जम्मू-कश्मीर लंबे समय से देश की आंतरिक सुरक्षा के लिहाज से सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में से एक रहा है. यहां आतंकवाद, कट्टरपंथ, संगठित अपराध और सीमा पार से संचालित आतंकी नेटवर्क की चुनौतियों ने सुरक्षा एजेंसियों के सामने लगातार नई परिस्थितियां पैदा की हैं. इन चुनौतियों के बीच जेलें केवल कैदियों को रखने की जगह नहीं रह गई हैं, बल्कि वे राष्ट्रीय सुरक्षा के महत्वपूर्ण केंद्र बन चुकी हैं.
कई बार जेलों के भीतर से आतंकी गतिविधियों को निर्देशित करने, भर्ती करने, नशीले पदार्थों की तस्करी करने और संचार नेटवर्क संचालित करने की घटनाएं सामने आती रही हैं. ऐसे में केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) ने जम्मू-कश्मीर की जेल सुरक्षा व्यवस्था में एक नया अध्याय शुरू किया है.
श्रीनगर सेंट्रल जेल और जम्मू की कोट भलवाल सेंट्रल जेल में लागू किए गए 'आंतरिक सुरक्षा ड्यूटी (ISD) मॉडल' की सफलता के बाद अब केंद्र शासित प्रदेश की अन्य जेलों में भी CISF की तैनाती का रास्ता खुलता दिखाई दे रहा है.
श्रीनगर और कोट भलवाल से शुरू हुई नई सुरक्षा व्यवस्था सीआईएसएफ ने 3 अक्टूबर 2023 को श्रीनगर सेंट्रल जेल और 19 अक्टूबर 2023 को जम्मू की कोट भलवाल सेंट्रल जेल की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाली थी. इन दोनों जेलों को देश की सबसे संवेदनशील जेलों में गिना जाता है क्योंकि यहां आतंकवाद, कट्टरपंथ और गंभीर अपराधों से जुड़े कैदी रखे जाते हैं.
सीआईएसएफ के आने से पहले इन जेलों में मोबाइल फोन, सिम कार्ड, नशीले पदार्थ और अन्य प्रतिबंधित सामग्री पहुंचाने की कई घटनाएं सामने आती थीं. जेल की दीवारों के ऊपर से सामान फेंकना, मुलाकातियों के जरिए अवैध सामग्री पहुंचाना और जेल के अंदर से संचार नेटवर्क चलाना सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ था.
लेकिन सीआईएसएफ की तैनाती के बाद सुरक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव देखने को मिले. बल ने प्रशिक्षित जवानों, आधुनिक तकनीक और बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था के जरिए इन जेलों को एक नए सुरक्षा मॉडल में बदल दिया.
बहुस्तरीय सुरक्षा तंत्र बना सबसे बड़ा हथियार
सीआईएसएफ ने जेल सुरक्षा के लिए 'मल्टी-लेयर्ड सिक्योरिटी फ्रेमवर्क' लागू किया है. इसका अर्थ है कि सुरक्षा का हर स्तर दूसरे स्तर को मजबूत करता है और किसी भी संभावित चूक की संभावना को न्यूनतम कर देता है.
इस मॉडल के अंतर्गत बाहरी परिधि की निगरानी, प्रवेश और निकास बिंदुओं की जांच, कैदियों की आवाजाही पर नियंत्रण, मुलाकातियों की सघन तलाशी, जेल स्टाफ की नियमित जांच, इलेक्ट्रॉनिक निगरानी, त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र (Quick Reaction Team) जैसे कई स्तरों को एक साथ संचालित किया जा रहा है.
सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, आधुनिक जेल प्रबंधन में केवल हथियारबंद सुरक्षा पर्याप्त नहीं है. इसके लिए तकनीक, मनोवैज्ञानिक विश्लेषण और निरंतर निगरानी का समन्वय आवश्यक होता है. सीआईएसएफ ने इसी अवधारणा को जम्मू-कश्मीर की जेलों में सफलतापूर्वक लागू किया है.
अब पांच और जेलों में विस्तार की तैयारी
श्रीनगर और कोट भलवाल में मिली सफलता के बाद अब जम्मू-कश्मीर प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां पूरे केंद्र शासित प्रदेश में एक समान और पेशेवर सुरक्षा ढांचा तैयार करने पर विचार कर रही हैं.
