क्या आपने कभी सोचा है कि सिगरेट पीने के बाद फेंका गया टुकड़ा किसी पक्षी के काम भी आ सकता है? सुनने में यह अजीब लगता है, लेकिन एक नई रिसर्च में पता चला है कि शहरों में रहने वाले कुछ पक्षी अपने घोंसले में सिगरेट के बचे हुए टुकड़े (सिगरेट बट) रखते हैं. वैज्ञानिकों के मुताबिक, ऐसा वे अपने घोंसले को टिक, माइट और दूसरे छोटे-छोटे परजीवी कीड़ों (पैरासाइट्स) से बचाने के लिए करते हैं. यह रिसर्च एनिमल बिहेवियर जर्नल में प्रकाशित हुई है, जिसे हाल ही में द न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी प्रकाशित किया था. इस स्टडी में पुर्तगाल के कोयम्ब्रा विश्वविद्यालय की रिसर्चर एना क्लॉडिया नॉर्टे भी शामिल थीं, जबकि इस पूरी रिसर्च का नेतृत्व पोलैंड के लॉड्ज़ विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने किया.
आखिर पक्षी सिगरेट के बट क्यों इस्तेमाल कर रहे हैं?
रिसर्चर का उद्देश्य यह समझना था कि शहरी इलाकों में रहने वाले पक्षी, खासकर ब्लू टिट (Blue Tit) प्रजाति, इंसानों द्वारा छोड़े गए कचरे का इस्तेमाल कैसे कर रही है. प्राकृतिक जंगलों में यह पक्षी अपने घोंसले में सुगंधित पौधों की पत्तियां और टहनियां लाते हैं. इन पौधों में ऐसे जहरीले केमिकल होते हैं, जो टिक, माइट, पिस्सू और अन्य परजीवियों को दूर रखने में मदद करते हैं. लेकिन शहरों में ऐसे पौधे आसानी से उपलब्ध नहीं होते. इसलिए वैज्ञानिकों का मानना है कि इन पक्षियों ने एक नया तरीका अपना लिया है. वे सिगरेट के बचे हुए फिल्टर अपने घोंसलों में लाने लगे हैं, क्योंकि उनमें मौजूद निकोटिन और अन्य केमिकल कीड़ों को दूर रखने में मदद कर सकते हैं.
वैज्ञानिकों ने कैसे किया यह प्रयोग?
इस बात की पुष्टि करने के लिए वैज्ञानिकों ने दो अलग-अलग तरह के प्रयोग किए. पहले प्रयोग में प्राकृतिक घोंसलों में इस्तेमाल की हुई सिगरेट के फिल्टर मिलाए गए. दूसरे प्रयोग में प्राकृतिक घोंसलों को हटाकर उनकी जगह काई (Moss) और रुई (Cotton) से बने पूरी तरह से आर्टिफिशियल घोंसले लगाए गए. इसके बाद रिसर्चर ने इन घोंसलों में पल रहे चूजों की सेहत का विस्तार से स्टडी किया. उन्होंने हीमोग्लोबिन, हेमाटोक्रिट, ग्लूकोज स्तर और शारीरिक स्थिति जैसे कई स्वास्थ्य संकेतकों को मापा. साथ ही घोंसलों में मौजूद टिक, माइट, पिस्सू और ब्लोफ्लाई के लार्वा जैसे बाहरी पैरासाइट की संख्या भी गिनी गई.
क्या निकले नतीजे?
रिसर्च के नतीजे काफी दिलचस्प रहे. वैज्ञानिकों ने पाया कि जिन घोंसलों में सिगरेट के टुकड़े रखे गए थे, वहां पलने वाले चूजों का हीमोग्लोबिन और हेमाटोक्रिट स्तर सामान्य प्राकृतिक घोंसलों की तुलना में बेहतर था. इसी तरह रोगाणुरहित कृत्रिम घोंसलों में पलने वाले चूजों की शारीरिक स्थिति भी अच्छी पाई गई. पैरासाइट की संख्या की बात करें तो सबसे ज्यादा टिक, माइट और पिस्सू प्राकृतिक घोंसलों में मिले. जिन घोंसलों में सिगरेट के टुकड़े थे, वहां इनकी संख्या कम थी, जबकि आर्टिफिशियल घोंसलों में ये लगभग नहीं मिले. रिसर्च में यह भी सामने आया कि सिगरेट के बट वाले घोंसलों में ब्लोफ्लाई लार्वा की संख्या भी कुछ हद तक कम थी, हालांकि यह प्रभाव बहुत अधिक नहीं था.
क्या सिगरेट के बट पक्षियों के लिए फायदेमंद हैं?
वैज्ञानिकों का कहना है कि इन नतीजों को देखकर यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि सिगरेट के बट पक्षियों के लिए अच्छे हैं. सिगरेट के फिल्टर में निकोटिन के अलावा हजारों तरह के जहरीले केमिकल और भारी धातुएं मौजूद होती हैं. लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से पक्षियों, खासकर चूजों के सेल और डीएनए पर निगेटिव प्रभाव पड़ सकता है. यानी सिगरेट के बट कुछ पैरासाइट को तो कम कर सकते हैं, लेकिन इनके कारण होने वाले अन्य नुकसान अभी पूरी तरह समझे नहीं गए हैं. इसलिए वैज्ञानिक इसे प्राकृतिक या सुरक्षित समाधान नहीं मानते.
शहरों के अनुसार बदल रहा है पक्षियों का व्यवहार
इस स्टडी से यह भी साबित होता है कि पक्षी अपने आसपास के वातावरण के अनुसार खुद को ढालने की अद्भुत क्षमता रखते हैं. जंगलों में जहां वे औषधीय गुणों वाले पौधों का इस्तेमाल करते हैं, वहीं शहरों में वही काम करने के लिए इंसानों द्वारा छोड़े गए कचरे का उपयोग करने लगे हैं. यह शहरीकरण के कारण वन्य जीवों के व्यवहार में आ रहे बदलाव का एक अनोखा उदाहरण है. रिसर्चर का कहना है कि यह व्यवहार पक्षियों की अनुकूलन क्षमता को तो दिखाता है, लेकिन यह इस बात का भी संकेत है कि मानव कचरा अब वन्यजीवों के जीवन का हिस्सा बनता जा रहा है. इसलिए इसे पर्यावरण के लिए पॉजिटिव बदलाव नहीं माना जा सकता.
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह रिसर्च अर्बन इकोलॉजी को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. हालांकि अभी यह जानने के लिए और शोध की जरूरत है कि सिगरेट के बट से मिलने वाला अल्पकालिक फायदा, लंबे समय में होने वाले नुकसान से ज्यादा है या नहीं. फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि शहरों में रहने वाले पक्षी बदलते माहौल के साथ खुद को तेजी से डाल रहे हैं. लेकिन यह बदलाव हमें यह भी याद दिलाता है कि मानव द्वारा फैलाया गया कचरा अब केवल पर्यावरण ही नहीं, बल्कि वन्यजीवों के जीवन और उनके व्यवहार को भी प्रभावित कर रहा है.
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