दुनिया में कहीं चल रही जंग भला छत्तीसगढ़ के एक आम किसान के खेत को कैसे तबाह कर सकती है? पहली नजर में यह बात थोड़ी अजीब लगेगी, लेकिन दुर्ग जिले के धमधा इलाके में आज यही कड़वी हकीकत है. यहां एक तरफ वैश्विक तनाव ने डीजल का संकट खड़ा किया, तो दूसरी तरफ अचानक बदले मौसम की मार ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी.
रायपुर से करीब 70 किलोमीटर दूर बसा यह धमधा क्षेत्र पपीते की खेती का पावरहाउस माना जाता है, जहां हर साल 51 हजार मीट्रिक टन से ज्यादा पैदावार होती है. टमाटर के साथ पपीता यहां की सबसे मुख्य नकदी फसल है. किसान इसे बड़े चाव से उगाते हैं क्योंकि यह महज 6 से 8 महीने में तैयार होकर अच्छा मुनाफा दे देती है.
लेकिन जैसे ही आजतक की टीम बसनी गांव के 'मां अंबिका कृषि फार्म' पहुंची, तो जमीन पर हालात बिल्कुल उलट नजर आए. खेतों की पगडंडियों के बीच ट्रैक्टर चल तो रहे थे, लेकिन फसल काटने के लिए नहीं बल्कि उसे रौंदने के लिए. किसान खुद अपने हाथों से पपीते के हरे-भरे पौधों को उखाड़कर फेंक रहे थे. जब हमने इसकी वजह जानी, तो पता चला कि दुनिया भर में चल रहे तनाव का असर अब सीधे इन किसानों की जेब तक पहुंच चुका है. एक तरफ डीजल की किल्लत तो दूसरी तरफ मौसम की मार ने बिजली भी गुल कर दी. इस दोहरी आफत से जहां खेती की लागत दोगुनी हो गई, वहीं तैयार फसल को उठाने वाले खरीदार बाजार से पूरी तरह गायब हैं. इसी भारी नुकसान से टूटे किसानों के पास अब कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा, इसीलिए वे अपनी ही लहलहाती फसल को उजाड़ने के लिए मजबूर हैं.
ईंधन संकट और बिजली की मार
फार्म के मालिक और किसान शेर सिंह ने बताया कि 'इस साल महंगाई और दिक्कतों ने हमारी कमर तोड़ दी है.' उनके मुताबिक, ईंधन की उपलब्धता और कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण सिंचाई पंप चलाना मुश्किल हो गया. इसी बीच तेज आंधी-तूफान से बिजली के खंभे और तार टूट गए, जिससे कई दिनों तक बिजली आपूर्ति प्रभावित रही. ऐसे में फसल को बचाने के लिए उन्हें महंगे डीजल से जनरेटर चलाने पड़े. उन्होंने कहा कि सिर्फ 10 दिनों में जनरेटर और पंप चलाने पर करीब 1.2 लाख रुपये खर्च हो गए, लेकिन इसके बावजूद बाजार में अच्छे दाम मिलने की कोई गारंटी नहीं थी.
फसल तैयार, पर खरीदार गायब
किसानों के सामने असली मुसीबत तब खड़ी हुई, जब फसल कटाई के लिए पूरी तरह तैयार हो गई. इलाके के किसान जालम पटेल ने बताया कि इस बार फसलों को बड़े बाजारों तक पहुंचाने वाली गाड़ियां ही नहीं मिलीं. पश्चिम बंगाल, दिल्ली और हरियाणा से जो व्यापारी हर साल आते थे, इस बार वे न के बराबर पहुंचे. नतीजा यह हुआ कि पपीते समय पर मंडियों तक पहुंच ही नहीं सके. कोई दूसरा रास्ता न देख, मजबूरन किसानों को अपनी खड़ी फसल खेत से हटानी पड़ी. बचा हुआ कुछ हिस्सा मवेशियों को खिलाना पड़ा, क्योंकि अगली बुवाई के लिए खेत खाली करना भी जरूरी था.
लागत बढ़ी, जोखिम बढ़ा और राहत नहीं
पीढ़ियों से किसानी कर रहे युवा किसान मधुसूदन राणा ने आधुनिक खेती के इस बढ़ते खर्च पर बात की. उनके मुताबिक, बागवानी में इस्तेमाल होने वाले ड्रिप पाइप व मल्चिंग शीट जैसी जरूरी चीजों के दाम पिछले एक साल में 40 से 50 फीसदी तक बढ़ चुके हैं. राणा बताते हैं कि पहले जिस एक एकड़ खेत को तैयार करने में करीब 15 हजार रुपये लगते थे, आज वही खर्च बढ़कर 25 से 30 हजार रुपये तक पहुंच गया है.
इस भारी-भरकम खर्च के ऊपर से बिजली की आंखमिचौली ने मुसीबत दोगुनी कर दी है. अनियमित सप्लाई के चलते किसानों की निर्भरता डीजल जनरेटरों पर बहुत ज्यादा बढ़ गई है, जिससे लागत में भारी इजाफा हुआ. किसानों का साफ कहना है कि पहले जो जनरेटर सिर्फ संकट के समय में बैकअप के तौर पर इस्तेमाल होते थे, अब उनका तेल फूंकना रोज का नियमित खर्च बन चुका है.
सरकारी योजनाएं और जमीनी हकीकत
सरकार की ओर से सस्ती बिजली और कृषि योजनाओं के दावे किए जाते हैं, लेकिन किसानों का कहना है कि ये योजनाएं उनकी वास्तविक समस्याओं को पूरी तरह हल नहीं कर पा रही हैं. इस मामले पर जब कृषि मंत्री रामविचार नेताम से बात की गई, तो उन्होंने कहा कि सरकार विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों के जरिए लगातार किसानों की मदद कर रही है.
हालांकि, जमीन पर काम कर रहे किसान मानते हैं कि बढ़ती लागत और बाजार की अनिश्चितता के बीच राहत सीमित है. किसानों की सबसे बड़ी मांग बागवानी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) या गारंटीड रेट तय करने की है, ताकि वे खेती शुरू करने से पहले अपने जोखिम का आकलन कर सकें. फिलहाल, धमधा के कई किसान बढ़ती लागत और अनिश्चित मुनाफे के बीच फंसे हुए हैं, जहां तैयार फसल होने के बावजूद राहत नजर नहीं आती.
सुमी राजाप्पन