140 वर्षों का इतिहास, भारतीयों की पहली घुड़दौड़ का गवाह... जानें मुंबई के महालक्ष्मी रेसकोर्स की पूरी कहानी

महालक्ष्मी रेसकोर्स की जमीन पर 19 साल की लीज साल 2013 में समाप्त हो गई. तभी से मुंबई के इस रेसकोर्स का अस्तित्व खतरे में है. हाल ही में बीएमसी और महाराष्ट्र सरकार ने क्षेत्र में एक थीम पार्क स्थापित करने और रेसकोर्स को ट्रांसफर करने की योजना को नवीनीकृत किया. बीएमसी के इस कदम की RWITC के एक वर्ग, राजनेताओं और कार्यकर्ताओं से कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है.

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मुंबई के महालक्ष्मी रेसकोर्स का अस्तित्व खतरे में है मुंबई के महालक्ष्मी रेसकोर्स का अस्तित्व खतरे में है

aajtak.in

  • मुंबई,
  • 31 जनवरी 2024,
  • अपडेटेड 4:10 PM IST

महालक्ष्मी रेसकोर्स अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है. मुंबई नगर निगम ने थीम पार्क स्थापित करने की अपनी योजना को नवीनीकृत किया है. आखिर रेसकोर्स को मुंबई में इतना प्रतिष्ठित स्थान क्यों मिला हुआ है और इससे जुड़ा विवाद क्या है? दरअसल, मुंबई के महालक्ष्मी रेसकोर्स में करीब 140 साल पुरानी घुड़दौड़ की परंपरा जल्द ही बीते हुए दिनों की बात हो सकती है क्योंकि रेसकोर्स का प्रबंधन करने वाले रॉयल वेस्टर्न इंडिया टर्फ क्लब (RWITC) के 700 में से 540 सदस्यों ने इसकी जमीन पर थीम पार्क बनाने के लिए वोटिंग की है. 

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क्लब की जमीन पर 19 साल की लीज साल 2013 में समाप्त हो गई. तभी से मुंबई के इस रेसकोर्स का अस्तित्व खतरे में है. हाल ही में बीएमसी और महाराष्ट्र सरकार ने क्षेत्र में एक थीम पार्क स्थापित करने और रेसकोर्स को ट्रांसफर करने की योजना को नवीनीकृत किया. बीएमसी के इस कदम की RWITC के एक वर्ग, राजनेताओं और कार्यकर्ताओं से कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है. 

रेसकोर्स इतना प्रतिष्ठित स्थान क्यों मिला है?

कभी ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय और सऊदी अरब के राजा जैसे विदेशी नेताओं की मेजबानी करने वाले महालक्ष्मी रेसकोर्स अस्तित्व में कैसे आया? क्रिकेट की तरह ही भारत में घुड़दौड़ की शुरुआत अंग्रेजों द्वारा की गई थी. साल 1777 में भारत को अपना पहला रेसकोर्स चेन्नई (तब मद्रास) के गिंडी में मिला था.  

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उसके सालों बाद 1802 में चार ब्रिटिश अधिकारियों ने बॉम्बे टर्फ क्लब की स्थापना की और घुड़दौड़ के लिए भायखला को चुना. बाद में बॉम्बे डाइंग टेक्सटाइल कंपनी के प्रमुख कुसरो एन वाडिया ने रेसकोर्स को बायकुला से महालक्ष्मी में 225 एकड़ के भूखंड में ट्रांसफर करने का प्रस्ताव रखा, जो उस समय एक दलदली भूमि थी. अरब सागर के बगल में स्थित इस क्षेत्र को वाडिया एक शोपीस में बदलना चाहते थे. उन्होंने महालक्ष्मी रेसकोर्स बनाने के लिए उस समय 60 लाख रुपये का लोन बिना किसी ब्याज दिया था, जिसका काम साल 1883 में पूरा हुआ. 

साल 1935 में तत्कालीन सम्राट किंग जॉर्ज पंचम द्वारा क्लब के नाम में "रॉयल" जोड़ने की मंजूरी देने के बाद क्लब का नाम बदलकर रॉयल वेस्टर्न इंडिया टर्फ क्लब (RWITC) कर दिया गया. आजादी के बाद भी क्लब ने अपना नाम बरकरार रखा. 

1943 में हुआ था पहला भारतीय डर्बी

महालक्ष्मी रेसकोर्स में पहला भारतीय डर्बी यानी घोड़ों की रेस 1943 में आयोजित की गई थी. इसे बड़ौदा के राजा के स्वामित्व वाले घोड़े ने जीता था. द हिंदू की एक रिपोर्ट के अनुसार, विदेशी जॉकी 1949 तक भारतीय डर्बी पर हावी रहे, जब खीम सिंह इस प्रतियोगिता को जीतने वाले पहले भारतीय जॉकी बने. RWITC को शुरुआत में 1934 में 30 साल का पट्टा दिया गया था. बाद में इसे 1964 में अगले 30 वर्षों के लिए नवीनीकृत किया गया था. 1994 में 19 साल के पट्टे पर हस्ताक्षर किए गए थे, जो 2013 में समाप्त हो गया. तब से, रेसकोर्स का भविष्य अनिश्चित है. 

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मुंबई में आरे वन और संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान जैसे कुछ हरे-भरे क्षेत्र हैं, इनमें सबसे सुंदर महालक्ष्मी क्षेत्र है, जोकि हाजी अली जैसे विरासत और सांस्कृतिक स्थानों के करीब है. इस समय आवासीय संपत्ति की मांग करीब 60 हजार रुपये प्रति वर्ग फीट है. बिल्डर रेसकोर्स के पास होने का हवाला देकर इस क्षेत्र को संभावित खरीदारों के बीच प्रसारित करते हैं. 

क्या है पूरा विवाद?

महालक्ष्मी रेसकोर्स के जमीन शेयरिंग के अनुसार, बीएमसी एक तिहाई का मालिक है, जबकि बाकी जमीन महाराष्ट्र सरकार की है. रेसकोर्स साल 2004 से विवाद के केंद्र में है. RWITC पैनल ने तब एक फर्म, पेगासस इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ एक गोल्फ कोर्स, होटल और एक बड़े हिस्से पर एक कन्वेंशन सेंटर विकसित करने के लिए एक सौदा करने की कोशिश की थी.

(रिपोर्ट- अभिषेक डे)

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