कवर तो धुलते हैं... क्या आप जानते हैं ट्रेन में मिलने वाले तकिए कितने महीने में धुलते हैं?

भारतीय रेलवे के पुराने नियमों के अनुसार एसी कोच में मिलने वाले तकियों को 24 महीने तक इस्तेमाल किया जाता था और उनकी नियमित धुलाई का कोई प्रावधान नहीं था. केवल तकिए के कवर साफ किए जाते थे. हालांकि 2016 के बाद रेलवे ने नियम बदल दिए और अब तकियों को कम से कम हर 6 महीने में एक बार धोना अनिवार्य कर दिया गया है.

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साल 2016 के बाद रेलवे ने तकियों की सफाई को लेकर नया निर्देश जारी किया. ( Photo: ITG) साल 2016 के बाद रेलवे ने तकियों की सफाई को लेकर नया निर्देश जारी किया. ( Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 17 जून 2026,
  • अपडेटेड 2:24 PM IST

भारतीय रेलवे में हर दिन लाखों लोग सफर करते हैं. खासकर एसी कोच में यात्रा करने वाले यात्रियों को रेलवे की ओर से बेडरोल किट दी जाती है, जिसमें चादर, कंबल, तौलिया और तकिया शामिल होता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस तकिए पर आप सिर रखकर सोते हैं, उसे कितनी बार धोया जाता है? यह सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है, क्योंकि तकिए के ऊपर लगा कवर तो नियमित रूप से धुलता है, लेकिन अंदर का तकिया कितनी बार साफ किया जाता है, इसकी जानकारी बहुत कम लोगों को होती है.

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2016 से पहले क्या था नियम?
रेलवे के पुराने नियमों के अनुसार एसी कोच में दिए जाने वाले तकिए की सर्विस लाइफ 24 महीने यानी 2 साल होती थी. इसका मतलब था कि एक तकिए का इस्तेमाल लगभग दो साल तक किया जा सकता था. हैरानी की बात यह है कि उस समय तकियों की नियमित धुलाई के लिए कोई अलग नियम तय नहीं था. रेलवे केवल तकिए के कवर को धोता था, लेकिन अंदर के तकिए को साफ करने या धोने का कोई निर्धारित प्रावधान नहीं था. इस वजह से लगातार इस्तेमाल, अलग-अलग यात्रियों के संपर्क और बार-बार हैंडलिंग के कारण तकियों पर गंदगी और दाग जमा हो जाते थे. कई बार तकिए के कवर के अंदर तक धूल, पसीना और अन्य गंदगी पहुंच जाती थी, जिससे तकिए खराब और बदरंग दिखाई देने लगते थे.

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रेलवे को क्यों बदलना पड़ा नियम?
रेलवे के सामने यात्रियों की स्वच्छता और स्वास्थ्य से जुड़े सवाल उठने लगे. यात्रियों को साफ और हाइजीनिक बेडरोल उपलब्ध कराने के लिए इस व्यवस्था में बदलाव की जरूरत महसूस हुई. इसी दौरान पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे (NF Railway) ने अपनी मैकेनाइज्ड लॉन्ड्री में तकियों को धोने का टेस्ट किया. इस टेस्ट के नतीजे काफी अच्छे पाए गए. जांच में पता चला कि तकियों को मशीन से आसानी से धोया जा सकता है और उनकी क्वालिटी पर भी कोई खास असर नहीं पड़ता. इसके बाद रेलवे ने इस विषय पर गंभीरता से विचार किया और नई व्यवस्था लागू करने का फैसला लिया.

2016 के बाद क्या बदला?
साल 2016 के बाद रेलवे ने तकियों की सफाई को लेकर नया निर्देश जारी किया. नए नियम के अनुसार अब एसी कोच में इस्तेमाल होने वाले तकियों को कम से कम हर 6 महीने में एक बार धोना जरूरी कर दिया गया. अगर किसी तकिए की स्थिति खराब हो जाए या वह ज्यादा गंदा दिखाई दे, तो उसे 6 महीने से पहले भी धोया जा सकता है. यानी रेलवे ने यह व्यवस्था बनाई कि यात्रियों को साफ-सुथरे और स्वच्छ तकिए उपलब्ध कराए जाएं. हालांकि तकिए की कुल सेवा अवधि अभी भी 24 महीने तक हो सकती है, लेकिन इस दौरान उसकी नियमित सफाई की जाती है ताकि वह उपयोग के योग्य बना रहे.

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यात्रियों को क्या फायदा हुआ?
इस बदलाव के बाद एसी कोच में मिलने वाले तकियों की स्वच्छता पहले की तुलना में काफी बेहतर हुई है. नियमित धुलाई से तकियों में जमा धूल, दाग और गंदगी कम होती है, जिससे यात्रियों को अधिक आरामदायक और साफ यात्रा अनुभव मिलता है. साथ ही स्वच्छ तकिए स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बेहतर माने जाते हैं, क्योंकि लंबे समय तक बिना धुले तकियों में बैक्टीरिया और जस्ट जमा हो सकते हैं.

अगर आप एसी ट्रेन में सफर करते हैं और सोचते हैं कि तकिए केवल कवर बदलकर दोबारा इस्तेमाल कर लिए जाते हैं, तो अब ऐसा नहीं है. 2016 से पहले तकियों की नियमित धुलाई का कोई नियम नहीं था और उन्हें लगभग 24 महीने बाद बदला जाता था. लेकिन अब रेलवे के नियमों के अनुसार तकियों को कम से कम हर 6 महीने में एक बार धोया जाता है, ताकि यात्रियों को साफ, स्वच्छ और आरामदायक बेडरोल उपलब्ध कराया जा सके. यह बदलाव रेलवे की स्वच्छता और यात्री सुविधा को बेहतर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है.

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