यूपी के लखीमपुर एक अजीबोगरीब मामला सामने आया है, जहां पहले पुलिस ने अदलात में दावा किया कि बंदरों ने पुलिस स्टेशन के स्टोर रूम में रखे सोने के गहनों को बिखेर दिया और फिर उन्हें लेकर भाग गए. पुलिस ने अब इस मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की है और दावा किया है कि उस वक्त के मालखाना इंचार्ज की मौत हो चुकी है और मामले की जांच संभव नहीं है.
दिलचस्प बात ये है कि घटना के वक्त मालखाना इंचार्ज का नाम (जैसा कि कोर्ट के आदेश में बताया गया है) और 17 जून को लखीमपुर पुलिस द्वारा जारी क्लोजर रिपोर्ट को लेकर प्रेस को दिए बयान में जो बताया गया है. वो दोनों नाम अलग-अलग हैं.
दरअसल, ये पूरा मामला साल 2007 के एक दहेज हत्या के मुकदमे से जुड़ा है, जिसके आभूषण (अंगूठी, नथुनी, चूड़ियां और हार) कोतवाली सदर के मालखाने में जमा थे. फरवरी 2024 में जब अदालत ने पति को इस मामले में बरी कर दिया, तो उसने अपने पारिवारिक आभूषणों को वापस पाने के लिए कोर्ट में अर्जी दी. इसके जवाब में पुलिस ने कोर्ट को बताया कि 2013 में बारिश की वजह से गहनों वाली कपड़े की पोटली भीग गई थी, जिसे सुखाने के लिए मालखाने की छत पर रखा गया था, जहां बंदरों ने पैकेट को फाड़कर सारे गहने बिखेर दिए और गहने लापता हो गए.
वहीं, जुलाई 2024 में पुलिस की इन बातों को सुनने के बाद जिला जज ने पुलिस जांच का आदेश दिया था. आदेश में साफ़ तौर पर कहा गया कि बंदरों द्वारा गहने चुराने और बिखेरने का दावा अविश्वसनीय है और सोने के गहनों को बारिश के बाद सूखने के लिए बाहर रखने का कोई औचित्य नहीं था.
कोर्ट ने 17 सितंबर 2013 की थाना केस डायरी एंट्री पर भी ध्यान दिया, जिसमें लिखा था कि जोनल IG के निरीक्षण के बाद 2013 तक के पोस्टमार्टम पैकेट छत पर रखे गए थे और फिर बंदरों ने उन्हें नुकसान पहुंचाया और बिखेर दिया.
कोर्ट ने अपने आदेश में खास तौर पर कहा कि पैकेट को सूखने के लिए बाहर रखने का दावा स्वीकार्य नहीं लगता, क्योंकि पैकेट में सोना था जो पानी से खराब नहीं हो सकता और वहां दूसरी पोटलियां भी थीं, जिनमें गंभीर अपराधों के अहम सबूत थे.
कोर्ट ने पुलिस अधीक्षक को जांच करने का निर्देश दिया, क्योंकि स्पष्टीकरण से ऐसा लग रहा था कि गहने गायब मामले में शामिल पुलिस अधिकारियों ने मालखाने से कीमती सामान निकाल लिया था और सच छिपाने के लिए झूठी डायरी रिपोर्ट बनाई थीं.
कोर्ट ने दिया जांच का निर्देश
इस मामले को और दिलचस्प बनाने वाली बात ये है कि जुलाई 2024 के कोर्ट आदेश में उस वक्त के मालखाना इंचार्ज द्वारा दाखिल रिपोर्ट का जिक्र है. उन्होंने परिवार की अर्जी का जवाब देते हुए दावा किया कि गहनों वाला संबंधित पोस्टमार्टम पैकेट रिकॉर्ड में आगे नहीं सौंपा गया था. इस रिपोर्ट में चार पूर्व मालखाना इंचार्ज- मोल्हेराम, रमाकांत तिवारी, मेवाराम और ईश्वर दयाल के नाम हैं, जिनमें से आखिरी व्यक्ति की मौत हो चुकी है. इनमें से ईश्वर दयाल मृत्यु दर्ज है. इसके विपरीत पुलिस के हालिया बयान में 2007-2009 के बीच के दो अलग नाम चंद्रिका प्रसाद और रामबख्श पाल बताए गए हैं और दोनों को मृत घोषित कर दिया गया है.
'अपराधी को छिपा रही है पुलिस'
वहीं, पीड़ित परिवार के वकील शैलेंद्र गौड़ ने इंडिया टुडे/ आजतक से बातचीत में कहा कि जब कथित तौर पर बंदरों का हमला हुआ, तब मालखाने का इंचार्ज असल में कौन था, इस बारे में कोई स्पष्टता नहीं दिखती.
गौड़ ने बताया, 'नाम अलग-अलग हैं, कहानी बदलती रहती है और अब वो (पुलिस) दावा कर रहे हैं कि मालखाना इंचार्ज मर चुका है... ये साफ है कि पुलिस उस व्यक्ति को छिपाने या बचाने की कोशिश कर रही है, जिसने मालखाने से गहने और दूसरी चीजे चुराई थीं.'
गौड़ ने ये भी कहा कि हालांकि पुलिस के प्रेस बयान में दावा किया गया है कि क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी गई है, लेकिन कोर्ट के रिकॉर्ड में अभी तक ऐसा कुछ नहीं है.
गौड़ ने कहा, '2024 के आदेश में खोए हुए गहनों के लिए मुआवजे और घटना की जांच की मांग की गई थी. हमें न तो मुआवजा मिला और न ही न्याय.'
'पुलिस रिपोर्ट में हैं विसंगतियां'
सीनियर वकील और पूर्व ASG सिद्धार्थ लूथरा ने भी इंडिया टुडे/आजताक को बताया कि ऐसे मामलों में जब पुलिस की कार्रवाई संदिग्ध हो तो स्वतंत्र जांच, यहां तक कि CBI जांच की भी जरूरत होती है.
लूथरा ने कहा, 'कोर्ट ने पुलिस को निष्पक्ष और प्रभावी ढंग से जांच करने के लिए प्रेरित करने की कोशिश की, लेकिन ऐसा लगता है कि पुलिस ने ऐसी रिपोर्ट दाखिल की है, जिसमें विसंगतियां हैं. भले ही वक्त बीत चुका है, लेकिन मामले को जांच के लिए CBI को भेजना ही सही रहेगा.'
उन्होंने याद दिलाया कि पुलिस नियमों के अनुसार, मालखाने में किसी भी चीज के आने-जाने का विस्तृत रिकॉर्ड रखा जाना चाहिए, लूथरा ने ये भी टिप्पणी की कि साफ तौर पर ये रिकॉर्ड रखने वाले की गलती या लापरवाही का मामला है- मुहर्रिर (मालखाना र्क्लक) या तो खुद इसमें शामिल था या इतना लापरवाह था कि उसने दूसरों को चोरी करने या विश्वासघात करने दिया. भले ही अगर कोर्ट के दस्तावेजों और पुलिस के बयान में विसंगतियां हैं तो अपराध को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए.
उन्होंने अंत में कहा कि भले ही मालखाना मुहर्रिर असल में जीवित न हो, लेकिन इस बात की जांच जरूर होनी चाहिए कि किसने उसके साथ साज़िश रची या उसे उकसाया और इस काम में मदद की और अपराध से उसके साथ-साथ किसे फायदा हुआ.
अनीषा माथुर