एक ऐसा जिला जहां की हवा में अक्सर राजनीतिक तनाव घुला रहता है, वहां आज नौदा का माहौल काफी अलग महसूस हुआ. लगभग 70% मुस्लिम आबादी वाला मुर्शिदाबाद लंबे समय से बंगाल के अल्पसंख्यक वोट बैंक का सबसे कीमती हिस्सा रहा है.
हालांकि, हुमायूं कबीर की 'आम जनता उन्नयन पार्टी' (AJUP) के उभार और असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM के साथ उनके रणनीतिक गठबंधन ने राज्य के चुनावी नक्शे की परतों को हिलाना शुरू कर दिया है.
पिछले साल दिसंबर से हुमायूं कबीर के सफर पर नजर रखते हुए हैं, खासतौर पर बाबरी मस्जिद के पुनर्निर्माण की उनकी पहल के बाद धार्मिक पहचान की राजनीति की ओर उनके झुकाव को देखते हुए. मैं इस गठबंधन की पहली चुनावी रैली को कवर करने मुर्शिदाबाद के केंद्र में लौटा.
मैंने अपनी यात्रा बहरामपुर से शुरू की. शुरुआत में, सड़क का सफर बेहद शांत था. हाईवे पर बेलडांगा से गुजरते समय कोई पोस्टर, कोई काफिला या आने वाले किसी राजनीतिक तूफान का कोई संकेत नहीं दिखा. मुझे खुद इस चर्चा पर शक होने लगा आखिर बेलडांगा, रेजीनगर और नौदा कबीर के सबसे मजबूत गढ़ माने जाते हैं.
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लेकिन जैसे ही मेरा जीपीएस मुझे मुख्य सड़क से हटाकर अंदर ले गया, ये रहस्य सुलझ गया. रैली स्थल की ओर जाने वाले संकरे ग्रामीण रास्तों पर मुझे सड़क किनारे खड़ी दर्जनों बसें मिलीं, जो AJUP के झंडों से सजी थीं. कार्यक्रम स्थल से 20 किलोमीटर दूर भी ये साफ था- समर्थक हाईवे से नहीं आ रहे थे; वो जिले के सुदूर ग्रामीण इलाकों से उमड़ रहे थे.
मैं सुबह 11:15 बजे कार्यक्रम स्थल पर पहुंचा. एक विशाल धान का खेत जिसे विशेष रूप से सभा के लिए खाली किया गया था. शुरू में भीड़ कम थी. एंट्री गेट के पास मुझे दो युवा लड़के मिले जो AJUP का चुनाव चिह्न 'सीटी' बजा रहे थे. उनमें से एक, रहमान, थोड़ा शर्मीला था. उसने कहा, 'हम यहां चाचा हुमायूं और ओवैसी को देखने आए हैं.' उसकी बातों में वही उत्सुकता थी जो शुरुआती भीड़ में साफ दिख रही थी.
ओवैसी का आगमन: राजनीति से ऊपर आस्था
खेत का नजारा तेजी से बदला. एक घंटे के भीतर, शांत धान का खेत समर्थकों के समंदर में तब्दील हो गया और सीटियों की आवाज गूंजने लगी. दोपहर 12:15 बजे जब हुमायूं कबीर पहुंचे, तो जोश बढ़ गया, लेकिन एक रणनीतिक घोषणा के दौरान ये जोश चरम पर पहुंच गया.
ओवैसी आने में देरी कर रहे थे, तभी कबीर ने माइक संभाला और कहा, 'मेरे बड़े भाई ओवैसी साहब, नमाज अदा करने के लिए बेलडांगा की सुरुल मस्जिद में रुके हैं.' भीड़ की प्रतिक्रिया तत्काल थी. इस भीड़ के लिए, राजनीतिक कार्यक्रम के बजाय नमाज को तरजीह देना कोई देरी नहीं थी, बल्कि ये पहचान का एक बयान था. ये किसी भी चुनावी नारे से कहीं ज्यादा प्रभावशाली साबित हुआ,
दोपहर 1:00 बजे जब ओवैसी पहुंचे, तो गर्मी भीषण थी, लेकिन भीड़ डिगी नहीं. प्रेस के लिए आरक्षित 'डी-जोन' पर तुरंत भीड़ ने कब्जा कर लिया. समर्थक सुरक्षा घेरा तोड़कर भीतर घुस आए, हाथों में फोन लिए हैदराबाद के सांसद की एक तस्वीर खींचने को बेताब थे. ओवैसी का भाषण उम्मीद के मुताबिक तीखा और सटीक था.
