प्रवर्तन निदेशालय (ED) और सरकारी विभागों की दिल्ली जिमखाना क्लब पर की गई हालिया सख्त कार्रवाई के बीच मुंबई के पॉश दक्षिण इलाके भूलाभाई देसाई रोड पर स्थित ऐतिहासिक 'ब्रीच कैंडी क्लब' (ब्रीच कैंडी स्विमिंग बाथ ट्रस्ट) यूरोपियन दबदबे, नस्लीय और भेदभावपूर्ण नियमों को लेकर एक बार फिर से रडार पर आ गया है. इसी क्लब से जुड़ा एक पुराना किस्सा कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भी बताया था. उन्होंने कहा था कि बचपन में उन्हें सिर्फ भारतीय होने की वजह से क्लब के स्विमिंग पूल से बाहर निकाल दिया गया था.
इस बेहद महंगे और आलीशान क्लब की स्थापना वर्ष 1878 में बॉम्बे के केवल यूरोपीय निवासियों के मनोरंजन के लिए एक 'व्हाइट्स-ओनली' (केवल गोरों के लिए) सुविधा के रूप में की गई थी. अरब सागर के ठीक सामने चार एकड़ की बेहद कीमती और प्राइम लैंड पर फैले इस क्लब का सबसे मुख्य आकर्षण इसका विशाल आउटडोर सॉल्टवॉटर (खारे पानी) का पूल है, जिसे विशेष रूप से अविभाजित ब्रिटिश भारत के भौगोलिक नक्शे के आकार में बनाया गया है. यहां के सदस्य समुद्र के सामने बने आलीशान रेस्तरां और बार में ग्रिल्ड सीफूड और आलीशान सुविधाओं के लिए जाना जाता है.
हालांकि, मुंबई कोस्टल रोड के निर्माण के कारण अब अरब सागर का वह हिस्सा थोड़ा पीछे चला गया है जो पहले कभी इस खूबसूरत पूल के ठीक सामने हिलोरे मारता था. क्लब की सदस्यता फीस कथित तौर पर 1.2 करोड़ रुपये से ज्यादा बताई जाती है और इसकी वेटिंग लिस्ट 10 साल से ज्यादा लंबी है.
नियमों को लेकर है विवाद
सबसे बड़ा विवाद क्लब की व्यवस्था को लेकर है. आरोप है कि आज भी क्लब के ट्रस्ट और प्रबंधन में असली ताकत सिर्फ यूरोपियन या यूरोपियन पासपोर्ट रखने वाले लोगों के हाथ में है. इस मुद्दे पर सोशल मीडिया में बहस तेज हो गई है.
वेंचर कैपिटलिस्ट कौशिक सुब्रमणियन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, 'दिल्ली जिमखाना क्लब को लेकर जितना विवाद है, उससे कहीं ज्यादा ब्रीच कैंडी क्लब में है. सरकारी जमीन पर बने इस क्लब में आज तक सिर्फ यूरोपियन या यूरोपियन पासपोर्ट रखने वाले लोग ही ट्रस्ट और प्रबंधन का हिस्सा बन सकते हैं. साल 2026 में भी ये व्यवस्था है. ये हैरान करने वाला है.'
बॉम्बे HC ने यूरोपीय नियंत्रण पक्ष में सुनाया फैसला
क्लब की इस कड़े दो-स्तरीय भेदभावपूर्ण प्रशासनिक व्यवस्था को समय-समय पर भारतीय नागरिकों द्वारा देश की विभिन्न अदालतों में चुनौती दी गई है, लेकिन न्यायपालिका ने हमेशा इसके ऐतिहासिक संस्थापक डॉक्यूमेंट्स की पवित्रता को प्राथमिकता दी है. साल 2015 में बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस एससी गुप्टे ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि क्लब के संविधान के आधार पर यूरोपियनों के लिए आरक्षित ट्रस्ट व्यवस्था को सही माना था. और अदालत ने तत्कालीन प्रबंध समिति को, जिसमें भारतीय सदस्य शामिल हो गए थे, अवैध घोषित करते हुए बर्खास्त कर दिया था.
इसके बाद साल 2022 में भी हाईकोर्ट की एक डिवीजन बेंच ने इसी पुराने रुख को पूरी मजबूती से दोहराया था. अदालत ने भारतीय मूल के सदस्यों वाली एक तदर्थ (एड-हॉक) समिति को तुरंत पद छोड़ने का आदेश देते हुए साफ किया था कि कानूनी रूप से केवल यूरोपीय नागरिक ही इस सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट के साधारण ट्रस्टी बन सकते हैं. महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट एक्ट के तहत एक पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट के रूप में पंजीकृत होने के बावजूद ये क्लब पूरी तरह से अपने निजी ऐतिहासिक नियमों से बंधा हुआ है और देश की किसी भी शीर्ष अदालत या विधायिका ने अब तक हाईकोर्ट के इस आदेश को नहीं बदला है.
