DK शिवकुमार 3 जून को कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं. उनके सामने शुरुआती दिनों में ही एक ऐसा फैसला आने वाला है, जो राजनीतिक तौर पर बेहद संवेदनशील माना जा रहा है. ये मामला बेंगलुरु के महत्वाकांक्षी टनल रोड प्रोजेक्ट का है, जिसकी सबसे कम बोली अडानी एंटरप्राइजेज ने लगाई है.
यह एक ऐसा मुद्दा है, जहां कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति और राज्य में विकास की जरूरतें आमने-सामने खड़ी दिखाई देती हैं. राहुल गांधी पिछले कई वर्षों से अडानी समूह को लेकर केंद्र की मोदी सरकार पर हमले करते रहे हैं. दूसरी तरफ कांग्रेस शासित राज्यों में अडानी समूह के साथ कई बड़े निवेश औपर काम भी जारी है.
ऐसे में मुख्यमंत्री बनने जा रहे DK शिवकुमार के सामने यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या वो अपने ड्रीम प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने के लिए अडानी समूह की बोली को मंजूरी देंगे या फिर कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति के अनुरूप कोई दूसरा रास्ता तलाशेंगे. इस प्रोजेक्ट को वो शहर के लिए गेमचेंजर इंफ्रास्ट्रक्चर बताते रहे हैं.
उपमुख्यमंत्री और बेंगलुरु विकास मंत्री रहते हुए उन्होंने इस परियोजना को लगातार आगे बढ़ाया. करीब 17 किलोमीटर लंबी प्रस्तावित टनल रोड का मकसद बेंगलुरु में बढ़ते ट्रैफिक दबाव को कम करना है. पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल पर तैयार इस परियोजना की लागत 17,698 करोड़ बताई गई है.
टेंडर प्रक्रिया में अडानी एंटरप्राइजेज सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी के रूप में सामने आई है. हालांकि कंपनी की बोली सरकार के लागत अनुमान से अधिक बताई जा रही है. यही वजह है कि अंतिम निर्णय के लिए कैबिनेट की मंजूरी जरूरी होगी. फिलहाल अडानी समूह सर्वे और मिट्टी परीक्षण का काम कर रहा है.
'द इकोनॉमिक टाइम्स' की एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रस्ताव अभी भी पहले चरण की मंजूरी के लिए DK शिवकुमार के स्तर पर लंबित है. वैसे राजनीतिक रूप से सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि मुख्यमंत्री बनकर DK शिवकुमार अडानी समूह की बोली को मंजूरी देते हैं, तो कांग्रेस पर दोहरे मापदंड का आरोप लगा सकता है.
राहुल गांधी ने पिछले कई वर्षों से गौतम अडानी को कथित "क्रोनी कैपिटलिज्म" का प्रतीक बताते हुए केंद्र सरकार पर निशाना साधा है. संसद से लेकर चुनावी मंचों तक कांग्रेस ने अडानी मुद्दे को अपने प्रमुख राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा बनाया. ऐसे में कर्नाटक में अडानी समूह की बोली मंजूरी सवाल उठना तय है.
दिलचस्प बात यह है कि राष्ट्रीय राजनीति में अडानी समूह को लेकर तीखे हमलों के बावजूद कांग्रेस शासित राज्यों ने कभी भी अडानी समूह से दूरी बनाने की नीति नहीं अपनाई. तेलंगाना में मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी की सरकार ने अडानी समूह के साथ 12,400 करोड़ रुपए से ज्यादा के निवेश समझौतों को मंजूरी दी है.
वहीं केरल में अडानी समूह द्वारा संचालित विझिंजम पोर्ट प्रोजेक्ट को राजनीतिक समर्थन मिलता रहा है. इसको 2015 में UDF सरकार के दौरान मंजूरी मिली थी. अब इसके विस्तार की दिशा में भी काम आगे बढ़ रहा है. इसकी सफलता ऐसी रही है कि उसके राजनीतिक श्रेय को लेकर प्रतिस्पर्धा देखने को मिली है.
यही कारण है कि राजनीतिक जानकार मानते हैं कि कांग्रेस नेतृत्व के DK शिवकुमार पर अडानी की बोली खारिज करने का दबाव बनाने की संभावना बेहद कम है. यही सवाल अब राजनीतिक बहस का केंद्र बनता जा रहा है. विपक्ष निश्चित रूप से इस मुद्दे को उठाएगा और कथनी करनी में अंतर बताएगा.
ये सवाल भी उठ सकता है कि यदि अडानी समूह निवेश, इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास परियोजनाओं के लिए उपयुक्त है तो फिर राष्ट्रीय स्तर पर उसके खिलाफ अभियान क्यों चलाया जाता है. दूसरी तरफ कांग्रेस यह तर्क दे सकती है कि किसी भी प्रोजेक्ट में सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी को बाहर नहीं कर सकते.
राजनीतिक दुविधा के अलावा इस परियोजना को लेकर जमीन पर भी विरोध जारी है. कर्नाटक विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष आर. अशोक और भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या लगातार इस योजना का विरोध करते रहे हैं. वो इसको VIP लेन कह रहे हैं. उनका कहना है कि इससे वास्तविक ट्रैफिक समस्याओं का समाधान नहीं होगा.
उन्होंने सरकार से मेट्रो नेटवर्क के विस्तार और उसे तेजी से पूरा करने पर ध्यान देने की मांग की है. भाजपा का कहना है कि मेट्रो बेंगलुरु की ट्रैफिक समस्या का अधिक व्यावहारिक और समावेशी समाधान हो सकता है. तेजस्वी सूर्या ने भी इस परियोजना को "अमीरों द्वारा, अमीरों के लिए" बताया है.
पर्यावरण विशेषज्ञों ने भी गंभीर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि बेंगलुरु की भूगर्भीय संरचना अत्यंत संवेदनशील है. शहर कठोर चट्टानी सतह, प्राकृतिक जल विभाजकों और भूमिगत जलभंडारों पर आधारित एक जटिल भूगर्भीय तंत्र पर विकसित हुआ है. बड़े पैमाने पर सुरंग निर्माण से भूजल स्तर प्रभावित हो सकता है.
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