'कश्मीर में सोना भरा है, हिंदू पुरुषों को मार देना, उनकी लड़कियां-औरतें तुम्हारी...', ये वादे कर 1947 में हमलावर भेजे थे पाकिस्तान ने

पहलगाम आतंकी हमले पर देशभर में उपजे आक्रोश के बाद भारत के ऑपरेशन सिंदूर ने पाकिस्तान और पीओके में आतंकी ठिकानों को नेस्तनाबूद कर दिया. ऑपरेशन सिंदूर से आतंकवाद की कमर तोड़कर रख दी गई. लेकिन पहलगाम आतंकी हमले ने कश्मीर को लेकर पाकिस्तान की रक्तरंजित साजिशों की फिर से याद दिला दी है. 1947 में देश की आजादी और विभाजन के साथ ही अक्टूबर महीना आते ही कबाइलियों के रूप में पाकिस्तान ने हमलावर घुसाने शुरू कर दिए थे. इस खास सीरीज के दूसरे पार्ट में हम आपको बताने जा रहे हैं कि कश्मीर कब्जाने के लिए लाए गए कबाइलियों से पाकिस्तान ने क्या-क्या वादे किए थे.

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कश्मीर पर पहले पाकिस्तानी हमले की कहानी! (फाइल फोटो) कश्मीर पर पहले पाकिस्तानी हमले की कहानी! (फाइल फोटो)

संदीप कुमार सिंह

  • नई दिल्ली,
  • 14 मई 2025,
  • अपडेटेड 10:08 AM IST

...अक्टूबर 1947 के शुरुआती कुछ दिनों में ही पाकिस्तानी कबाइली हमलावरों ने मुजफ्फराबाद समेत कई इलाके कब्जा लिए थे. कश्मीर रियासत के महाराज हरि सिंह की सेना कुछ खास तैयार नहीं थी और बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी से भी कोई समर्थन नहीं मिल रहा था, ऐसे में हमलों का खामियाजा सबसे ज्यादा हिंदू और सिखों को भुगतना पड़ रहा था. सेना और पुलिस के कश्मीर रियासत के कई मुस्लिम अफसर और जवान दुश्मनों से मिल गए. अक्टूबर 1947 से शुरू होकर कबाइली हमलावर मुजफ्फराबाद और मीरपुर समेत कई इलाके कब्जाते हुए 1948 में श्रीनगर के दरवाजे पर खड़े थे. 

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कोई उपाय न देख महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए और जब भारतीय सेना उतरी तब जाकर श्रीनगर बचाया जा सका और कबाइली हमलावर पीछे धकेले गए. लेकिन इससे पहले जो कत्लेआम मचा उसमें हजारों जानें गईं, बड़ी संख्या में हिंदू-सिख या तो धर्म बदलने को मजबूर किए गए, या मार दिए गए या लूटमार कर भागने को मजबूर कर दिए गए.

अक्टूबर 1947 में पाकिस्तानी कबाइलियों के पहले हमले में मुजफ्फराबाद के तत्कालीन वजीर दुनी चंद मेहता समेत कई अफसरों ने बलिदान दिया और हमलावरों के चंगुल में फंसे उनके परिवारों ने काफी कष्ट झेला. दुनी चंद मेहता की पत्नी कृष्णा मेहता ने अपनी आपबीतियों को अपनी किताब में डिटेल से बयां किया था. अपने दो छोटे-छोटे बेटों, दो बेटियों और एक भतीजी के साथ कृष्णा मेहता कबाइली कब्जे वाले इलाके में स्थानीय लोगों के घरों में शरण लेकर खुद को बचाए हुए थीं, फिर कबाइली लोग उन लोगों को पकड़ कर ले गए लेकिन पुराने जानकारों के कारण उनके परिवार को कोई नुकसान नहीं पहुंचा, बाद में तनाव कम होने पर रेड क्रॉस की मदद से वे लोग जम्मू तक पहुंचने में कामयाब हो पाए.

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हां, तो फिर आते हैं लूट और कत्लेआम के उस दौर पर. कई जेलों से होते हुए कबाइली हमलावर उन्हें मुजफ्फराबाद ले आए, वहां एक कबाइली सरकार ने कहा कि बहन आपको कुछ नहीं होगा हम आपकी रक्षा करेंगे. अब वे हमलावरों की निगरानी में उसी कोठी में रखी गईं जहां कभी वे अपने परिवार के साथ रहा करती थीं, वजीर की कोठी में. लेकिन लूटपाट और आगजनी के बाद वो काफी डरावना हो चुका था. साथ ही उनके पति को उसी घर में गोलियों से भून कर मारकर जला दिया गया था. इसकी याद उन्हें हमेशा परेशान करती थी. लेकिन बच्चों के खातिर वे खुद को बचाए हुए थीं और ढृढता के साथ दुश्मनों का सामना कर रही थीं. उनका सख्त रुख देखकर कई जानकार हिंदू लोग भी अपनी जान बचाने के लिए उनके साथ आकर जुड़ गए थे. उन्हें उम्मीद थी कि शायद ये हमें भी सुरक्षित इलाके में ले जा सकेंगी.

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कृष्णा मेहता अपनी किताब 'कश्मीर पर हमला' में लिखती हैं- ''अब हम सब मिलकर बारह व्यक्ति हो गए. सात बच्चे और पांच बड़े. कबाइली सरदार के भरोसे के बाद हम वहां रह तो रहे थे लेकिन आते-जाते हमलावरों को देखकर हमेशा खौफ बना रहता था कि पता नहीं कब कौन धोखा कर जाए. हर समय खतरा बना रहता था क्योंकि इन लोगों का कोई भरोसा नहीं था. कोई भी आकर कुछ कर सकता था. लेकिन सरकार रहमदादखान के डर से सब अदब से पेश आते. एक दिन वो सरदार आया और बोलकर गया कि मैं बारामूला जा रहा हूं, तुम्हें कोई कमी नहीं होगी बहन. धीरे-धीरे सारे लड़ाके भी वहां से जाने लगे. सुनने में आया कि बारामूला में जोर की लड़ाई छिड़ी हुई थी.

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फाइल फोटो

सुनने में आने लगा कि श्रीनगर समेत कई इलाकों से कबाइली भारतीय सेना के आते ही खदेड़े जाने लगे. हिंदुस्तानी लड़ाके जहाज भी आकाश में मंडराने लगे. इससे कबाइलियों को काफी खौफ होता था. लेकिन हम मुजफ्फराबाद में फंसे हुए थे और वहां अभी भी कबाइलियों का कब्जा था. इन्हीं दिनों नगर में एक दिन बड़ा कोलाहल मचा. बात यह थी कि पाकिस्तानी लोग लड़कियों को घरों से निकाल निकाल कर ले जाने लगे थे. क्योंकि उन्हें डर था कि हिंदुस्तानी फौज आएगी तो ये इलाके उनके हाथ से चले जाएंगे. बाद में खबर आई कि हिंदुस्तानी बहादुरों ने शत्रुओं से बारामूला छीन लिया है. कबाइलियों के पैर उखड़ गए. पाकिस्तानी सेना के अधिकारी उन्हें पीट-पीटकर जबरदस्ती मोर्चे पर ले जाना चाह रहे थे लेकिन हिंदुस्तानी फौज के सामने वे जाना नहीं चाह रहे थे. लेकिन वे हजारों की संख्या में भाग खड़े हुए. लेकिन भागते भागते वे लूटपाट का माल और हिंदुस्तानी लड़कियों-औरतों को उठाकर अपने साथ ले जाते थे. 

हमारे जैसे जो लोग उस इलाके में फंसे थे, छुप-छुपकर समय काट रहे थे कि भागते कबाइलियों की नजरों से अपनी बच्चियों को बचाकर रखें. लौटते समय रास्ते में जो कुछ भी मिलता वही वो लूट कर ले जाते. हमने यहां तक सुना कि उनकी जेबों में बहुत से कटे हाथ और कान देखे गए. बात यह थी कि भागते समय उनके पास इतना वक्त नहीं था कि वे तसल्ली से लोगों के गहने निकालकर ले जा पाते इसलिए वे तलवार से गहनों समेत कान और हाथ काट लेते थे. इस वीभत्स दृश्य से मुजफ्फराबाद वासी भी खासा आतंकित थे. पास के मौलवी के कहने पर हम सब उसके घर जाकर शरण लिए ही थे कि सुबह पता चला कि कबाइली कल रात कोठी में घुस आए थे और लूटमार कर गए. एक फैसले से हम सब फिर बच गए.''

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आपबीती भले ही 78 साल पुरानी हो लेकिन आप सब भी सोच रहे होंगे कि पाकिस्तान से लाए गए ये कबाइली कश्मीर क्यों आए थे. क्या मकसद था उनका? वहां की सरकार और जिरगे के सरदारों ने उन्हें कैसे कश्मीर पर हमले के लिए तैयार किया था. इसका खुलासा भी हुआ. कृष्णा मेहता लिखती हैं- ''जब मुजफ्फराबाद हमें वे कबाइली ले जा रहे थे तो कई नए लड़ाकों से मैंने हिंसा न करने का वास्ता देकर पूछने की कोशिश की कि तुम लोग इतनी कम उम्र के हो और इस तरह की क्रूरता करने कैसे आ गए? जो शरीफ कबाइली हमारे साथ चल रहा था उसकी उम्र कोई बाइस वर्ष की थी. चलते चलते मैं उससे ऐसे ही बातें करने लगी. मैंने पूछा- तुम इतनी दूर यहां कैसे आए?

