दिवाली से पहले ही ​'बहुत खराब' हो चुकी थी दिल्ली की हवा, फिर कैसे हो रहा वायु प्रदूषण?

दिल्ली में 31 अक्टूबर को जहां पटाखों का शोरगुल रात को ज्यादा सुनाई दिया, वहीं इससे ठीक पहले आंकड़ों के अनुसार, पराली के धुएं का असर एक चौथाई से भी अधिक था. 30 अक्टूबर की शाम 4 बजे से 31 अक्टूबर की शाम 4 बजे तक के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली के वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) का स्तर 328 तक पहुंच गया, जो कि बेहद खराब श्रेणी में आता है.

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दिल्ली में पटाखे जलने से पहले ही एक्यूआई बहुत खराब श्रेणी में पहुंच चुका था. (PTI Photo) दिल्ली में पटाखे जलने से पहले ही एक्यूआई बहुत खराब श्रेणी में पहुंच चुका था. (PTI Photo)

कुमार कुणाल

  • नई दिल्ली,
  • 01 नवंबर 2024,
  • अपडेटेड 9:32 PM IST

दिवाली के दौरान दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों में वायु प्रदूषण एक गंभीर चर्चा का विषय बन गया है. हर साल दिवाली के मौके पर पटाखों से उत्पन्न होने वाले प्रदूषण की बात होती है, लेकिन इस बार इसका एक और गंभीर पहलू देखने को मिला– पराली जलने से होने वाला प्रदूषण. 31 अक्टूबर को जब दिल्ली में दिवाली मनाई जा रही थी, उसी दिन पराली जलने से होने वाला प्रदूषण रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया.

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इस साल 31 अक्टूबर को, दिल्ली में वायु प्रदूषण में पराली का योगदान 27.6 प्रतिशत तक पहुंच गया. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेट्रलॉजी पुणे का यह आंकड़ा चिंताजनक है, जो दर्शाता है कि प्रदूषण के लिए सिर्फ पटाखे ही नहीं, बल्कि पराली जलाना भी प्रमुख कारण है. पंजाब और हरियाणा में किसानों द्वारा फसल के अवशेष जलाए जाने के कारण दिल्ली के प्रदूषण में पराली का योगदान प्रत्येक वर्ष बढ़ता जा रहा है.

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हालांकि 31 अक्टूबर की रात को दिल्ली में पटाखों का इस्तेमाल किया गया, लेकिन यह डेटा 30 अक्टूबर की शाम 4 बजे से 31 अक्टूबर की शाम 4 बजे तक का है. इससे स्पष्ट होता है कि पटाखों से पहले ही पराली का प्रभाव प्रदूषण पर भारी पड़ रहा था. 30 अक्टूबर की शाम 4 बजे से 31 अक्टूबर की शाम 4 बजे तक के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली के वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) का स्तर 328 तक पहुंच गया, जो कि बेहद खराब श्रेणी में आता है.

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इस प्रदूषण में पराली से उत्पन्न धुएं का योगदान सबसे अधिक रहा, जिसने दिवाली से ठीक पहले हवा में जहर घोल दिया. 31 अक्टूबर को दिल्ली में जहां पटाखों का शोरगुल रात को ज्यादा सुनाई दिया, वहीं इससे ठीक पहले आंकड़ों के अनुसार, पराली के धुएं का असर एक चौथाई से भी अधिक था. यह स्थिति दर्शाती है कि पटाखों के अलावा पराली जलना भी वायु प्रदूषण का एक बड़ा घटक बना, जो सिर्फ दिवाली ही नहीं बल्कि आने वाले दिनों में प्रशासन के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है.

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पंजाब में इस दौरान पराली जलाने के 500 से अधिक मामले दर्ज किए गए, जो इस साल की सबसे अधिक संख्या है. वहीं, हरियाणा में भी पराली जलने के मामले कई गुना बढ़ गए हैं. इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि उत्तर भारत के राज्यों में फसल अवशेष जलाने की समस्या कितनी गंभीर है और यह दिल्ली के प्रदूषण में कितना बड़ा योगदान दे रही है.

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