बांदवन (Bandwan) विधानसभा क्षेत्र राज्य के पुरुलिया जिले के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में स्थित एक महत्वपूर्ण अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षित सीट है. यह बांदवन, बराबाजार और मानबाजार द्वितीय सामुदायिक विकास खंडों से मिलकर बनती है. यह झारग्राम लोकसभा सीट के सात विधानसभा खंडों में से एक है.
हैं और दशकों में एक दिलचस्प राजनीतिक पैटर्न देखने को मिला है. जो भी पार्टी यहां जीतती है, उसे आमतौर पर लगातार दो कार्यकाल मिलते ही हैं. 1962 और 1967 में लोक सेवक संघ ने लगातार जीत दर्ज की. इसके बाद कांग्रेस ने 1969, 1971 और 1972-तीन बार लगातार जीत हासिल की. फिर 1977 से 2011 तक CPI(M) का एकछत्र राज रहा, जिसमें उसने आठ बार लगातार जीत दर्ज की. अंततः 2016 में तृणमूल कांग्रेस ने वाम मोर्चे का लंबे समय से चला आ रहा दबदबा तोड़ा और 2021 में भी अपनी जीत बनाए रखी.
2016 में तृणमूल के उम्मीदवार राजीब लोचन सरें ने CPI(M) के तत्कालीन MLA सुसंत बेसरा को 20,307 मतों से हराया. 2021 में उन्होंने फिर जीत दोहराई और BJP के पार्सी मुर्मू को 18,831 मतों से मात दी. इस दौरान CPI(M) का प्रदर्शन तेजी से गिरा और उसका वोट प्रतिशत मात्र 9.22% रह गया, जबकि तृणमूल को 47.02% और BJP को 39.21% मत मिले. 2024 के लोकसभा चुनावों में भी यही रुझान दिखा, तृणमूल ने बांधवन खंड में 27,444 मतों की बढ़त हासिल की, BJP दूसरे स्थान पर रही और CPI(M) 8.45% पर सिमट गई. हालांकि, 2019 में BJP ने इस क्षेत्र में तृणमूल को 2,970 मतों से पीछे छोड़ दिया था, जबकि CPI(M) का वोट शेयर तब भी 9.20% के आसपास था.
2024 में बांदवन में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 2,97,903 थी, जो 2021 के 2,84,840 और 2019 के 2,72,609 से बढ़ी है. 2021 में अनुसूचित जनजाति मतदाता कुल मतदाताओं के 35.82% थे. यह क्षेत्र लगभग पूरी तरह ग्रामीण है- शहरी मतदाता केवल 3.86% हैं. मतदान प्रतिशत हमेशा से ऊंचा रहा है. 2021 के विधानसभा चुनाव में 85.06% और 2016 में 85.16% मतदान दर्ज हुआ. लोकसभा चुनावों में यह थोड़ा कम रहा-2024 में 81.24% और 2019 में 83.57% था.
भौगोलिक दृष्टि से बांदवन छोटा नागपुर प्लेटो के उतार-चढ़ाव वाले भूभाग में स्थित है, जहां छोटी-बड़ी पहाड़ियां, घने वन और लाल लेटराइट मिट्टी पाई जाती है. कांगेसबती और शिलाबती जैसी नदियां मौसमी कृषि को सहारा देती हैं. इसका अर्थतंत्र मुख्यतः कृषि-आधारित है. धान, मक्का और दालें यहां की प्रमुख फसलें हैं. जंगल आधारित उत्पाद, पशुपालन और छोटे पैमाने पर पत्थर खनन भी आजीविका के साधन हैं. यहां साल और महुआ के पेड़ प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं तथा आदिवासी समुदाय इन पर अत्यधिक निर्भर रहते हैं.
बुनियादी ढांचे के स्तर पर यह क्षेत्र अभी भी विकास की राह पर है. बांदवन को बराबाजार, मानबाजार और बलारामपुर से जोड़ने वाली सड़कें क्रियाशील तो हैं, लेकिन बरसात में स्थिति खराब हो जाती है. बिजली की पहुंच व्यापक है, परंतु कटौती काफी होती है. पानी की आपूर्ति मुख्यतः नलकूपों और हैंडपंपों पर निर्भर है. पाइप्ड पानी सीमित क्षेत्रों में उपलब्ध है. स्वास्थ्य व्यवस्था प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और ब्लॉक अस्पतालों पर आधारित है, जबकि गंभीर मामलों को पुरुलिया भेजना पड़ता है. शिक्षा की स्थिति बेहतर होने के बावजूद आदिवासी छात्रों में ड्रॉपआउट दर अभी भी अधिक है. बांधवन कॉलेज और कई उच्च विद्यालय यहां मौजूद हैं.
बांधवन पुरुलिया मुख्यालय से लगभग 59 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है. बराबाजार 28 किमी, मानबाजार 35 किमी और बलारामपुर 42 किमी की दूरी पर हैं. झारखंड का जमशेदपुर 65 किमी, घाटशिला 58 किमी, बांकुरा 82 किमी और ओडिशा का रैरंगपुर लगभग 95 किमी दूर है. राज्य की राजधानी कोलकाता यहां से लगभग 270 किमी दक्षिण-पूर्व में स्थित है.
ऐतिहासिक रूप से यह क्षेत्र प्राचीन मल्लभूम राज्य का हिस्सा रहा है, जो अपने टेराकोटा मंदिरों और आदिवासी सांस्कृतिक धरोहर के लिए प्रसिद्ध है. बंगाल, झारखंड और ओडिशा के सांस्कृतिक संगम पर स्थित होने के कारण यहां संताली और भूमिज परंपराओं पर आधारित विशिष्ट आदिवासी पहचान आज भी सशक्त रूप से विद्यमान है.
आगामी 2026 विधानसभा चुनावों के संदर्भ में, तृणमूल कांग्रेस बांधवन में लगातार तीसरी जीत दर्ज करने की उम्मीद कर सकती है. लेकिन 2021 के बाद परिस्थितियां काफी बदल चुकी हैं. BJP का मानना है कि अनुसूचित जनजाति मतदाता उसके पक्ष में झुक सकते हैं, विशेषकर 2022 में द्रौपदी मुर्मू को देश की पहली आदिवासी राष्ट्रपति बनाने और 2023 व 2024 में छत्तीसगढ़ और ओडिशा में आदिवासी नेताओं को मुख्यमंत्री पद देने के बाद. यदि BJP का संगठन आदिवासी मतदाताओं को यह भरोसा दिला सके कि वह उनके अधिकारों की सबसे बड़ी संरक्षक है, तो तृणमूल कांग्रेस के लिए स्थिति कठिन हो सकती है. ऐसे में यदि वाम-कांग्रेस गठबंधन भी थोड़ा पुनर्जीवित होता है, तो तृणमूल के लिए 2026 का चुनाव और भी जटिल हो सकता है.
(अजय झा)