराने ढर्रे को बदलने की कोशिश की, जिसे 'कॉर्पोरेट स्टाइल पॉलिटिक्स' कहा गया. उन्होंने चुनावी रणनीतिकारों (जैसे आई-पैक) की मदद से पुराने नेताओं को किनारे करना शुरू कर दिया. नतीजा यह हुआ कि कभी ममता के सबसे वफादार रहे शुभेंदु अधिकारी जैसे कद्दावर नेता पार्टी छोड़कर भाजपा में चले गए, जिन्होंने आज ममता को सत्ता से बेदखल कर मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल कर ली है. चुनाव हारने के बाद पार्टी के एक पूर्व विधायक ने खुलकर कहा कि "अभिषेक के सत्ता के अहंकार और भाई-भतीजावाद ने पूरी पार्टी को बर्बाद कर दिया. ममता बनर्जी सब कुछ जानती थीं, लेकिन भतीजे के मोह में वे 'धृतराष्ट्र' बनी रहीं और कुछ नहीं कर सकीं." इसके उलट ऐसी ही परिस्थिति जब मायावती के सामने आई तो उन्होंने भतीजे आकाश आनंद को को बसपा के नेशनल कोऑर्डिनेटर के पद से हटा दिया और साफ कहा कि "जब तक आकाश पूरी तरह से मैच्योर नहीं हो जाते, तब तक वे इस बड़े पद पर नहीं रहेंगे."
'भाइपो टैक्स' वाले भाजपाई हमले पर ढाल बनी रही ममता
भाजपा ने अभिषेक बनर्जी को ममता बनर्जी की सबसे कमजोर नस के रूप में इस्तेमाल किया. कोयला तस्करी, मवेशी तस्करी और शिक्षक भर्ती घोटाले जैसे मामलों में केंद्रीय एजेंसियों (ईडी और सीबीआई) की जांच की सुई हमेशा अभिषेक के इर्द-गिर्द घूमती रही. भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने पूरे चुनाव में यह नैरेटिव सेट कर दिया कि ममता बनर्जी भले ही खुद सादगी से रहती हों और हवाई चप्पल पहनती हों, लेकिन उनका भतीजा और उनका परिवार भ्रष्टाचार और सिंडिकेट राज चला रहा है. अमित शाह और सुवेंदु अधिकारी ने चुनावी रैलियों में बार-बार 'भाइपो टैक्स' (भतीजा टैक्स) का जिक्र कर जनता के मन में यह बात बैठा दी कि ममता सरकार का एकमात्र लक्ष्य अभिषेक बनर्जी को अगला मुख्यमंत्री बनाना है. ममता हर बार अपने भतीजे के बचाव में उतरती रहीं, जिससे जनता में यह संदेश गया कि वे राज्य की कानून व्यवस्था से ज्यादा अपने भतीजे की ढाल बनी हुई हैं.
ममता बनर्जी से कहां चूक हुई? तीन बड़े कारण
भतीजे के मोह में कमजोर हुईं दीदी: ममता बनर्जी ने हमेशा खुद को एक निस्वार्थ नेता के रूप में पेश किया जिनका कोई परिवार नहीं है, लेकिन अभिषेक के मामले में उनका 'सख्त राजनेता' वाले रूप कमजोर पड़ गया.
फीडबैक सिस्टम और सिंडिकेट राज: अभिषेक के इर्द-गिर्द जो नया कॉर्पोरेट घेरा बना, उसने जमीन की वास्तविक नाराजगी को ममता तक पहुंचने ही नहीं दिया. भ्रष्टाचार और नौकरियों की धांधली को 'विरोधियों की साजिश' बताकर खारिज किया जाता रहा, जबकि जनता के भीतर गुस्सा खौल रहा था.
समय रहते लगाम न लगाना: राजनीति में अगर कोई नया नेता स्थापित जमीनी नेताओं को चुनौती देने लगे, तो शीर्ष नेतृत्व को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए. ममता ने अभिषेक को रोकने के बजाय उन्हें 'फ्री हैंड' दे दिया, जिससे अंततः टीएमसी के टूट जाने का खतरा खड़ा हो गया है.
भविष्य की राजनीति के लिए सबक
2026 के विधानसभा चुनाव के नतीजों ने तृणमूल कांग्रेस के 15 साल के वर्चस्व का अंत कर दिया है. यह हार केवल एक सत्ता परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह ममता बनर्जी के 'पुत्रवत भतीजे' के प्रति अत्यधिक मोह पर जनता का सीधा प्रहार है. ममता बनर्जी आज भी एक बड़ी नेता मानी जाती हैं, लेकिन अभिषेक बनर्जी को बिना संघर्ष के सीधे शीर्ष पर बैठाने की उनकी जिद ने पूरी पार्टी को मलबे में तब्दील कर दिया है.
अगर ममता बनर्जी ने मायावती के 'भतीजा-प्रबंधन' से थोड़ा भी सबक लिया होता, समय पर अभिषेक को झिड़की दी होती और पार्टी के सिद्धांतों को परिवार से ऊपर रखा होता, तो आज बंगाल में टीएमसी का यह हश्र नहीं होता. मायावती ने यह साबित किया कि परिवारवाद के दौर में भी अगर नेता के पास 'कंट्रोल और अनुशासन' का हंटर हो, तो पार्टी को बिखरने से बचाया जा सकता है. ममता बनर्जी के लिए अब यह अस्तित्व की लड़ाई है. या तो वे अभिषेक को सुपर बॉस की भूमिका से हटाकर जमीन पर संघर्ष करने के लिए कहें, अन्यथा बची-खुची टीएमसी भी इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाएगी.
धीरेंद्र राय