उत्तरकाशी जिला: समीकरण से ज्यादा मिथक पर निर्भरता, आप-बीजेपी-कांग्रेस में त्रिकोणीय मुकाबला

उत्तराखंड का उत्तरकाशी जिला राजनीतिक समीकरणों से ज्यादा मिथक पर निर्भर रहता है. यहां की दो ऐसी सीटें जहां पर हारना और जीतना दोनों ही मायने रखता है. ये सीटे हैं गंगोत्री और पुरोला.

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उत्तरकाशी जिला का गंगोत्री धाम उत्तरकाशी जिला का गंगोत्री धाम

सुधांशु माहेश्वरी

  • नई दिल्ली,
  • 05 फरवरी 2022,
  • अपडेटेड 11:13 PM IST
  • आप की एंट्री से त्रिकोणीय बन गया यहां का मुकाबला
  • सीएम उम्मीदवार कर्नल अजय कोठियाल की बड़ी चुनौती

उत्तराखंड चुनाव में इस बार त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिल रहा है. कांग्रेस-बीजेपी तो हमेशा से चुनावी मैदान में सक्रिय रही हैं, इस बार आम आदमी पार्टी भी पूरा दमखम लगा रही है. ये दमखम इस बार उत्तकाशी जिले में ज्यादा देखने को मिल रहा है क्योंकि गंगोत्री सीट से आप के सीएम उम्मीदवार कर्नल अजय कोठियाल चुनावी मैदान में ताल ठोक रहे हैं. ऐसे में उत्तराखंड का उत्तरकाशी जिला इस बार निर्णायक साबित होने वाला है. इस जिले से कहने को सिर्फ तीन सीटें निकलती हैं, लेकिन यहां की जीत से पूरे राज्य में माहौल को अपने पक्ष में किया जा सकता है.

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पुरोला सीट और यहां का दिलचस्प मिथक

उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले से ही विधानसभा चुनाव की शुरुआत होती है. इस जिले से तीन सीटें निकलती हैं- पुरोला, यमुनोत्री और गंगोत्री. यहां पर हर सीट पर अपने समीकरण हैं, लेकिन कुछ मिथक भी जुड़े हुए हैं. ये ऐसे मिथक हैं जिसने उत्तराखंड की राजनीति में परिवर्तन वाले ट्रेंड को बल दिया है.  बात सबसे पहले पुरोला विधानसभा सीट की जिसको लेकर ये दिलचस्प मिथक देखने को मिलता है कि जो भी पार्टी इस सीट से जीत जाती है, उसे विपक्ष में बैठना पड़ जाता है. जब से उत्तराखंड अलग राज्य बना है, ये ट्रेंड इस सीट पर लगातार बरकरार है. 2002 के चुनाव में इस सीट से भाजपा के मालचंद जीत कर आए थे. लेकिन बीजेपी को उस चुनाव में हार मिली थी. फिर 2007 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के राजेश जुवांठा ने उस सीट पर अपना कब्जा किया लेकिन हाथ से सत्ता चली गई. 2012 की बारी आई, बीजेपी ने पुरोला से फिर मालचंद को मौका दिया. वे तो जीत लिए लेकिन पार्टी चुनाव हार गई. इसी तरह पिछले विधानसभा चुनाव में यानी की 2017 में कांग्रेस के राजकुमार विधायक बन लिए, लेकिन खुद कांग्रेस सत्ता से काफी दूर रह गई.

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अब ये कहने को सिर्फ एक संजोग हो सकता है, लेकिन हर पार्टी ने इस ट्रेंड में अपना विश्वास जताया है. इस बार की बात करें तो बीजेपी ने पुरोला से दुर्गेशलाल को चुनावी मैदान में उतारा है. वे युवा हैं और एक साफ-सुथरी छवि रखते हैं. कहा जा रहा है कि पीएम मोदी के चेहरे का लाभ भी उन्हें इस सीट पर मिल सकता है. वहीं कांग्रेस ने इस बार मालचंद को अपना उम्मीदवार बनाया है. ऐसे में इस सीट पर कड़ी टक्कर देखने को मिल रही है. 

गंगोत्री सीट और त्रिकोणीय मुकाबला

पुरोला से आगे बढ़ें तो गंगोत्री सीट पर भी समीकरणों से ज्यादा मिथक हावी रहते हैं. इस सीट को लेकर ये कहा जाता है कि जो भी दल यहां से चुनाव जीत जाता है, उसका सत्ता में आना तय रहता है. अब ये भी सिर्फ एक ट्रेंड है जो 2002 से ऐसे ही चलता आ रहा है. 2002 में कांग्रेस के विजयपाल सजवाण ने गंगोत्री सीट जीत ली थी. उनकी उस जीत के साथ कांग्रेस भी पहली बार सत्ता में आ गई थी. फिर 2007 में इस सीट से बीजेपी के गोपाल रावत विधायक बने, नतीजा ये निकला कि सरकार भी भाजपा ने अपनी बनाई. इसके बाद 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने विजय पाल सजवाण पर अपना भरोसा जताया और कांग्रेस ने पहाड़ी राज्य में अपनी वापसी कर ली. लेकिन फिर इस ट्रेंड ने 2017 मे कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया क्योंकि बीजेपी के गोपाल रावत चुनाव जीत लिए और भाजपा की प्रचंड बहुमत वाली सरकार बन गई.

