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बॉलीवुड

जब ह‍िंदी सिनेमा के पर्दे पर दिखा मजदूरों का दर्द, सुपरस्टार्स ने निभाए अहम रोल

आजतक एंटरटेनमेंट डेस्क
  • नई दिल्ली,
  • 01 मई 2026,
  • अपडेटेड 6:30 AM IST
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मजदूर सिर्फ फैक्ट्री में काम करने वाला इंसान नहीं होता, वो हर उस आम आदमी का चेहरा है जो अपने परिवार और सपनों के लिए दिन-रात मेहनत करता है.

बॉलीवुड ने भी समय-समय पर मजदूरों के संघर्ष, दर्द, हक की लड़ाई और उनकी जिंदगी को बड़े पर्दे पर बेहद असरदार तरीके से दिखाया है. लेबर डे के मौके पर आइए नजर डालते हैं उन शानदार फिल्मों पर, जिन्होंने मजदूरों की दुनिया को कभी इमोशनल तो कभी बागी अंदाज में दर्शकों के सामने पेश किया.

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मिल मजदूर (1934)- मुंशी प्रेमचंद की लिखी इस फिल्म में मजदूरों के शोषण और उनकी मुश्किल जिंदगी को दिखाया गया था. फिल्म इतनी असरदार थी कि डर के कारण सेंसर बोर्ड ने इसे रोक दिया. कहा गया कि इससे मजदूर आंदोलन भड़क सकता है.

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नया दौर (1957)- दिलीप कुमार स्टारर इस फिल्म में मशीनों और मजदूरों की लड़ाई दिखाई गई. कहानी बताती है कि कैसे मशीनें गरीब मेहनतकश लोगों की रोजी-रोटी छीनने लगती हैं. लेकिन फिल्म का संदेश साफ था- इंसान और मशीन दोनों साथ रह सकते हैं.

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बहारों के सपने (1967)- ये फिल्म एक गरीब मजदूर और उसके पढ़े-लिखे बेटे की कहानी है. नौकरी और सम्मान की तलाश में उन्हें बार-बार अपमान झेलना पड़ता है. फिल्म में मजदूरों के दर्द और विद्रोह को इमोशनल अंदाज में दिखाया गया.

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पैगाम (1959)- दिलीप कुमार और राजकुमार की इस फिल्म में मिल मालिक और मजदूरों के बीच की टकराव दिखाई गई. कहानी में प्यार, संघर्ष और हड़ताल के बीच मजदूरों की एकता का दमदार संदेश दिया गया.

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सगीना (1970)- दिलीप कुमार की ये फिल्म मजदूर आंदोलन की राजनीति पर बनी थी. कहानी दिखाती है कि कैसे एक आम मजदूर सत्ता और चालबाजियों का शिकार बन जाता है और अपने ही लोगों से दूर हो जाता है.

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नमक हराम (1973)- राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन की ये फिल्म दोस्ती और मजदूरों की जिंदगी पर आधारित थी. फिल्म में दिखाया गया कि अमीर और गरीब की दुनिया कितनी अलग होती है और सत्ता के खेल में अक्सर गरीब इंसान कुचल जाता है.

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रोटी कपड़ा और मकान (1974)- मनोज कुमार की इस फिल्म ने बेरोजगारी, महंगाई और आम आदमी की परेशानियों को जोरदार तरीके से दिखाया. फिल्म ने बताया कि रोटी, कपड़ा और मकान हर इंसान की सबसे बड़ी जरूरत है.

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दीवार (1975)- अमिताभ बच्चन की इस आइकॉनिक फिल्म में मजदूरों के शोषण से शुरू हुई कहानी बाद में गुस्से और बगावत का चेहरा बन जाती है. फिल्म का दर्द और संघर्ष आज भी लोगों को याद है.

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काला पत्थर (1979)- कोयला खदान में काम करने वाले मजदूरों की जिंदगी पर बनी इस फिल्म में उनकी जान जोखिम में डालने वाले सिस्टम को दिखाया गया. अमिताभ बच्चन का किरदार अपने अंदर के दर्द और पश्चाताप से लड़ता नजर आता है.

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मजदूर (1983)-
दिलीप कुमार की इस फिल्म में मजदूरों के हक और मालिकों के खिलाफ उनकी लड़ाई दिखाई गई. फिल्म ने बताया कि मेहनतकश लोग अब दबने वाले नहीं हैं और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा सकते हैं.

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आघात (1985)- गोविंद निहलानी की इस फिल्म में मजदूर यूनियनों की राजनीति और संघर्ष को दिखाया गया. कहानी सवाल उठाती है कि मजदूरों के हक की लड़ाई में सिद्धांत ज्यादा जरूरी हैं या इंसान की जिंदगी.

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