कुदरत से खिलवाड़...? इस बच्चे में सिर्फ मां-बाप का नहीं, है तीसरे का भी अंश

लोग जहां इसे सकारात्मक तरीके से देख रहे हैं वहीं कुछ लोगों का मानना है कि ये प्रकृति के नियमों से खिलवाड़ करने जैसा है. वहीं इस प्रक्रिया को एक अच्छी पहल मानने वालों की भी कमी नहीं है.

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थ्री पैरेंट टेक्नीक (डेमो पिक) थ्री पैरेंट टेक्नीक (डेमो पिक)

भूमिका राय

  • नई दिल्ली,
  • 28 सितंबर 2016,
  • अपडेटेड 12:17 PM IST

एक बच्चे में उसके मां और पिता दोनों के डीएनए होते हैं. आज तक तो ऐसा ही होता आया है लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है कि एक बच्चे का जन्म थ्री पेरेंट टेक्नीक से हुआ है.

पांच महीने के बच्चे में मां और पिता का डीएनए तो है ही साथ ही एक तीसरे शख्स का भी है. बच्चे के शरीर में डोनर का जेनेटिक कोड भी है.

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ये दुनिया का पहला ऐसा बच्चा है जिसमें तीन लोगों का जेनेटिक कोड है. वैज्ञानिकों ने भी थ्री पर्सन फर्टिलिटी टेक्नीक से पैदा हुए इस

हालांकि इस टेक्नीक की काफी आलोचना भी हो रही है. इस प्रयोग की समीक्षा करने वाले कुछ लोगों को मानना है कि ये नेचर से खिलवाड़ करने जैसा है. मेक्स‍िको में हुआ ये प्रयोग इस तरह का दुनिया का पहला प्रयोग है.

अगर आलोचकों का ये मानना है तो इस प्रयोग के पक्ष में भी कई लोगों ने अपनी बात रखी है. उनका कहना है कि बहुत से मामले होते हैं जिसमें कई बार महिलाओं को कुछ खास किस्म की जेनेटिक बीमारियां होती हैं. बच्चे की मां बन सकती हैं.

न्यू साइंटिस्ट मैगजीन ने इस अनोखे बच्चे का जिक्र करते हुए कहा है कि बच्चा अभी पांच महीने का ही है. उसके माता-पिता जॉर्डन से हैं और ये प्रक्रिया अमेरिका के कुछ विशेषज्ञों द्वारा पूरी की गई है.

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बच्चे की मां को Leigh syndrome है. ये एक किस्म का डिस्ऑर्डर है, जो नर्वस सिस्टम पर डालता है और हो सकता था कि ये मॉइटोकॉन्ड्रियल डीएनए से आगे ट्रांसफर हो जाए. हालांकि वो पूरी तरह से स्वस्थ हैं लेकिन उनके दो बच्चों की मौत अनुवांशिक बीमारी के चलते हो चुकी है.

थ्री पैरेंट बेबी के कई तरीके हैं. न्यू यॉर्क में न्यू होप फर्टिलिटी क्लीनिक डॉक्टर जॉन झांग ने मां के अंडाणु से न्यूक्ल‍ियस लिया और उनके डीएनए को डोनर के अंडाणु में इंप्लांट किया, जिसकी वजह से न्यूक्ल‍ियस तो हट गए लेकिन डोनर के हेल्दी माइटटोकॉन्ड्रियल बरकरार रहे. माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए, कोशिकाओं को ताकत देने का काम करता है.

हालांकि कई देशों में इस तकनीक को मान्यता नहीं मिली है. कुछ लोग जहां इसे सकारात्मक तरीके से देख रहे हैं वहीं कुछ लोगों का मानना है कि ये प्रकृति के नियमों से खिलवाड़ करने जैसा है. वहीं इस प्रक्रिया को एक अच्छी पहल मानने वालों की भी कमी नहीं है. उनका कहना है कि अगर इस प्रक्रिया को अपनाने से बच्चे की सेहत को लेकर डर खत्म हो जाता है तो इसमें कोई बुराई नहीं है.

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