ग्राउंड रिपोर्ट: भीषण गर्मी... गरीब के बुरे हाल! रोजी-रोटी के लिए मौसम की मार झेल रहा मजदूर

बढ़ती गर्मी ने मजदूरों की जिंदगी को बेहद मुश्किल बना दिया है. कई इलाकों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है. भीषण गर्मी के बीच मजदूरों को न राहत मिल रही है और न ही जरूरी सुविधाएं, जिससे रोजी-रोटी कमाने के लिए उनका संघर्ष और ज्यादा कठिन हो गया है.

Advertisement
मजदूर भयानक गर्मी में भी काम करने को मजबूर हैं. (Photo: ITG) मजदूर भयानक गर्मी में भी काम करने को मजबूर हैं. (Photo: ITG)

आशुतोष मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 24 मई 2026,
  • अपडेटेड 2:16 PM IST

उत्तर भारत मानो आग की भट्टी बन गया है. उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, बंगाल, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और मध्य प्रदेश हर जगह तपती गर्मी ने जनजीवन को बेहाल कर दिया है.  इस बीच बिजली की कटौती ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है. जिनके पास सुविधाएं हैं वे गर्मी से बचने के उपाय खोज लेते हैं, लेकिन बात उस तबके की है जिसके सिर पर न छत है, न कोई सहारा. रोज़ी-रोटी के लिए सूरज की तपिश से रोज संघर्ष करना ही उनका नसीब है.

Advertisement

किसी का दर्द तब तक समझ में नहीं आता जब तक वह खुद पर न बीते. आजतक ने मौसम से जूझते उस वर्ग के अनुभव को समझने की कोशिश की है जिनका अस्तित्व सिर्फ वोटर लिस्ट तक सीमित है.

शहरों की रफ़्तार मौसम से नहीं रुकती. तपिश शुरू होते ही मजदूर का पसीना बहने लगता है. इन मजदूरों के परिवार को यह पता भी नहीं होता कि मई-जून की झुलसाती गर्मी में उनका बेटा सिर पर रेत से भरा तसला उठाए जीवन से संघर्ष कर रहा है. वह इसलिए मेहनत करता है ताकि घर में मां और परिवार को उनके शहरी जीवन की सच्चाई का सामना न करना पड़े.

आजतक ने उस मजदूर के जीवन के कुछ सेकंड साझा किए तो असलियत सामने आई कि संघर्ष का मतलब क्या होता है. जिम्मेदारी का बोझ सिर पर रखे तसले के वजन से कहीं ज्यादा भारी है. सुविधा के नाम पर बस पीने का पानी है, लेकिन मजदूरी के लिए कई दिनों तक इंतजार करना पड़ता है.

Advertisement

दिल्ली का पहाड़गंज बड़ा बाज़ार है, जहां मजदूरों की बोली लगती है. लेबर चौक पर सुबह से ही देश के अलग-अलग राज्यों से आए मजदूर दिहाड़ी की उम्मीद में खड़े रहते हैं.

मौसम की मार इन पर भी कम नहीं पड़ती. पसीना शरीर पर सूखकर निशान छोड़ देता है, और काम देने वाले भरी दोपहर में भी उनसे काम करवाते हैं. राजधानी की सड़कों पर खड़े साइकिल रिक्शों की सीट पर सोते हुए इन गरीबों के लिए मई-जून की तपिश जानलेवा साबित होती है.

फिर भी दिन के 200-300 रुपये कमाने के लिए वे शरीर को गला देते हैं. बिहार के रहने वाले फूल मोहम्मद जैसे सैकड़ों लोग कई बार इस भीषण गर्मी में भूखे या सिर्फ पानी पीकर सो जाते हैं.

गर्मी में गरीब का बुरा हाल

घड़ी के कांटे भागे तो तापमान भी बढ़ा. सुबह 11 बजे तक दिल्ली का पारा 40 डिग्री पार कर गया और सड़कें सुनसान होने लगीं. गर्मी बढ़ती रही लेकिन 24 साल के बलराम की हिम्मत नहीं टूटी. भारी सामान साइकिल गाड़ी पर लादकर वह डिलीवरी के लिए निकल पड़ा.

यह भार हमारे लिए पहाड़ जैसा है, लेकिन तपती दोपहरी में बलराम के लिए यह रोज का काम है. 14 हज़ार की तनख़्वाह में मां का ख़्याल रखना है, इसलिए दिन में चार बार भी वह यह बोझ उठाकर निकल पड़ता है. ज़ुबान साथ नहीं देती, लेकिन हिम्मत बहुत है. गर्मी सताती है, मगर जरूरत उससे बड़ी है.

Advertisement

बुराड़ी के संतनगर में सड़कों से कचरा उठाने वाले मज़दूरों का हाल भी यही है. 11 बजे के बाद दिल्ली की गर्मी झुलसाती है, लेकिन धूल और तपती दोपहरी में उनके लिए पेड़ की छांव ही राहत है. दुकानों से पानी मिल जाता है और आराम के लिए पेड़ की छांव, जबकि ठेकेदार के लिए दफ़्तर बना हुआ है. तसला-फावड़ा दिन भर चलता है, कूलिंग की कोई सुविधा इनके नसीब में नहीं.

मई की तपिश ने कुलियों का भी बुरा हाल कर दिया है. लोगों की आवाजाही कम होने से कमाई घट गई है. ऊपर से बढ़ती गर्मी जीना मुश्किल कर रही है. पेट पालना है तो सूरज की तपिश को चुनौती देते हुए ये मज़दूर खुले आसमान के नीचे काम करते हैं,  फिर चाहे कलेजा जले या कपड़े फटें.

गर्मी बढ़ते ही अमीर तबका पहाड़ों की ओर निकल जाता है, घरों में एसी कमरों का आराम मिलता है, दफ़्तर ठंडे रहते हैं. लेकिन गरीब तबके का क्या, जिसे बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए भी खुद भीषण गर्मी का सामना करना पड़ता है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement