फेंके हुए कपड़ों से बन रहे सस्ते कंबल? कपड़ा इंडस्ट्री का ये सीक्रेट जान लीजिए

क्या आप जानते हैं कि जो बाजार में कम रेट में जो सस्ते कंबल मिलते हैं, उनकी पीछे की सच्चाई क्या है और किस वजह से ये कम दामों में मिल जाती है?

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पानीपत में फेंके हुए कपड़ों से कंबल बनाने का काम किया जाता है. (photo: AI Generated) पानीपत में फेंके हुए कपड़ों से कंबल बनाने का काम किया जाता है. (photo: AI Generated)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 15 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 2:00 PM IST

क्या आप जानते हैं, जिन कपड़ों को विदेश में रिजेक्ट कर दिया जाता है, उनका क्या होता है? उनमें से कुछ कपड़ों को जरूरतमंद लोगों को दे दिए जाते हैं या धन जुटाने के लिए दान की दुकानों में बेचे जाते हैं. लेकिन, जो कपड़े बेचने लायक नहीं होते या फिर फटे होते हैं तो उनका क्या होता है. तो समझते हैं उनका क्या होता है?

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बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, अक्सर इन कपड़ों को भारत भेजा जाता है, जिससे ये वैश्विक सेकंड-हैंड व्यापार में शामिल हो जाते हैं, जिसमें हर साल दुनिया भर में अरबों पुराने कपड़ों की खरीद-बिक्री होती है. खास तौर पर हरियाणा के पानीपत में इन्हें भेजा जाता है, जिसे दुनिया की ''Cast Off Capital'' कहा जाता है. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि हर रोड ब्रिटेन, अमेरिका और अन्य देशों से सैकड़ों टन कपड़े पानीपत पहुंचते हैं. 

यहां ट्रकों में भर-भरकर कपड़े भारत के पश्चिमी तट पर स्थित बंदरगाह शहर कांडला से यहां आते हैं, जहां जहाज दुनिया भर से पुराने कपड़ों और वस्त्रों से भरे कंटेनर लेकर आते हैं. लेटेस्ट डेटा के हिसाब से भारत इस्तेमाल किए गए कपड़ों का सबसे बड़ा आयातक है, जिसने रूस और पाकिस्तान जैसे देशों को पीछे छोड़ दिया है. भारत में, इस्तेमाल किए गए कपड़ों को दो अलग-अलग कैटेगरी के तहत आयात किया जा सकता है.  एक कैटेगरी में वो कपड़े आते हैं जो खराब हो चुके हों और दूसरी श्रेणी में वे कपड़े आते हैं जो पहनने योग्य हों. 

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क्या हैं सरकार के नियम?

भारत में स्थानीय वस्त्र निर्माताओं की सुरक्षा के लिए, पहनने योग्य कपड़ों के आयातकों को सरकार से लाइसेंस लेना आवश्यक है. यह लाइसेंस तभी जारी किया जाएगा जब खरीदार यह गारंटी दे कि कपड़े भारत में नहीं बेचे जाएंगे, बल्कि इन्हें फिर से निर्यात किया जाएगा. हालांकि, इस्तेमाल किए गए कपड़ों के भारतीय आयात का अधिकांश हिस्सा कटे-फटे कपड़ों के सेगमेंट में होता है, जिसके लिए लाइसेंस की आवश्यकता नहीं होती है. 

मीलों में कपड़ों के साथ क्या होता है?

बीबीसी की रिपोर्ट में बताया गया है कि यहां हर तरफ कपड़े बिखरे होते हैं. चारों ओर जैकेट, स्कर्ट, कार्डिगन, बेरेट और स्कूल यूनिफॉर्म जैसी दिखने वाली चीजों के ढेर लगे होते हैं. हाई-स्ट्रीट ब्रांड से लेकर लग्जरी ब्रांड तक, दान में मिले ज्यादातर कपड़े यहीं आकर मिलते हैं. मजदूर बड़े-बड़े ब्लेडों पर झुके हुए कपड़े फाड़ते रहते हैं और वे वे ज़िप, बटन और लेबल अलग करते हैं. इसके बाद कपड़ों को उनके रंग के अनुसार बड़े-बड़े ढेरों में रखा जाता है. यह कपड़ों को धागे में बदलने की पहली प्रक्रिया है, जिसके बाद उन्हें सुंदर कपड़े में बुना जाता है. 

इन्हें मशीनों के जरिए छोटे-छोटे टुकड़ों में काट दिया जाता है. इसके बाद इसे एक बड़ी मशीन में डाला जाता है जो ऊन, रेशम, कपास और पॉलिएस्टर जैसे किसी भी कृत्रिम रेशे को मिलाती है और इसे कार्डिंग मशीन में भेजती है जो धागे में कातना शुरू कर देती है. इससे हर तीन टन कपड़े से लगभग 1.5 टन धागा बनता है, जिसे वापस बुनकर "घटिया" कपड़ा कहा जाता है. फिर उस घटिया कपड़े का इस्तेमाल मुख्य रूप से कंबल बनाने में किया जाता है.

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ये वो कंबल होते हैं, जो अक्सर दान के काम में आते हैं. जैसे दुनिया में कहीं भी आने वाली हर सुनामी, चक्रवात या भूकंप के दौरान जो कंबल बांटे जाते हैं, वो ये ही होते हैं. इसके अलावा गरीबों को जो कंबल बांटे जाते हैं,वो भी इन्हीं धागों से बनते हैं. 

अफ्रीका जाता है मोटा माल

अफ्रीका यहां बनने वाले कपड़े, पोडक्ट का सबसे बड़ा ग्राहक है. लेकिन, रिपोर्ट में बताया गया है कि अब धंधे का ये तरीका महंगा होता जा रहा है. दरअसल, भारत पहुंचने के बाद सीमा शुल्क, परिवहन, स्टोरेज, बिजली और श्रम लागत जुड़ जाती है. अफ्रीका में हमारे ग्राहक सस्ते कंबल चाहते हैं और हम कीमतें कम रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. पॉलिएस्टर जैसे सस्ते कृत्रिम रेशों से बढ़ते कंपिटिशन ने भी इस इंडस्ट्री को प्रभावित किया है. अब यहां 100 यूनिट भी नहीं है, जो एक वक्त पहले 400 से ज्यादा थीं. 
 

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