60 रुपये किलो आते हैं... जानिए सरोजनी नगर वाले सस्ते ब्रांडेड कपड़ों का सच

आपने देखा होगा कि बाजार में ब्रांडेड कपड़ों के नाम पर सस्ते कपड़े बेचे जा रहे हैं. ऐसे में जानते हैं कि सस्ते में मिलने वाले इन ब्रांडेड कपड़ों की सच्चाई क्या है?

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ब्रांडेड कपड़ों के नाम इस्तेमाल किए हुए कपड़े भी बेचे जा रहे हैं. (Photo: AI Generated) ब्रांडेड कपड़ों के नाम इस्तेमाल किए हुए कपड़े भी बेचे जा रहे हैं. (Photo: AI Generated)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 13 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 7:16 PM IST

दिल्ली समेत भारत के कई शहरों में ऐसे बाजार होते हैं, जहां काफी सस्ते रेट में कपड़े मिलते हैं. जैसे दिल्ली का सरोजनी नगर बाजार. कई लोगों को मानना है कि यहां काफी कम रेट में ब्रांडेड कपड़े मिलते हैं, लेकिन इसकी हकीक कुछ और है. हालांकि, इसे लेकर कई तरह के दावे भी किए गए हैं,  जिनमें कहा गया है कि यहां बिकने वाले कपड़े दान या किसी मरे हुए व्यक्तियों के होते हैं. इन दावों से अलग जानते हैं कि आखिर इन ब्रांडेड कपड़ों की सच्चाई है क्या और ये इतने सस्ते में कैसे मिलते है... 

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कहां से आते हैं ये कपड़े?

पहले तो आपको बता दें कि इन बाजारों में सस्ते में जो कपड़े मिल रहे हैं, वो एक तरह के कपड़े नहीं होते हैं. ऐसे में सीधा नहीं कहा जा सकता है कि ये कहां से आते हैं. इन कपड़ों के बाजार में  आने के अलग-अलग सोर्स होते हैं. इनमें कई कपड़े वो होते हैं, जो हल्की क्वालिटी में ब्रांडेड टैग के साथ बेचे जाते हैं.

इन कपड़ों को लोग फर्स्ट कॉपी वाले कपड़े भी बोलते हैं. लेकिन, अगर क्वालिटी के लिहाज से देखें तो ब्रांडेड कपड़ों और इनमें काफी अंतर होता है. क्वालिटी के नाम पर ये बेहद कमजोर होते हैं. ये दिखने में फले ही ब्रांडेड कपड़ों जैसे दिखते हैं, लेकिन क्वालिटी के पैमाने पर इनमें काफी अंतर आते हैं. 

पानीपत से होता है खेल

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लो क्वालिटी के अलावा जो दूसरे कपड़े यहां आते हैं, उनकी काफी सेल होती है और वो काफी सस्ते में मिलते हैं. दरअसल, भारत दूसरे देशों से बड़ी मात्रा में यूज्ड यानी इस्तेमाल किए हुए कपड़े मंगाता है और उन्हें कई तरह से इस्तेमाल किया जाता है. बाहर से आने वाले इन कपड़ों की पहले छंटाई होती है, जिसमें अलग-अलग कैटेगरी में कपड़ों को बांट दिया जाता है. कुछ कपड़े वो अलग कर दिए जाते हैं, जिन्हें फिर से इस्तेमाल  किया जाता है. 

इसके अलावा कुछ कपड़े वो होते हैं, जिन्हें फिर से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है. ऐसे में उन कपड़ों को अलग करके थ्रेड कंपनियों यानी धागा बनाने वाली कंपनियों को भेज दिया जाता है. ये कंपनियां उनसे धागा बना लेती हैं और उन धागों से चादर, ब्लैंकेट आदि बनाए जाते हैं. बाहर से आने वाले कपड़़ों में सर्दी के कपड़े भी होते हैं. वहीं, जो इस्तेमाल होने वाले कपड़े होने वाले कपड़े होते हैं, उन्हें साइज, मेल-फीमिल, सर्दी गर्मी कलर आदि के आधार पर छांट लिया जाता है. 

इसके बाद इन कपड़ों के पैकेट बना दिए जाते हैं और उन्हें किलो के भाव में बेच दिया जाता है. इन कपड़ों को फिर होलसेलर व्यापारी खरीदकर छोटे व्यापारियों को भेज देते हैं. रिटेलर भी किलो के भाव या फिर पीस के हिसाब से इन्हें सस्ते रेट में खरीद लेते हैं. अलग अलग पैकेट या गांठ के हिसाब से इनके प्राइज डिसाइड होते हैं. कुछ कपड़े तो 60  रुपये किलो के हिसाब से भी बेचे जाते हैं. यूट्यूब पर भी ऐसे कई वीडियो हैं, जिनमें दावा किया जाता है कि पानीपत में कितने कितने रुपये में कपड़े मिल रहे हैं. 

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बाहर से कितना सामान आता है?

भारत में हर साल कई करोड़ किलो यूज किए कपड़े आते हैं. WITS की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के अनुसार, साल 2024 में करीब 160.25 मिलियन किलोग्राम कपड़े विदेश से भारत आए थे, जिसकी वैल्यू करीब 68.2 मिलियन डॉलर थी. इसके अलावा साल 2023 में करीब 188.47 मिलियन किलो सामान मंगाया गया था, जिसकी वैल्यू 94.3 मिलियन डॉलर थी. बता दें कि भारत में सबसे ज्यादा पहने हुए कपड़े अमेरिका से आते हैं,  उसके बाद कनाडा,चीन, ऑस्ट्रेलिया, यूएई, इटली, कोरिया, फ्रांस, जर्मनी आदि देश शामिल हैं. 

साइंस डायरेक्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, यूरोप और अमेरिका में दान किए गए 60% से अधिक इस्तेमाल किए हुए कपड़े विकासशील देशों में निर्यात किए जाते हैं. 
 

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