UP Election 2022: पीएम नरेंद्र मोदी के वाराणसी आगमन से पहले अड़ीबाजों की चुनावी अड़ी

बनारस (Varanasi) के बने राजनीतिक अखाड़े के बीच में अब चौक चौराहों और गलियों के अलावा अड़ियों पर अड़ीबाजों की चुनावी अड़ी जमने लगी है. इन्हीं में से एक है बनारस के अस्सी इलाके की पप्पू चाय की अड़ी, जहां लोग यूपी चुनाव 2022 के मद्देनजर किसानों के मुद्दे पर तर्क वितर्क में लगे हुए हैं.

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रोशन जायसवाल

  • वाराणसी,
  • 16 अक्टूबर 2021,
  • अपडेटेड 9:20 PM IST
  • बनारस में अड़ीबाजों की चुनावी अड़ी
  • पीएम मोदी के बनारस आगमन से पहले किसानों पर चर्चा

उत्तर प्रदेश के 2022 विधानसभा चुनाव (UP Assembly Election) में अभी भले ही थोड़ा वक्त बाकी हो, लेकिन अभी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र वाराणसी (Varanasi) चुनावी अखाड़ा बनता जा रहा है. लखीमपुर खीरी में किसानों की मौत को लेकर कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने अभी 10 अक्टूबर से किसान न्याय रैली के जरिए पूरे उत्तर प्रदेश में बीजेपी सरकार को घेरते हुए चुनावी शंखनाद कर दिया है. तो वहीं, अब अक्टूबर माह के अंत तक खुद देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बनारस आने वाले हैं और साथ में करोड़ों की सौगातों की झड़ी लगाएंगे.

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बनारस के बने राजनीतिक अखाड़े के बीच में अब चौक चौराहों और गलियों के अलावा अड़ियों पर अड़ीबाजों की चुनावी अड़ी जमने लगी है. इन्हीं में से एक है बनारस के अस्सी इलाके की पप्पू चाय की अड़ी, जहां बीएचयू के शिक्षकों से लेकर समाजसेवी, पत्रकार, बुद्धिजीवी और तमाम राजनीतिक और गैर राजनीतिक लोगों के अलावा एक आम इंसान भी शामिल होकर यूपी चुनाव के मद्देनजर किसानों के मुद्दे पर तर्क वितर्क में लगा हुआ है.

चाय की चुस्कियों के साथ जमी अड़ीबाजों की अड़ी में बीएचयू के प्रोफेसर रामाज्ञा शशिधर बताते हैं कि यह लड़ाई किसान बनाम कॉरपोरेट, हिंदुस्तान बनाम यूरोप और अमेरिका और वर्तमान बनाम भविष्य की भी लड़ाई है. इस लंबी लड़ाई में जो कोई किसान के साथ है, किसान भी उनके साथ हैं. चाहे वह सरकार हो या विपक्ष हो.

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तो वहीं, बीएचयू के ही प्रोफेसर देवव्रत चौबे ने किसानों के आंदोलन के पीछे किसानों के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर दिया. उन्होंने बताया कि असली किसान गांव में खेती कर रहा है ना कि दिल्ली में जाकर आंदोलन कर रहा है. लेकिन ये जो किसान आंदोलन हो रहे हैं, इनके पीछे कुछ राजनीतिक दल हैं जो वोट की राजनीति कर रहे हैं.

वहीं, बगल में बैठे युवा समाजसेवी मनीष मिश्रा ने भी चाय पीते-पीते अपने विचार रखे कि अगर प्रियंका गांधी को किसानों की इतनी ही चिंता है तो वह किसान रैली किसानों के बीच में ना करके वाराणसी में क्यों करने आ गईं? उन्होंने कहा कि किसानों की बात करने वाले खुद किसानों के बारे में कुछ नहीं जानते हैं. राकेश टिकैत का तो खुद का पेट्रोल पंप भी है. जो कांग्रेस किसानों के भला करने का दावा कर रही है, चौधरी चरण सिंह और मोरारजी देसाई के समय इन्हीं किसानों ने सरकार को किनारे लगाया था.

तो वहीं, वरिष्ठ पत्रकार बृजेश कुमार ने कहा कि पूरे प्रदेश और देश की राजनीति का ध्रुवीकरण वाराणसी से ही होगा. क्योंकि आध्यात्मिक नजरिए से यह देश की आध्यात्मिक राजधानी है और सामाजिक नजरिए से खुद प्रधानमंत्री यहां के संसदीय क्षेत्र के सांसद हैं. इसलिए वाराणसी का महत्व बढ़ जाता है. उन्होंने बताया कि नवरात्र के पर्व पर चाहे वह प्रियंका गांधी आएं या स्मृति ईरानी, दोनों ही देवी समान हैं. इसको राजनीतिक नजरिए से नहीं देखना चाहिए.

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