ओडिशा के किसान वोटर क्यों हैं किंगमेकर? विधानसभा की एक चौथाई सीटों पर दबदबा

चुनावों की डेट्स के ऐलान के साथ ही ओडिशा के पश्चिमी क्षेत्र (वेस्टर्न बैंक) के किसानों पर ध्यान केंद्रित हो गया है. क्योंकि इन किसानों के वोटों का असर सीधे तौर पर 5 संसदीय क्षेत्रों पर और 35 विधानसभा सीटों पर असर डालता है.

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पश्चिमी ओडिशा के किसान चुनावों में अहम भूमिका निभाते हैं (फाइल फोटो) पश्चिमी ओडिशा के किसान चुनावों में अहम भूमिका निभाते हैं (फाइल फोटो)

aajtak.in

  • भुवनेश्वर ,
  • 17 मार्च 2024,
  • अपडेटेड 7:50 PM IST

ओडिशा में लोकसभा चुनावों के साथ ही विधानसभा चुनाव होने हैं. इसके लिए चुनाव आय़ोग ने तारीखों का ऐलान कर दिया है. ओडिशा में 21 लोकसभा सीटों और 147 विधानसभा सीटों पर चुनाव होना है. राज्य में लोकसभा चुनाव के लिए 13 मई, 20 मई, 25 मई, 1 जून को मतदान होगा. यहां विधानसभा चुनाव भी 4 चरणों में लोकसभा चुनावों के साथ होंगे. चुनावों की डेट्स के ऐलान के साथ ही ओडिशा के पश्चिमी क्षेत्र (वेस्टर्न बैंक) के किसानों पर ध्यान केंद्रित हो गया है. क्योंकि इन किसानों के वोटों का असर सीधे तौर पर 5 संसदीय क्षेत्रों पर और 35 विधानसभा सीटों पर असर डालता है. राजनीति के जानकारों का कहना है कि ओडिशा का यह पश्चिमी क्षेत्र कभी कांग्रेस का गढ़ माना जाता था, यहां के किसान एकमुश्त मतदान करके काफी चुनावी प्रभाव डालते हैं.

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बता दें कि 2019 के आम चुनाव में सभी 5 पश्चिमी ओडिशा क्षेत्र की लोकसभा सीटें विपक्षी बीजेपी ने हासिल की थी, जबकि नवीन पटनायक के नेतृत्व वाली सत्तारूढ़ बीजेडी इस कृषि समृद्ध क्षेत्र में एक भी सीट जीतने में विफल रही थी. इस क्षेत्र के बरगढ़ और कालाहांडी में प्रमुख फसल चावल है. 2019 में राज्य में बीजेपी द्वारा जीती गई 8 सीटों में से पार्टी ने पश्चिमी क्षेत्र की सभी 5 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की, जिनमें संबलपुर, बारगढ़, बोलांगीर, कालाहांडी और सुंदरगढ़ शामिल हैं. जबकि बीजेपी को शेष 3 सीटें उत्तरी ओडिशा के बालासोर और मयूरभंज के साथ-साथ तटीय क्षेत्र के भुवनेश्वर में जीती थीं.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक लोकसभा चुनावों में भाजपा की सफलता के बावजूद इस क्षेत्र के लोगों ने विधानसभा चुनावों में मुख्य रूप से नवीन पटनायक की बीजेडी का समर्थन किया था. इन 5 पश्चिमी संसदीय क्षेत्रों के अंतर्गत आने वाली 35 विधानसभा सीटों में से बीजेपी के उम्मीदवार सिर्फ 8 सीटें जीतने में ही सफल रहे थे, जबकि विधानसभा की अधिकांश सीटें बीजेडी के खाते में गई थीं. कांग्रेस ने पश्चिमी क्षेत्र के तीन विधानसभा क्षेत्रों में भी जीत हासिल की थी.

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पश्चिमी क्षेत्र में किसानों की धमक

पश्चिमी क्षेत्र में किसानों की धमक को पहचानते हुए और चुनाव में उनकी भूमिका को देखते हुए ओडिशा प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने हाल ही में जारी चुनाव घोषणापत्र में विभिन्न कृषि प्रोत्साहनों का वादा किया है. इनमें कृषि ऋण माफी, 3,000 रुपये प्रति क्विंटल धान की गारंटी, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी), किसानों के लिए पेंशन, कृषि श्रमिकों के लिए भत्ते, कृषि उत्पादों पर पूर्ण जीएसटी वापसी शामिल हैं. ओपीसीसी के अध्यक्ष शरत पटनायक ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था में किसानों के महत्व पर जोर दिया और 2024 के चुनावों के बाद कांग्रेस के सत्ता में आने पर उन्हें समर्थन देने का वादा किया है.

कांग्रेस ने घोषणापत्र में किए कई वादे

पश्चिमी क्षेत्र के बोलांगीर जिले से आने वाले कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष शरत पटनायक ने कहा कि किसान ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं और अगर कांग्रेस 2024 के चुनावों के बाद सत्ता में आती है तो अन्नदाताओं के लिए हर संभव कोशिश करेगी. दूसरी ओर साल 2000 से राज्य में शासन कर रही सत्तारूढ़ बीजेडी ने अभी तक अपना चुनावी घोषणापत्र जारी नहीं किया है, लेकिन किसानों के कल्याण के लिए कई योजनाएं लागू करने का दावा किया है.

KBK के किसानों पर बीजेडी का फोकस

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खासतौर पर इंद्रावती सिंचाई परियोजना और लोअर सुकटेल सिंचाई परियोजनाए. जिनका उद्देश्य कालाहांडी और बोलांगीर जैसे क्षेत्रों में किसानों को लाभ पहुंचाना है. इसके अलावा बीजेडी सरकार ने कृषि विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता पर जोर देते हुए विभिन्न जिलों में महत्वपूर्ण जल बुनियादी ढांचा परियोजनाएं शुरू की हैं. इस बीच भाजपा, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना जैसी योजनाओं के माध्यम से क्षेत्र के किसानों को लुभाने की कोशिश कर रही है. क्योंकि ये योजना विशेष रूप से सूखाग्रस्त KBK (कालाहांडी-बोलंगीर-कोरापुट) क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है.

 

BJP के लिए कितना जरूरी है वेस्ट ओडिशा का किसान?

भाजपा नेता और पूर्व विधायक प्रदीप पुरोहित ने कहा कि पश्चिमी क्षेत्र के बीजेपी भगवा पार्टी का पुरजोर समर्थन करते हैं. राज्य की 70 प्रतिशत आबादी के लिए खेती प्राइमरी आजीविका होने के बावजूद, पश्चिमी ओडिशा में किसान अपनी चिंताओं को सरकार के सामने उठाने के लिए उल्लेखनीय रूप से संगठित रहे हैं.
 

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