इसके तहत इन जेलों में सीआईएसएफ की तैनाती का प्रस्ताव है.
अगर यह प्रस्ताव लागू होता है तो जम्मू-कश्मीर की जेल सुरक्षा व्यवस्था में ऐतिहासिक परिवर्तन देखने को मिलेगा. इससे सभी प्रमुख जेलों में एकीकृत सुरक्षा मानक विकसित होंगे और सुरक्षा संचालन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार आएगा
अत्याधुनिक तकनीक से लैस हो रही हैं जेलों में सुरक्षा तकनीक की भूमिका तेजी से बढ़ रही है. आज अपराधी और आतंकी संगठन भी आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं. ऐसे में सुरक्षा एजेंसियों के लिए तकनीकी रूप से उनसे एक कदम आगे रहना आवश्यक हो गया है. सीआईएसएफ ने जम्मू-कश्मीर की जेलों में कई अत्याधुनिक उपकरणों को शामिल किया है.
नॉन-लीनियर जंक्शन डिटेक्टर (NLJD), यह उपकरण छिपे हुए इलेक्ट्रॉनिक सर्किट और उपकरणों का पता लगाने में सक्षम है. चाहे मोबाइल फोन बंद हो या किसी गुप्त स्थान पर छिपाकर रखा गया हो, एनएलजेडी उसे खोजने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
डुअल-व्यू एक्स-रे बैगेज सिस्टम (X-BIS), इस तकनीक की मदद से सामान के अंदर छिपी संदिग्ध वस्तुओं की गहन जांच की जाती है. यह उपकरण विस्फोटक, हथियार, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और अन्य प्रतिबंधित सामग्री की पहचान करने में सक्षम है.
हैंड-हेल्ड मेटल डिटेक्टर (HHMD), जेल में प्रवेश करने वाले प्रत्येक व्यक्ति की तलाशी के लिए इस उपकरण का व्यापक उपयोग किया जा रहा है. इससे धातु से बनी प्रतिबंधित वस्तुओं की पहचान आसान हो गई है.
दीवारों के ऊपर से होने वाली तस्करी पर लगा विरामजम्मू-कश्मीर की जेलों में लंबे समय से एक बड़ी चुनौती जेल की दीवारों के ऊपर से मोबाइल फोन, सिम कार्ड, नशीले पदार्थ और अन्य प्रतिबंधित सामग्री फेंकने की घटनाएं रही हैं. इस चुनौती से निपटने के लिए सीआईएसएफ ने मोबाइल बुलेट प्रूफ व्हीकल (MBPV) और क्विक रिएक्शन टीम (QRT) की तैनाती की है. क्यूआरटी 24 घंटे गश्त करती है और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना मिलते ही तुरंत कार्रवाई करती है. वहीं मोबाइल बुलेट प्रूफ वाहन संवेदनशील क्षेत्रों में गश्त कर संभावित खतरों को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं.
'जीरो टॉलरेंस' नीति पर काम कर रही CISF
सीआईएसएफ ने जेल सुरक्षा में नो कम्प्रोमाइज यानी बिना किसी समझौते की नीति अपनाई है. इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जेल में आने-जाने वाले हर व्यक्ति की समान रूप से जांच होती है. चाहे वह कैदी हो, आगंतुक हो, जेल अधिकारी हो, कर्मचारी हो या स्वयं सुरक्षा बल का सदस्य हो. किसी के लिए भी नियमों में छूट नहीं दी जाती. विशेषज्ञों का मानना है कि जेल सुरक्षा में अधिकांश सेंधमारी अंदरूनी मिलीभगत या प्रक्रियागत ढिलाई के कारण होती है. ऐसे में समान जांच प्रक्रिया सुरक्षा की विश्वसनीयता को बढ़ाती है.
