फोन के दूसरी तरफ से घबराई हुई आवाज आ रही थी. भाई... शायद हम बस बच नहीं पाएंगे. यह शब्द थे गुरुग्राम के चार्टर्ड अकाउंटेंट विवेक अग्रवाल के, जिन्होंने दिल्ली के मालवीय नगर स्थित होटल में लगी भीषण आग के दौरान अपने रिश्तेदार पुनीत गुप्ता को आखिरी बार फोन किया था. पुनीत को उस वक्त शायद अंदाजा भी नहीं था कि फोन पर सुनाई दे रहे ये शब्द विवेक की जिंदगी के आखिरी शब्दों में शामिल हो जाएंगे. उन्होंने तुरंत विवेक को सलाह दी कि किसी कपड़े या रुमाल को पानी से भिगोकर चेहरे पर रख लें, ताकि धुएं से बचाव हो सके. लेकिन आग और जहरीले धुएं का कहर इतना भयानक था कि यह सलाह भी जिंदगी नहीं बचा सकी.
पिता को देखने आए थे, मौत से सामना हो गया
यह कहानी सिर्फ एक अग्निकांड की नहीं है. यह उस परिवार की कहानी है जो अपने बीमार पिता का हालचाल लेने दिल्ली आया था. विवेक अग्रवाल के पिता राधेश्याम अग्रवाल पिछले कई दिनों से फेफड़ों के गंभीर संक्रमण के कारण दिल्ली के मैक्स अस्पताल में भर्ती थे. परिवार चिंतित था. बेटा पिता के पास रहना चाहता था. मां अपने पति की देखभाल करना चाहती थीं. पोतियां दादा से मिलने आई थीं. इसी वजह से विवेक अग्रवाल ने अस्पताल के नजदीक मालवीय नगर स्थित होटल में दो कमरे बुक कराए थे. किसी ने नहीं सोचा था कि अस्पताल में बीमारी से जूझ रहे पिता के परिवार पर मौत इतनी तेजी से टूट पड़ेगी.
दादा से मिलने एक दिन पहले ही लौटी थी बेटी
परिजनों के मुताबिक, हादसे में जान गंवाने वालों में सबसे छोटी सदस्य जीविसा थीं. वह बेंगलुरु से सिर्फ एक दिन पहले ही दिल्ली पहुंची थीं. उनका मकसद था अपने दादा से मिलना, उनका हाल पूछना और परिवार के साथ कुछ समय बिताना. लेकिन किस्मत ने उन्हें वह मौका नहीं दिया. दादा से मिलने आई पोती हमेशा के लिए बिछड़ गई.
एक फोन कॉल जो हमेशा याद रहेगा
पुनीत गुप्ता बताते हैं कि आग तेजी से फैल रही थी. होटल के अंदर धुआं भर चुका था. लोगों को बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिल रहा था. इसी दौरान विवेक का फोन आया. दूसरी तरफ घबराहट साफ महसूस हो रही थी. भाई, शायद हम बच नहीं पाएंगे... यह सुनकर पुनीत के पैरों तले जमीन खिसक गई. उन्होंने विवेक को हिम्मत बंधाने की कोशिश की. कहा कि किसी तरह खुद को धुएं से बचाओ, रुमाल भिगो लो, नीचे झुककर सांस लो. लेकिन शायद तब तक बहुत देर हो चुकी थी. कुछ ही देर बाद संपर्क टूट गया. और फिर जिंदगी भी.
एक रात में उजड़ गया पूरा घर
इस हादसे में विवेक अग्रवाल, उनकी पत्नी तरजिनी अग्रवाल, मां प्रेमलता अग्रवाल, बेटियां जीविसा और वरिया समेत परिवार के कुल नौ सदस्यों की मौत हो गई. राजस्थान के किशनगढ़ से आए विवेक के मौसा अशोक गोयल, मौसी कमला गोयल और अन्य रिश्तेदार भी आग की चपेट में आ गए. जो लोग बीमार पिता का हाल पूछने आए थे, वे खुद मौत का शिकार बन गए.
अस्पताल में अब भी भर्ती हैं पिता
परिवार के मुखिया राधेश्याम अग्रवाल अभी भी अस्पताल में भर्ती हैं. वह बीमारी से लड़ रहे हैं. परिजन बताते हैं कि पूरा परिवार उन्हीं की देखभाल के लिए दिल्ली आया था. स्थिति यह है कि जिस पिता के लिए बेटा, बहू, पोतियां और रिश्तेदार दिल्ली पहुंचे थे, उसी पिता के सामने अब पूरा परिवार खत्म हो चुका है. यह खबर सुनने वाला हर व्यक्ति एक ही सवाल पूछ रहा है क्या कोई इंसान इतना बड़ा दुख सह सकता है?
गुरुग्राम में पसरा मातम
गुरुग्राम के सेक्टर-46 स्थित विवेक अग्रवाल के घर के बाहर बुधवार को असामान्य सन्नाटा था. आमतौर पर जिस घर में बच्चों की आवाजें सुनाई देती थीं, वहां शोक में डूबे लोग खड़े थे. पड़ोसी योगेंद्र सिंह बताते हैं कि विवेक बेहद सरल और मिलनसार व्यक्ति थे. किसी भी सामाजिक काम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे. उनकी पत्नी सामाजिक कार्यों से जुड़ी थीं. दोनों बेटियां पढ़ाई में होनहार थीं. किसी ने कभी कल्पना नहीं की थी कि यह परिवार एक साथ इस तरह खत्म हो जाएगा. एक अन्य पड़ोसी ने कहा कि पूरी कॉलोनी सदमे में है. लोगों को अब भी विश्वास नहीं हो रहा कि जिन लोगों से कल तक मुलाकात होती थी, वे आज नहीं रहे.
होटल की सुरक्षा पर उठ रहे सवाल
हादसे के बाद होटल की सुरक्षा व्यवस्थाओं पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं. परिजनों का कहना है कि होटल तक पहुंचने का रास्ता बेहद संकरा था. आग लगने की स्थिति में बाहर निकलने के पर्याप्त इंतजाम नजर नहीं आए. बताया जा रहा है कि जिस इमारत में आग लगी, वह पांच मंजिला थी. उसमें प्रवेश और निकास का मुख्य रास्ता सीमित था. आग लगने के बाद धुआं तेजी से पूरे भवन में फैल गया. यही वजह रही कि कई लोग बाहर निकलने का मौका तक नहीं पा सके.
21 लोगों की गई जान
मालवीय नगर अग्निकांड में कुल 21 लोगों की मौत हुई. इनमें कई विदेशी नागरिक भी शामिल थे जो आसपास के अस्पतालों में भर्ती अपने परिजनों की देखभाल के लिए दिल्ली आए हुए थे. बचाव दल ने दर्जनों लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला, लेकिन कई लोगों को नहीं बचाया जा सका.
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