शशि थरुर को क्लब से किया बाहर
ब्रीच कैंडी क्लब की बेहद कट्टर नस्लीय विशिष्टता का शिकार खुद कांग्रेस सांसद और पूर्व राजनयिक शशि थरूर भी हो चुके हैं. उन्होंने इस दर्दनाक घटना का जिक्र करते हुए बताया था कि 1960 के दशक के मध्य में, जब भारत को आजाद हुए लगभग 20 साल बीत चुके थे, तब उन्हें एक बच्चे के रूप में केवल 'भारतीय होने के कारण' इस क्लब के स्विमिंग पूल से बाहर निकाल दिया गया था. उन्होंने बताया कि वह अपने एक अमेरिकी दोस्त के साथ यहां गए थे, जिसने कभी इस घटना की उम्मीद नहीं की थी.
अमेरिकी राजनयिक का अपमान
बताया जाता है कि 1960 के दशक में क्लब में भारतीयों के प्रवेश को लेकर सख्त नियम थे. एक बार एक अश्वेत अमेरिकी राजनयिक को भी क्लब में एंट्री देने से मना कर दिया गया था. इसके बाद क्लब के नियमों पर और ज्यादा सवाल उठने लगे थे. इसी बड़े विवाद और चौतरफा दबाव के बाद आखिरकार क्लब प्रबंधन को भारतीय नागरिकों के लिए साधारण सदस्यता के दरवाजे खोलने पर मजबूर होना पड़ा था.
क्या हैं पूरा मामला ?
1878 में स्थापित ये क्लब शुरुआत में केवल बॉम्बे में रहने वाले यूरोपीय लोगों के लिए बनाया गया था और लंबे वक्त तक यहां सिर्फ गोरों को ही सदस्यता दी जाती थी. आजादी के बाद बढ़ते सार्वजनिक दबाव के चलते 1960 के दशक में भारतीयों के लिए क्लब की सामान्य सदस्यता खोली गई, लेकिन क्लब की असली सत्ता व्यवस्था में बड़ा बदलाव नहीं हुआ.
1967 में सिटी सिविल कोर्ट से मंजूर ट्रस्ट संविधान के मुताबिक, क्लब के ट्रस्ट सदस्य केवल 'बॉम्बे में रहने वाले यूरोपीय' माने जाते हैं. इन्हीं लोगों को ट्रस्टी बनने और प्रबंधन समिति में शामिल होने का अधिकार है. क्लब की नीतियां तय करना, वित्तीय फैसले लेना, सदस्यता प्रक्रिया और प्रशासनिक नियंत्रण पूरी तरह इन्हीं ट्रस्ट सदस्यों के हाथ में रहता है.
वहीं, क्लब में आज करीब 4,000 सामान्य सदस्य हैं, जिनमें ज्यादातर भारतीय नागरिक शामिल हैं. ये सदस्य क्लब की सभी सुविधाओं का इस्तेमाल करते हैं और इसके लिए भारी सदस्यता शुल्क भी चुकाते हैं, लेकिन उन्हें ट्रस्ट से जुड़े मामलों में मतदान का अधिकार नहीं दिया गया है. साथ ही सामान्य सदस्य क्लब के प्रशासनिक या प्रबंधन पदों पर भी नहीं बैठ सकते. क्लब की सदस्यता मुंबई के प्रभावशाली और पुराने अमीर परिवारों के बीच प्रतिष्ठा का प्रतीक मानी जाती है, जिसमें बड़े कारोबारी, पारसी परिवार, राजनयिक और हाई-प्रोफाइल परिवार शामिल हैं.
क्यों उठ रहे सोशल मीडिया पर सवाल?
सोशल मीडिया पर लोग दिल्ली जिमखाना क्लब और ब्रीच कैंडी क्लब की तुलना कर रहे हैं. कई लोगों का कहना है कि आज के आधुनिक भारत में ऐसी व्यवस्था समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है. कुछ लोग यह भी पूछ रहे हैं कि आजादी के इतने साल बाद भी ऐसे औपनिवेशिक नियम क्यों जारी हैं.
निजी क्लब हमेशा से अपनी विशेष सदस्यता और ऊंचे दर्जे के लिए जाने जाते रहे हैं. लेकिन जब नस्ल, विरासत या पहचान किसी के लिए बाधा बन जाए, तब मामला सिर्फ शौक और प्रतिष्ठा तक सीमित नहीं रहता. दिल्ली जिमखाना क्लब पर पहले से ही सरकारी जमीन और कथित अभिजात्य संस्कृति को लेकर विवाद चल रहा है. इसी बीच अब मुंबई का ब्रीच कैंडी क्लब भी सवालों के घेरे में आ गया है. ये वही क्लब है, जहां से शशि थरूर को बचपन में कथित तौर पर सिर्फ भारतीय होने की वजह से बाहर निकाल दिया गया था.
आनंद सिंह