Modi@3: तीन साल बाद आज कहां खड़े हैं मोदी, BJP और विपक्ष?

आप भले ही मोदी की विचारधारा से सहमत न हों लेकिन राजनीतिक रूप से मोदी ने अपने सारे विरोधियों के दांत खट्टे करते हुए खुद को एक ऐतिहासिक उंचाई पर पहुंचाया है. मोदी की यह उपलब्धि बीजेपी की भी उपलब्धि है.

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

पाणिनि आनंद

  • नई दिल्ली,
  • 25 मई 2017,
  • अपडेटेड 12:13 PM IST

26 मई 2014 को देश की बागडोर संभालने वाली मोदी सरकार के तीन साल पूरे हो चुके हैं. देश ही नहीं विदेशों में भी मोदी के नाम का डंका बज रहा है. मोदी की नीतियों और कार्यशैली से देश की जनता खुश और विपक्षी दल चुप हैं. ऐसा लगता है कि विपक्षियों को इंतजार है मोदी लहर के स्थिर होने का, लेकिन तमाम झांझावतों के बीच भी मोदी लहर खत्म होने का नाम नहीं ले रही है.

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दरअसल आज मोदी सरकार के तीन साल गुजर चुके हैं, विपक्ष साल दर साल कमजोर होता चला गया. पिछले तीन सालों में मोदी ने अपनी छवि इतनी बड़ी कर ली है कि उनके समकक्ष बीजेपी का कोई नेता नजर नहीं आता. अटल और आडवाणी के नाम से पहचानी जाने वाली पार्टी अब मोदी की हो चुकी है. जाहिर है समय एक सा नहीं रहता लेकिन क्या बीजेपी में मोदी का कोई विकल्प है या उसकी संभावना है. मोदी सरकार के तीन साल पूरे होने पर कुछ ऐसे ही मुद्दों पर aajtak.in के एडिटर पाणिनि आनंद ने अपनी राय व्यक्त की. डालिए एक नजर...


आप भले ही मोदी की विचारधारा से सहमत न हों लेकिन राजनीतिक रूप से मोदी ने अपने सारे विरोधियों के दांत खट्टे करते हुए खुद को एक ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंचाया है. मोदी की यह उपलब्धि बीजेपी की भी उपलब्धि है. मोदी से ज्यादा स्वीकार्य चेहरे बीजेपी में रहे हैं लेकिन मोदी जैसी राजनीतिक सफलता पहले किसी ग़ैर-कांग्रेसी नेता की शायद ही रही हो. मोदी सरकार के तीन साल बाद मोदी जहां खड़े हैं, वहां बीजेपी की कल्पना बिना मोदी के संभव नहीं थी.

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शक्ति सत्ता का स्वभाव होती है. अगर इस स्वभाव से जवाबदेही और आलोचना हट जाएं तो यह स्वभाव तानाशाह बन जाता है. किसी भी लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण है कि आलोचना और जवाबदेही की गुंजाइश हमेशा बनी रहे. तीन साल बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस जगह खड़े हैं. उस समय में हिंदुस्तान में विपक्ष की स्थिति बेहद खराब है. ये ना तो नरेंद्र मोदी के लिए अच्छा है और ना ही लोकतंत्र के लिए.


मोदी का उदय और तीन साल का कामकाज भले ही मोदी के लिए और बीजेपी के लिए एक स्वर्णिम समय हो, लेकिन इसी पार्टी के लिए सांगठनिक रूप से यह समय कई तरह के सवालों को भी अपने गर्भ में समेटे हुए है. हालांकि जीत के बुखार में बीजेपी चमचमाती ही नजर आएगी लेकिन विचार को व्यक्ति से बड़ा और संगठन को नेतृत्व से बड़ा बताने वाली पार्टी फिलहाल एक व्यक्ति की सत्ता बन गई है. सांगठनिक विकास की दृष्टि से यह बहुत अच्छी स्थिति नहीं है. मोदी के विकल्प के तौर पर जननायक भाजपा के पास हैं नहीं और जिनकी फौज आज पार्टी चला रही है, उनसे मोदी के करिश्मे को दोहरा पाने की उम्मीद बेकार है.

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