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लेकिन इस बार गंगोत्री सीट पर मुकाबला सबसे ज्यादा दिलचस्प माना जा रहा है. कांग्रेस-बीजेपी के तो तगड़े उम्मीदवार हैं हीं, लेकिन सबसे बड़ा एक्सपेरिमेंट खेला है आम आदमी पार्टी ने जिसने अपने सीएम उम्मीदवार कर्नल अजय कोठियाल को यहां से उम्मीदवार बना दिया है. कर्नल की युवाओं के बीच में जबरदस्त पकड़ है, केदारनाथ पुनर्निर्माण के दौरान भी उनके कार्य की सभी ने सराहना की थी. ऐसे में उन्हें उनकी जीत सुनिश्चित दिख रही है. उनके इस विश्वास ने ही इस सीट पर मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है. इस बार बीजेपी ने यहां से सुरेश चौहान को मौका दिया है. कांग्रेस ने फिर विजयपाल सजवाण पर भरोसा जताया है और आम आदमी पार्टी के तो कर्नल अजय कोठियाल मैदान में हैं ही. 

यमुनोत्री सीट जहां क्षेत्रीय ताकतवर

अब बात करते हैं यमुनोत्री सीट की जहां पर कांग्रेस-बीजेपी से ज्यादा क्षेत्रीय दलों का दबदबा रहा है. इस सीट से दो बार क्षेत्रीय दल जीते हैं, वहीं एक-एक बार कांग्रेस-बीजेपी के विधायक बने हैं. यमुनोत्री की राजनीति पर नजर डालें तो साफ पता चलता है कि ये एक लौती ऐसी सीट है जहां पर ये मायने ही नहीं रखता कि कौन सी पार्टी मैदान में खड़ी है. जनता सिर्फ और सिर्फ अपने मुद्दे और प्रत्याशी के आधार पर वोट तय करती है. इसी वजह से राष्ट्रीय पार्टियों से ज्यादा क्षेत्रीय दलों का कमाल रहा है. यमुनोत्री सीट से 2002 और 2012 के चुनाव में उत्तराखंड क्रांति दल ने जीत हासिल की थी, वहीं कांग्रेस को एक बार 2007 में जीत मिली, तो वहीं बीजेपी ने ये कमाल 2017 में मोदी लहर के दौरान किया. इस बार बीजेपी ने इस सीट से केदार सिंह रावत को मौका दिया है, वहीं कांग्रेस से दीपक बिजल्वाण मैदान में खड़े हैं. इसके अलावा संजय डोभाल निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं.

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इन तीनों सीटों की कुछ समान समस्याएं भी सामने आई हैं जो कई सालों बाद भी जस की तस बनी हुई हैं. उत्तरकाशी जिले को एक अच्छे अस्पताल का इंतजार है जहां पर स्वास्थ्य सेवाएं तो मौजूद रहे हीं, इसके अलावा अच्छे डॉक्टर भी अपनी सेवाएं दें. इसके अलावा बाजारों में लगने वाला ट्रैफिक जाम भी यहां पर बड़ी समस्या है. पुरोला सीट पर तो जाम ही सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है. 

हर सीट का जातीय समीकरण

पुरोला- पुरोला विधानसभा सीट के सामाजिक समीकरणों की बात करें तो इस विधानसभा क्षेत्र में हर जाति-वर्ग के लोग निवास करते हैं.  इस विधानसभा सीट का चुनाव परिणाम निर्धारित करने में अन्य पिछड़ा वर्ग के साथ ही अनुसूचित जाति का योगदान रहता है. 2017 के चुनाव में इस सीट से कांग्रेस के राजकुमार ने बीजेपी के मालचंद को मात दी थी.

गंगोत्री- इस सीट पर पहली बार त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिल रहा है. आप के सीएम उम्मीदवार कर्नल अजय कोठियाल यहां से चुनावी किस्मत आजमा रहे हैं. युवाओं का एक वर्ग भी उनके साथ खड़ा है. ऐसे में दोनों कांग्रेस और बीजेपी पूरी ताकत लगा रही हैं.

यमुनोत्री- यमुनोत्री विधानसभा सीट पर बहुसंख्य मतदाता हिन्दू ही हैं. जातीय समीकरण की बात करें तो यहां पर ठाकुर मतदाता -55%, ब्राह्मण मतदाता-18%, अनुसूचित जाति-27% और मुस्लिम-0.01% हैं. 2017 में भाजपा के केदार सिंह रावत ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस उम्मीदवार संजय डोभाल को हराया था. 

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