कभी पानी की घोर किल्लत से जूझने वाले कूनो के जंगलों की रौनक लौट आई है. चीता प्रोजेक्ट के चलते कूनो नेशनल पार्क ने न सिर्फ लुप्तप्राय वन्यजीवों को वापस बुलाया है, बल्कि स्थानीय समुदायों जिंदगी में भी रोजगार के जरिए नई उम्मीद जगाई है.
दरअसल, कूनो नेशनल पार्क के जिन पथरीले और ऊंचे इलाकों में पानी की कमी के कारण वन्यजीव गर्मी के मौसम में पलायन कर जाते थे, वहां अब वन विभाग के बेहतरीन मैनेजमेंट से कूनो नदी का पानी पहुंच रहा है. पानी की इस पहुंच को बढ़ाने के लिए पार्क में मॉडर्न टेक्नोलॉजी यानी सोलर पंप का सहारा लिया गया है.
पहला प्रयोग
दो साल पहले कूनो के वेस्ट पालपुर रेंज के जंगलों में चुपचाप एक सफल प्रयोग शुरू किया गया था. यहां 22.5 हॉर्स पावर के सोलर पावर्ड सिस्टम के जरिए कूनो नदी से पानी उठाया गया और लगभग 8 किमी दूर विषम ग्रीष्मकालीन इलाके से गुजारते हुए 5 सूखे तालाबों को भरा गया.
दूसरा बड़ा सिस्टम
इस साल इस प्रयोग को और बड़ा रूप दिया गया. ऑच्छापुरा रेंज में 42.5 हॉर्स पावर क्षमता का दूसरा सोलर-आधारित जल उठाने वाला सिस्टम सक्रिय किया गया है. यह सोलर पंप कूनो नदी से पानी उठाकर लगभग 15 किमी दूर ले जा रहा है और करीब 200 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर स्थित तीन तालाबों को ग्रीष्म के चरम समय में भर रहा है. इन कोशिशों के चलते जो तालाब पहले गर्मियों में पूरी तरह सूख जाते थे, वे अब पानी से लबालब भरे रहते हैं.
दशकों बाद 'भुलाए हुए प्राणियों' की वापसी
बेहतर ईको सिस्टम और अच्छे वन प्रबंधन के कारण कूनो में ऐसे जीवों की मौजूदगी दर्ज की जा रही है, जो पहले कभी यहां नहीं देखे गए या दशकों से गायब थे.
जंगली उल्लू: दुनिया से विलुप्त माने गए इस दुर्लभ वन उल्लू को 1990 के दशक में मध्य प्रदेश-महाराष्ट्र सीमा पर दोबारा देखा गया था, लेकिन कूनो के इतिहास में इसका कभी कोई उल्लेख नहीं था. कूनो में 113 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद इसकी मौजूदगी दर्ज हुई है और दिसंबर 2025 से यह यहां नियमित रूप से दिखाई दे रहा है.
जंगली कुत्ता (ढोल): कूनो के इतिहास में पहली बार जंगली कुत्तों (ढोल) की मौजूदगी दर्ज की गई है, जिसे विशेषज्ञ बेहतर होती पारिस्थितिकी का एक बड़ा और खास संकेत मान रहे हैं.
भारतीय भेड़िया: भेड़िया पहले गर्मियों के मौसम में इस इलाके को छोड़कर चला जाता था और सिर्फ पुरानी रिपोर्टों में ही उसकी यादें बची थीं, लेकिन अब सुधरे हालातों के कारण वह इस क्षेत्र का नियमित और स्थायी रहवासी बन गया है.
सन्नाटे की जगह गूंज रही है वन्यजीवों की पुकार
इस जल क्रांति ने कूनो के परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया है. पहले इन जंगलों में ग्रीष्मकाल बेहद कठोर, सूखा और मौन होता था, जहां जानवर पानी के लिए नदी तक लंबी दूरी तय करते थे और गर्मी से पृथ्वी फट जाती थी. कुछ साल पहले तक यहां सबसे ज्यादा मवेशियों की घंटियों की आवाजें आती थीं.
लेकिन अब कूनो बदल चुका है. शाम होते ही धूल भरी रास्तों से चीतल की लंबी कतारें निकलती हैं और सांभर तालाबों के किनारे मद्धिम प्रकाश में खड़े दिखाई देते हैं. नीलगाय अब पानी की तलाश में भटकती नहीं, बल्कि इस ग्रीष्म जंगल की स्थायी निवासी बन गई हैं.
शाम होते ही तेंदुए तालाबों के आसपास नरम कदमों से घूमते हैं और दूर पहाड़ियों से सियारों की आवाजें रात के आगमन की घोषणा करती हैं. मवेशियों की घंटियों का स्थान अब जंगली सन्नाटे, पक्षियों की चहचहाहट और वन्यजीवों की गूंजती पुकारों ने ले लिया है.
पर्यटन से बदला स्थानीय अर्थशास्त्र
कूनो के आसपास इलाके में बढ़ते पर्यटन और निरंतर निवेश ने स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत किया है. पर्यटकों की बढ़ती संख्या से आसपास के छोटे-छोटे व्यवसाय बढ़ रहे हैं और नई संभावनाएं उभर रही हैं. कूनो के स्थानीय युवाओं को अब बड़े पैमाने पर नेचर गाइड, सुरक्षा से जुड़े काम, टूरिज्म सर्विस रोजगार मिल रहे हैं. इन आर्थिक बदलावों के कारण दशकों बाद क्षेत्र के कई चेहरों पर मुस्कान लौट आई है.
इनका कहना
PCCF (वाइल्ड लाइफ) समीता राजौरा ने बताया, ''यह अम्ब्रेला इफेक्ट है. कूनो में चीतों के लिए किए जा रहे संरक्षण का लाभ अन्य वन्यजीवों, जंगलों और जल स्रोतों को भी मिल रहा है. गर्मियों में सूखने वाले तालाबों को सोलर पंप के जरिए पानी से भरना फॉरेस्ट मैनेजमेंट का बेहतरीन उदाहरण है, जिससे कूनो का इकोसिस्टम लगातार मजबूत हो रहा है. जब हम प्रकृति का संरक्षण करते हैं, तो प्रकृति भी हमारी रक्षा करती है."
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