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TMC और BJP पर ओवैसी का हमला
ओवैसी ने TMC और BJP दोनों पर निशाना साधा, लेकिन उनकी सबसे प्रभावशाली लाइन वो थी जिसने लोगों की दुखती रग पर हाथ रख दिया. उन्होंने कहा, 'मुसलमान अब मेन स्ट्रीम की राजनीतिक पार्टियों के लिए सिर्फ वोट मशीन नहीं रहे.' इसके बाद जो शोर गूंजा, उससे साफ था कि ये भीड़ सिर्फ सुन नहीं रही थी, वो बंगाल की पारंपरिक राजनीति के जाल से बाहर निकलने का रास्ता तलाश रही थी.
रैली के बाद के माहौल ने सत्ताधारी TMC के खिलाफ गहरा गुस्सा जाहिर किया. वहां मौजूद कई लोग पूर्व TMC या कांग्रेस कार्यकर्ता थे जो खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे थे. मिखाइल शेख (हरिहरपाड़ा) ने कहा, 'अब बहुत हो गया. हमें ऐसा कोई चाहिए जो हमारे हक के लिए बोले. मेरा नाम SIR से काट दिया गया. ममता बनर्जी ने वादा किया था कि कोई नाम नहीं कटेगा, लेकिन अब वह हमें दिल्ली जाकर विरोध करने को कहती हैं? हम दिल्ली क्यों जाएं?'
मिथुन मंडल (नौदा) ने कहा, 'हमें बहुत लंबे समय तक सिर्फ वोट बैंक समझा गया है. अब समय आ गया है कि हम ओवैसी और कबीर जैसे नेताओं को चुनें जो वाकई में हमारा प्रतिनिधित्व करें.'
हुमायूं कबीर भरतपुर के एक स्थानीय नेता से राज्य स्तर के महत्वपूर्ण चेहरे में बदल गए हैं. जहां उनके बाबरी मस्जिद की कोशिश ने उन्हें धार्मिक सम्मान दिलाया, वहीं आज की रैली ने साबित कर दिया कि वो उस धार्मिक पूंजी को राजनीतिक ताकत में बदल रहे हैं. हालांकि, आगे की राह मुश्किल है. दो फैक्टर तय करेंगे कि ये गठबंधन 'किंगमेकर' बनेगा या 'वोट काटने वाला'.
अधीर फैक्टर: दिग्गज कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी की मुर्शिदाबाद की लड़ाई में एंट्री ने मामलों को पेचीदा बना दिया है. अगर कांग्रेस का प्रदर्शन मजबूत रहता है, तो ये TMC विरोधी मुस्लिम वोट को बांट सकता है, जिससे AJUP के फायदे कम हो सकते हैं.
TMC का नुकसान: अगर आज की भीड़ कोई संकेत है, तो TMC को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ सकता है. अल्पसंख्यक वोट, जो दक्षिण बंगाल में उनकी ताकत की नींव रहा है, अब उसमें भारी बिखराव के संकेत मिल रहे हैं.
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आज नौदा में बजी सीटियां सिर्फ दिखावे के लिए नहीं थीं, वो स्थापित राजनीतिक व्यवस्था के लिए एक चेतावनी की तरह गूंज रही थीं. क्या AJUP अंतिम विकल्प बनेगा, ये देखना अभी बाकी है, लेकिन मुर्शिदाबाद में मुस्लिम वोटों पर एकाधिकार को आधिकारिक तौर पर चुनौती मिल चुकी है.
तपस सेनगुप्ता