एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि रैनसमवेयर ग्रुप वर्ल्ड लीक्स ने डार्क वेब पर भारत के सबसे बड़े परमाणु ऊर्जा संयंत्र कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट से जुड़े हजारों दस्तावेज अपलोड किए गए हैं. इन दस्तावेजों में संयंत्र के कुछ हिस्सों के कथित ब्लूप्रिंट, सप्लायर्स की जानकारी, बैठकों के ब्योरे और बीमा दस्तावेज शामिल बताए जा रहे हैं.
वर्ल्ड लीक्स का दावा है कि ये डेटा अनिल अंबानी के रिलायंस इन्फ्रास्ट्रक्चर का है. हालांकि, इन दस्तावेजों की प्रामाणिकता की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की जा सकी है.
रिपोर्ट के मुताबिक, रिलायंस ग्रुप ने स्वीकार किया कि तीसरे पक्ष के डेटा सेंटर सर्विस प्रोवाइडर Yotta के सर्वर पर उसके डेटा में आंशिक सेंध की गई थी. कंपनी ने कहा कि इस घटना की जानकारी सरकार को दे दी गई है, लेकिन यह नहीं बताया कि कौन सा डेटा प्रभावित हुआ.
बता दें कि कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र भारत के सात परमाणु संयंत्रों में सबसे बड़ा है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की देश की परमाणु ऊर्जा क्षमता बढ़ाने की योजना का अहम हिस्सा है. रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर इस परियोजना की यूनिट-3 और यूनिट-4 के बुनियादी ढांचे के निर्माण का ठेकेदार है. दोनों इकाइयों के 2027 तक चालू होने की उम्मीद है और इनसे संयुक्त रूप से 2,000 मेगावाट बिजली उत्पादन होगा.
रिपोर्ट के अनुसार, डार्क वेब पर अपलोड की गई 8.58 लाख फाइलों में से करीब 19,000 फाइलें सबसे संवेदनशील मानी जा रही हैं. इनमें यूनिट-3 और यूनिट-4 के वेंटिलेशन और कूलिंग सिस्टम के कथित ब्लूप्रिंट, कॉमन कंट्रोल रूम का पूरा फ्लोर लेआउट, सप्लायर्स की सूची, उपकरणों की तस्वीरों सहित संयुक्त निरीक्षण की रिपोर्ट और बीमा पॉलिसियों से जुड़े दस्तावेज शामिल बताए गए हैं।
दस्तावेजों में कथित तौर पर यह भी उल्लेख है कि रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर और न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCIL) ने इस तरह का बीमा कराया था, जिसके तहत अगर यूनिट-3 या यूनिट-4 पर आतंकी हमला होता है तो 11.2 करोड़ डॉलर तक के बीमे का दावा किया जा सकता है.
न्यूक्लियर थ्रेट इनिशिएटिव (NTI) के वरिष्ठ निदेशक निकोलस रोथ ने कहा कि अगर ऐसे दस्तावेज वास्तव में गलत हाथों में पहुंच जाते हैं, तो उनसे संयंत्र की सहायक प्रणालियों, सप्लाई चेन और सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरियों का पता लगाया जा सकता है, जो सुरक्षा के लिहाज से गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है.
इस बीच, Yotta ने कहा कि उसने 29 मई को रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर के सर्वर पर संदिग्ध गतिविधि देखी थी, जिसे तुरंत रोक दिया गया और संभावित रैनसमवेयर हमले को निष्प्रभावी कर दिया गया था. हालांकि, जून के अंत में रिलायंस ने उसे बताया कि बाहरी साइबर हमलावरों ने डेटा चोरी का दावा किया है. Yotta का कहना है कि वह इन दावों की पुष्टि नहीं कर पाया है, लेकिन उसने अपनी तकनीकी जांच रिपोर्ट रिलायंस को सौंप दी है और जांच में सहयोग कर रहा है.
सूत्रों के अनुसार, NPCIL इस घटना को लेकर रिलायंस के संपर्क में है और भारत की साइबर सुरक्षा एजेंसी CERT-In भी मामले की जांच कर रही है. हालांकि, परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE), CERT-In, NPCIL और प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस मामले पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है।
बता दें कि वर्ल्ड लीक्स वही रैनसमवेयर ग्रुप है, जिसने पहले नाइकी और टाटा समूह को भी निशाना बनाया था. जून में इस ग्रुप ने दावा किया था कि उसने टाटा समूह से चुराए गए डेटा के बदले 15 लाख डॉलर की फिरौती मांगी थी. उसके अनुसार, फिरौती न मिलने पर उसने डेटा सार्वजनिक कर दिया था.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत में साइबर हमलों का खतरा लगातार बढ़ रहा है. साइबर सुरक्षा कंपनी Surfshark के अनुसार, पिछले वर्ष 2.89 करोड़ भारतीय खातों का डेटा लीक हुआ, जिससे भारत दुनिया में डेटा उल्लंघनों के मामले में तीसरे स्थान पर रहा.
बता दें कि यह पहली बार नहीं है जब कुडनकुलम संयंत्र का नाम किसी साइबर घटना से जुड़ा हो. 2019 में भी इस संयंत्र के प्रशासनिक नेटवर्क पर उत्तर कोरिया से जुड़े एक हैकर समूह के मैलवेयर का पता चला था.
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