वह कहने लगा- पाकिस्तान के हुक्मरानों ने कबाइलियों में इस बात को फैला रखा है कि इस्लाम खतरे में है और कश्मीर रियासत में मुसलमानों पर बहुत जुल्म हो रहे हैं. हमारी बहू-बेटियां महफूज नहीं हैं. अब पठान ये सह नहीं सकते थे कि उनके होते हुए कोई उनकी बहू-बेटियों पर जुल्म करे. यही बोलकर कबाइलियों को यहां लाया गया है.

मैंने जब यह पूछा कि तुम्हें कुछ वेतन वगैरह मिलता है क्या? तो वह बोला- अभी तक कुछ फैसला नहीं हुआ है. उन्होंने हमें सिर्फ यही कहा है कि हिंदुओं को कत्ल कर दो. उनकी जो औरत या लड़की तुम्हे पसंद आवे ले जाओ. जो माल तुम्हे मिले लूट लो. घर जला दो. हमें सिर्फ जमीन चाहिए.

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वह बताने लगा- हमारे वतन से बहुत से लोग लूट-मार के लिए आये हैं. हमने सुना है कि कश्मीर में जर (सोना) बहुत है. जब मैंने पूछा कि हमें जेलों में क्यों ठूस रहे हो तो वह बोला- मर्दों को तो हमने तकरीबन खत्म कर दिया है. जो पहले दिन इधर-उधर छिप गए थे वही थोड़े से बच गए हैं. जो औरतें बची हैं वे या तो बड़ी-बूढ़ी हैं या जख्मी हैं. हां कुछ जवान औरतें भी जेल में कैद रखी गई हैं.''

कृष्णा मेहता आगे लिखती हैं- ''इस खौफ और खूनी वातावरण में हम उनकी कैद में थे. हमे अपनी तो नहीं लेकिन बेटे और बेटियों की फिक्र खाए जा रही थी कि पता नहीं अगले क्षण ये लोग क्या करें. राह चलते हमें बराबर स्थानीय मुसलमान मिलते रहे. उनमें से कुछ इस दशा से दुखी थे तो कुछ खुश भी थे. कहीं-कहीं कबाइलियों की टोलियां ही टोलियां दिख जाती थीं. कोई नंगे पैर तो कोई फटा पुराना जूता पहने. कंधों पर बंदूकें और गले में कारतूसों की माला लिए हुए. कहीं कहीं तो वे लोग लूट के माल के लिए आपस में लड़ भी जाते थे.

इन लुटेरों से बचने के लिए कई हिंदू औरतों ने कृष्णागंगा नदी में छलांग लगा दी. मैंने भी अपनी बेटियों को कह रखा था कि मान पर खतरा बन आए तो पीछे मत हटना. मां कृष्णगंगा तुम्हें अपने यहां जरूर शरण देंगी.

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इसी बीच दोमेल पुल के पास जब स्त्रियों को शौचादि के लिए कबाइली ले गए तो वहां मैंने अद्भुत दृश्य देखा जिसे मैं कभी भूल नहीं सकती. कुछ स्त्रियां किनारे पर खड़ी हुई थीं और कुछ पानी के बीच चट्टानों पर. उनमें से अनेक मातायें अपने बच्चों को नदी में फेंक रही थीं. कुछ बच्चे तो निसहाय एकाध डुबकी खाकर बह जाते थे. पर कुछ तट के पास ही अपनी माओं से चिपट जाते थे. वे माताएं अपने ही हृदय के उन टुकड़ों को फिर पानी में फेंक देती थीं. उन देवियों के चेहरे मुर्दों की भांति भावहीन, रक्तहीन और चेष्टाहीन हो रहे थे. देखते ही देखते उन्होंने स्वयं भी नदी में छलांग लगाना शुरू कर दिया.

यह देखकर किनारे खड़े हुए कबाइली दौड़े पर इससे पहले वे कुछ कर सकें चट्टानों पर बैठी नारियां जोर से चीखीं और धम से नदी में कूद पड़ीं. तब कई कबाइली पुल पर बंदूकें तानकर खड़े हो गए और उन बहती हुई लाशों पर फायर करने लगे. उस दृश्य को देखकर हमारे साथ ही कुछ महिलाएं ही बची हुई थीं जो नदी में नहीं कूद सकी थीं. लेकिन हम खतरों के बीच भारत भूमि पर वापसी की एक उम्मीद पाले हुए थीं कि कभी तो जुल्म का ये दौर खत्म होगा और वे वापस अपनी जमीन पर आ सकेंगे.''

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