पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने टीएमसी के हाथ से बंगाव छीन लिया है. बीजेपी की प्रचंड जीत के साथ यहां टीएमसी के 15 साल पुराने राज का अंत हो गया है. ऐसे में सवाल ये है कि क्या टीएमसी की इस करारी हार के पीछे SIR की अहम भूमिका है?
बंगाल में चुनावों से ठीक पहले चुनाव आयोग के मतदाता सूची में किए गए सुधार (SIR) को लेकर काफी विवाद हुआ. चुनाव आयोग ने चुनाव से पहले राज्य की मतदाता सूची से लगभग 10 प्रतिशत मतदाताओं के नाम हटा दिए थे. इसका टीएमसी ने काफी विरोध भी किया था.
टीएमसी ने आरोप लगाया था कि ये प्रक्रिया जानबूझकर उनके समर्थकों को निशाना बनाने के लिए की गई थी. लेकिन आंकड़ों का विश्लेषण एक अलग और जटिल कहानी पेश करता है.
आंकड़ों की जुबानी: जीत और हार का अंतर
चुनाव नतीजों के मुताबिक, बीजेपी को लगभग 46 प्रतिशत वोट मिले, जबकि टीएमसी को 41 प्रतिशत वोटों से संतोष करना पड़ा. बीजेपी की जीत का अंतर काफी बड़ा रहा. बीजेपी ने 207 सीटें जीतीं, जबकि टीएमसी 80 सीटों पर सिमट गई. 26 सीटों पर बीजेपी की जीत का अंतर 20 से 30 प्रतिशत के बीच था. 116 सीटों पर जीत का अंतर 10 से 20 प्रतिशत रहा. 2024 के लोकसभा चुनाव की तुलना में मतदाता सूची में लगभग 10 प्रतिशत की गिरावट आई.
क्या 'वोटर लिस्ट' ने बदला परिणाम?
सीट-वार विश्लेषण से पता चलता है कि जिन सीटों पर टीएमसी ने 2021 में जीत हासिल की थी, वहां बीजेपी वाली सीटों की तुलना में मतदाताओं की संख्या में 1.7 प्रतिशत ज्यादा कटौती हुई. दिलचस्प बात ये है कि जिन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा नाम काटे गए, वहीं टीएमसी का प्रदर्शन सबसे बेहतर रहा.
उन 21 सीटों पर जहां 20 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं के नाम हटाए गए थे, उनमें से आधी से भी कम सीटें बीजेपी के खाते में गईं. ये बीजेपी की राज्यव्यापी सफलता दर (63%) से काफी कम है. जबकि जिन सीटों पर सिर्फ 0-5 प्रतिशत नाम काटे गए थे, वहां बीजेपी ने 86 प्रतिशत सीटों पर जीत हासिल की.
टीएमसी के गढ़ में दिखा 'फायरवॉल' असर
आंकड़ों के मुताबिक, 2021 में टीएमसी की जीती गई सीटों पर औसतन 28,019 मतदाताओं के नाम कटे, जबकि बीजेपी की सीटों पर ये संख्या 23,834 थी. सबसे ज्यादा कटौती वाले 20 निर्वाचन क्षेत्रों में से 18 सीटों पर 2021 में टीएमसी के विधायक थे.
मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे क्षेत्र, जहां टीएमसी को बंगाली मुस्लिम मतदाताओं का मजबूत समर्थन मिलता है, वहां सबसे ज्यादा नाम हटाए गए. उदाहरण के तौर पर, मुर्शिदाबाद के शमशेरगंज में सबसे ज्यादा 86,000 से ज्यादा नाम हटाए गए. इसके बावजूद टीएमसी ने ये सीट बरकरार रखी, हालांकि उसकी जीत का अंतर 26,379 से घटकर 7,587 रह गया.
निष्कर्ष: क्या रहा असर?
डेटा से साफ है कि मतदाता सूची से नाम हटने और चुनाव परिणामों के बीच कोई सीधा संबंध नहीं दिखता. जहां सबसे कम नाम कटे, वहां टीएमसी को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ. वहीं, जहां भारी कटौती हुई, वहां टीएमसी अपनी पकड़ मजबूत रखने में सफल रही.
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विशेषज्ञों का मानना है कि मुर्शिदाबाद, मालदा और कोलकाता के कुछ हिस्से टीएमसी के ऐसे मजबूत गढ़ (Firewall) साबित हुए जिन्होंने बीजेपी की लहर को रोक दिया, भले ही वहां मतदाताओं की संख्या कम हो गई थी. ये आंकड़े टीएमसी के इस दावे का समर्थन तो करते हैं कि उनके गढ़ों में ज्यादा नाम कटे, लेकिन ये साबित नहीं करते कि इसी वजह से उनकी हार हुई.
दीपू राय / मयंक मिश्रा