महानिदेशक का दौरा और सुरक्षा समीक्षा
8 जून 2026 को सीआईएसएफ के महानिदेशक (DG) प्रवीर रंजन ने श्रीनगर सेंट्रल जेल का दौरा कर सुरक्षा व्यवस्थाओं का जायजा लिया. उन्होंने अधिकारियों के साथ बैठक कर मौजूदा चुनौतियों और भविष्य की जरूरतों पर विस्तृत चर्चा की. उन्होंने तकनीक-आधारित निगरानी प्रणाली को और मजबूत करने तथा जेल सुरक्षा के लिए आधुनिक समाधानों को अपनाने पर विशेष बल दिया .महानिदेशक का यह दौरा इस बात का संकेत माना जा रहा है कि केंद्र सरकार और सीआईएसएफ जम्मू-कश्मीर की जेल सुरक्षा को लेकर दीर्घकालिक रणनीति पर काम कर रहे हैं.
भविष्य की जेलें होंगी पूरी तरह हाई-टेक
आने वाले समय में जम्मू-कश्मीर की जेलों को और अधिक तकनीक-आधारित बनाने की योजना तैयार की जा रही है. इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं, AI-सक्षम CCTV और वीडियो एनालिटिक्स आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित कैमरे. ये संदिग्ध गतिविधियों, असामान्य व्यवहार, भीड़ की गतिविधियों और सुरक्षा उल्लंघनों की स्वतः पहचान कर सकेंगे.
एकीकृत कमांड एंड कंट्रोल सिस्टमजेल परिसर की सभी सुरक्षा प्रणालियों को एक केंद्रीय नियंत्रण केंद्र से संचालित किया जाएगा. इससे किसी भी घटना पर प्रतिक्रिया की गति और प्रभावशीलता बढ़ेगी. व्यवहार विश्लेषण (Behavioural Analysis) सुरक्षाकर्मियों को कैदियों के व्यवहार में होने वाले छोटे-छोटे परिवर्तनों को पहचानने का प्रशिक्षण दिया जाएगा.
इससे कट्टरपंथ, हिंसा या भागने की साजिश जैसे खतरों का पहले से आकलन किया जा सकेगा. एंटी-सबोटाज प्रशिक्षण जेलों को आतंकी हमलों, विस्फोटक खतरों और अन्य सुरक्षा चुनौतियों से सुरक्षित रखने के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाएंगे.
राष्ट्रीय सुरक्षा में बढ़ती भूमिका
सीआईएसएफ को परंपरागत रूप से देश के हवाई अड्डों, मेट्रो नेटवर्क, परमाणु प्रतिष्ठानों, बंदरगाहों और महत्वपूर्ण औद्योगिक परिसंपत्तियों की सुरक्षा के लिए जाना जाता है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बल ने अपनी क्षमता का विस्तार करते हुए जेल सुरक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में भी उल्लेखनीय सफलता हासिल की है.
जम्मू-कश्मीर की जेलों में सीआईएसएफ का मॉडल यह दर्शाता है कि आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षित मैनपावर, कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल और निरंतर निगरानी के संयोजन से अत्यंत जटिल सुरक्षा चुनौतियों का भी प्रभावी समाधान निकाला जा सकता है. जम्मू-कश्मीर की जेलें अब केवल कैदियों को रखने की जगह नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के महत्वपूर्ण केंद्र बन चुकी हैं.
ऐसे में इनकी सुरक्षा व्यवस्था को आधुनिक, पेशेवर और तकनीक-आधारित बनाना समय की आवश्यकता है. श्रीनगर और कोट भलवाल में सीआईएसएफ के आंतरिक सुरक्षा ड्यूटी मॉडल की सफलता ने यह साबित कर दिया है कि यदि प्रशिक्षित मानव संसाधन और आधुनिक तकनीक का सही तालमेल स्थापित किया जाए, तो सबसे संवेदनशील जेलों को भी अभेद्य सुरक्षा कवच प्रदान किया जा सकता है.
महानपुर, जम्मू, अनंतनाग, कुपवाड़ा और बारामूला की जेलों तक प्रस्तावित विस्तार केवल सुरक्षा व्यवस्था का विस्तार नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर में एक नए, एकीकृत और हाई-टेक जेल प्रबंधन मॉडल की शुरुआत है. जो आने वाली किसी भी सुरक्षा चुनौती का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार दिखाई देता है.
जितेंद्र बहादुर सिंह