'पुलिस जनता की जवाबदेह, मंत्रियों की नौकर नहीं', तड़ीपार आदेश रद्द करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुलिसिया एक्शन पर खड़े किए सवाल

बॉम्बे हाईकोर्ट ने सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी के खिलाफ जारी तड़ीपार आदेश रद्द कर दिया है. चौधरी एसडीपीआई के महासचिव हैं और सरकार की नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन करते रहे हैं. उनके खिलाफ पांच एफआईआर के आधार पर उन्हें एक साल के लिए मुंबई से बाहर निकाला गया था.

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बॉम्बे हाईकोर्ट ने सईद अहमद चौधरी के खिलाफ जारी निर्वासन आदेश रद्द किया (File photo: ITG) बॉम्बे हाईकोर्ट ने सईद अहमद चौधरी के खिलाफ जारी निर्वासन आदेश रद्द किया (File photo: ITG)

सृष्टि ओझा

  • नई दिल्ली,
  • 03 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 1:36 PM IST

सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने पर किसी नागरिक को उसके शहर से बाहर नहीं भेजा जा सकता. बॉम्बे हाईकोर्ट ने यह अहम टिप्पणी करते हुए मुंबई पुलिस के एक तड़ीपार आदेश को रद्द कर दिया है. यह आदेश सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) के महासचिव सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी के खिलाफ जारी किया गया था. जस्टिस माधव जामदार की बेंच ने कहा कि पुलिस अधिकारी जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं, किसी मंत्री के कर्मचारी नहीं.

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49 साल के चौधरी मुंबई के चेंबूर इलाके में रहते हैं. वे नागरिकता संशोधन कानून, एनआरसी, बाबरी मस्जिद विध्वंस, ज्ञानवापी मस्जिद विवाद, वक्फ बोर्ड में भ्रष्टाचार और पेट्रोल डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी जैसे मुद्दों पर लगातार प्रदर्शन करते रहे हैं. वे लोकसभा चुनाव भी लड़ चुके हैं.

चौधरी के खिलाफ 2019 से 2024 के बीच पांच एफआईआर दर्ज हुई थीं. ज्यादातर मामले सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने से जुड़े थे और आईपीसी की धारा 188 के तहत दर्ज थे. इसी आधार पर 20 अक्टूबर 2025 को महाराष्ट्र पुलिस एक्ट के तहत उन्हें कारण बताओ नोटिस भेजा गया. दिसंबर 2025 में चेंबूर के डिप्टी पुलिस कमिश्नर ने आदेश जारी कर उन्हें एक साल के लिए मुंबई शहर और उसके आसपास के इलाकों से बाहर निकाल दिया. 

आदेश में कहा गया था कि उनकी गतिविधियों से डर का माहौल बनता है और सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा है. कोंकण डिवीजन के डिविजनल कमिश्नर ने अपील में भी इस आदेश को सही ठहराया था.

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सुनवाई के दौरान अदालत ने सवाल उठाया कि ‘बीजेपी सरकार मुर्दाबाद’ या ‘अमित शाह मुर्दाबाद’ जैसे नारे लगाने को निर्वासन (तड़ीपार) का आधार कैसे बनाया जा सकता है. अदालत ने कहा कि पुलिस अधिकारी जनता के प्रति जवाबदेह हैं, किसी मंत्री के निजी कार्यकर्ता नहीं.

चौधरी ने हाईकोर्ट में दोनों आदेशों को चुनौती दी. उनका कहना था कि मुंबई नगर निकाय चुनाव के अहम समय में उन्हें अपने ही इलाके से बाहर रखा गया, जबकि उन्हें अपनी पार्टी के लिए प्रचार और संगठन का काम करना था. उनके वकील पयोशी रॉय ने दलील दी कि स्थानीय लोगों और दुकानदारों ने भी उन आरोपों को गलत बताया था जिनमें कहा गया था कि चौधरी के कारण डर का माहौल बना.

जस्टिस जामदार ने कहा कि सिर्फ प्रदर्शन में शामिल होने के आधार पर तड़ीपार करना गलत है और यह संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है. कोर्ट ने आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया.

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