सुप्रीम कोर्ट में हंगामा, बदसलूक और बदजबानी करने वाले प्रबल प्रताप यादव की पृष्ठभूमि एकतरफा सनक, मुलाजिमत की जगह यानी लखनऊ के विकास नगर में जिस सॉफ्टवेयर कम्पनी में काम किया, वहां दफ्तर में भी सहकर्मियों से बदतमीजी करता रहा है. जिनसे उसकी नहीं बनी, उनको इसने 'देश विरोधी' होने के मनगढ़ंत आरोप लगा दिए.
अपने दफ्तर में मुस्लिम सहकर्मी लड़की को परेशान किया. कंपनी ने जांच कराई. पर पता चला वो महिला सहकर्मी को आपत्तिजनक मेल और संदेश भेजने और दफ्तर में भी दुर्व्यवहार के दोषी पाए जाने पर उसे पहले तो सख्त चेतावनियां दी गईं लेकिन जब वो नहीं सुधरने पर आमादा रहा तो उसे नौकरी से निकाल दिया.
इसके बाद तो प्रबल प्रताप यादव 'क्रांतिकारी' बन गया. खुद को कट्टर 'देशभक्त' और विरोधियों को कट्टर देशद्रोही बताने लगा.
नौकरी से निकाले जाने के बाद प्रबल प्रताप ने कंपनी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. कंपनी पर केस मुकदमे कर दिए. कंपनी पर 'देश विरोधी गतिविधियों' में शामिल रहने का मनगढ़ंत आरोप भी लगाया. इन आरोपों पर वो कंपनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग पर अड़ा रहा. उसने इसके लिए कोई हथकंडा छोड़ा नहीं.
उसने लखनऊ की सीजेएम कोर्ट में कंपनी के खिलाफ देश विरोधी काम करने की एफआईआर दर्ज कराने के लिए अर्जी डाली. कोर्ट ने पुलिस से रिपोर्ट तलब की.
पुलिस रिपोर्ट प्रतिकूल आने पर कोर्ट ने इसी साल 26 फरवरी को प्रबल से अपने आरोपों की पुष्टि के सबूत मांगे. सबूत तत्काल नहीं मिलने पर कोर्ट ने मामले को पुलिस एफआईआर के बजाय सीधे 'कम्प्लेंट केस' यानी निजी शिकायत के रूप में दर्ज कर लिया.
करीब महीने भर बाद 6 अप्रैल को उसे इस मामले में कोर्ट के समक्ष सबूत पेश करने थे. लेकिन पुलिस पर एफआईआर दर्ज करने का दबाव बनाते हुए प्रबल ने इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में भी अपील दायर कर दी. उसकी दलील थी कि कम्प्लेंट केस रद्द कर सीधे एफआईआर का आदेश दिया जाए.
हाई कोर्ट ने उसकी याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि जब निचली अदालत मामले की सुनवाई कर रही है, तो कानून के मुताबिक वहीं तथ्य रखे जाएं.
हाईकोर्ट से भी निराश होकर वो सुप्रीम कोर्ट आया और यहां तो उसने जो किया इससे उसकी मानसिक स्थिति और सनक दोनों स्पष्ट हो गए. कोर्ट ने इसी स्थिति को भांपते हुए उसके खिलाफ कोई सख्त एक्शन नहीं लिया.
संजय शर्मा