तमिलनाडु में हर बच्चे पर ₹1.28 लाख का कर्ज, विजय सरकार लाई श्वेत पत्र

तमिलनाडु सरकार के श्वेत पत्र में बड़ा दावा किया गया है कि राज्य में पैदा होने वाले हर बच्चे पर औसतन ₹1.28 लाख का कर्ज है. पत्र के मुताबिक, राज्य का कुल वित्तीय बोझ ₹13.18 लाख करोड़ तक पहुंच गया है.

Advertisement
सीएम विजय की सरकार ने राज्य के खर्चों पर जारी किया श्वेत पत्र. (Photo: PTI) सीएम विजय की सरकार ने राज्य के खर्चों पर जारी किया श्वेत पत्र. (Photo: PTI)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 16 जून 2026,
  • अपडेटेड 10:38 PM IST

तमिलनाडु में पैदा होने वाले हर बच्चे के सिर पर जन्म लेते ही 1.28 लाख रुपये का कर्ज चढ़ जा रहा है. राज्य के ऊपर कुल देनदारी बढ़कर करीब 13.18 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई है. मुख्यमंत्री विजय की नई सरकार ने मंगलवार को राज्य की आर्थिक स्थिति पर एक श्वेत पत्र जारी कर यह चौंकाने वाला दावा किया है. वित्त मंत्री एन मैरी विल्सन की तरफ से जारी इस रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछली एमके स्टालिन सरकार के पांच साल के कार्यकाल में राज्य पर कर्ज का बोझ लगभग दोगुना हो गया.

Advertisement

इस श्वेत पत्र के मुताबिक, मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद विजय सरकार के शुरुआती बड़े फैसलों में यह रिपोर्ट शामिल है. इसमें बताया गया है कि पांच साल पहले तमिलनाडु पर सीधा कर्ज करीब 4.8 लाख करोड़ रुपये था, जो अब बढ़कर लगभग 10 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है. अगर ऑफ-बजट उधारी, गारंटी और दूसरी वित्तीय देनदारियों को भी जोड़ लिया जाए, तो राज्य का कुल बोझ 13.18 लाख करोड़ रुपये बैठता है.

आपके मन में सवाल आ सकता है कि अभी-अभी जन्में बच्चे ने तो कोई लोन लिया नहीं, फिर उसके सिर पर यह कर्ज कैसे आ गया? असल में यह पूरे राज्य के कर्ज का गणित है. जब सरकार पर कर्ज का बोझ हद से ज्यादा बढ़ जाता है, तो उसे राज्य की कुल आबादी के हिसाब से आंका जाता है. तमिलनाडु पर जो कुल 13.18 लाख करोड़ रुपये की देनदारी है, उसे अगर राज्य के हर नागरिक में बराबर बांटा जाए, तो हिस्से में 1.28 लाख रुपये आते हैं. यही वजह है कि राज्य में पैदा होने वाला हर बच्चा जन्म लेते ही इस भारी-भरकम कर्ज के साए में आ जाता है.

Advertisement

रोजमर्रा के खर्चों में गया बड़ा हिस्सा

वित्त मंत्री ने कहा कि पिछले पांच वर्षों में जितना कर्ज बढ़ा, वह पिछले कई दशकों में जुटाए गए कर्ज के मुकाबले काफी ज्यादा है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि उधार लिए गए पैसे का बड़ा हिस्सा नई संपत्तियां या बुनियादी ढांचा तैयार करने के बजाय रोजमर्रा के खर्चों को पूरा करने में इस्तेमाल हुआ.

पत्र के अनुसार, राज्य सरकार की आय और खर्च के बीच अंतर लगातार बढ़ा है. स्थिति यह है कि सरकार जितना एक रुपया कमाती है, उसमें से करीब 22.8 पैसे केवल ब्याज चुकाने में खर्च हो जाते हैं. वहीं, जीएसटी से होने वाली आय की रफ्तार भी जरूरत के मुकाबले धीमी बताई गई है.

तमिलनाडु पर कर्ज का यह बोझ दूसरे बड़े राज्यों के मुकाबले काफी ज्यादा हो चुका है. जहां गुजरात का कर्ज अनुपात 17.6 फीसदी, महाराष्ट्र का 19.7 फीसदी और कर्नाटक का 23.4 फीसदी है, वहीं तमिलनाडु का कर्ज अनुपात बढ़कर 28.3 फीसदी पर पहुंच गया है. हालांकि, पिछले महीने पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने इन आरोपों का जवाब देते हुए कहा था कि राज्य का कर्ज तय सीमाओं के भीतर ही है और उनके पास पर्याप्त संसाधन मौजूद हैं.
 

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »