हुमायूं कबीर-ओवैसी की दोस्ती टूटने से किसे फायदा? ममता के लिए संजीवनी बनेगा 'M फैक्टर'

पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वोटों के सहारे राजनीति में जमीन तलाशने उतरे असदुद्दीन ओवैसी और हुमायूं कबीर की दोस्ती टूट गई है. हुमायूं कबीर का वीडियो वायरल होने के बाद ओवैसी ने यह फैसला लिया, लेकिन अब ये ममता बनर्जी के लिए सियासी संजीवनी न बना जाए?

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हुमायूं कबीर से असदुद्दीन ओवैसी ने तोड़ा गठबंधन (Photo-AIMIM) हुमायूं कबीर से असदुद्दीन ओवैसी ने तोड़ा गठबंधन (Photo-AIMIM)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 10 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 1:59 PM IST

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण के वोटिंग की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे सियासी माहौल भी गर्म होता जा रहा है. बंगाल में बाबरी मस्जिद बनाने का ऐलान कर हुमायू कबीर सियासी चर्चा में आए थे. टीएमसी ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया तो हुमायूं कबीर ने अपनी अलग पार्टी बना ली और असदुद्दीन ओवैसी के साथ मिलाकर बंगाल में ममता बनर्जी की बेचैनी बढ़ा दी थी. 

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मुस्लिम वोटों के सहारे बंगाल की राजनीति में किंगमेकर बनने के चले हुमायूं कबीर का एक वायरल वीडियो ने सियासी विवाद खड़ा कर दिया है. सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में हुमायूं कबीर ने ममता बनर्जी को हराने के लिए के बीजेपी से 1000 करोड़ रुपये की मांग करते नजर आ रहे हैं. 

हालांकि, हुमायू कबीर ने वीडियो को एआई वीडियो बताकर खारिज कर दिया है, लेकिन उसके बाद भी असदु्दीन ओवैसी ने हुमायूं कबीर की पार्टी से गठबंधन तोड़ लिया है. ऐसे में सवाल उठता है कि हुमायू से ओवैसी का गठबंधन टूटने का बंगाल चुनाव में किसे फायदा और किसे नुकसान होगा? 

हुमायूं कबीर से ओवैसी ने तोड़ा गठबंधन
पश्चिम बंगाल में 30 फीसदी के करीब मुस्लिम वोटर हैं, जो सत्ता का खेल बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखते हैं. मुस्लिम वोटों के सहारे बंगाल की सियासत में हुमायूं कबीर और असदुद्दीन ओवैसी ने बड़ा उल्टफेर करने के लिए उतरे थे. हुमायूं कबीर ने बाबरी मस्जिद बनाने की बुनियाद रखी तो बिहार के AIMIM के नेता भी शामिल हुए थे. सूबे के मुस्लिमों के बीच  हुमायूं कबीर मुस्लिम चेहरा बनकर उभरे को असदुद्दीन ओवैसी ने उनके सहारे अपनी सियासी नैया पार लगाने के लिए हाथ मिला लिया. 

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बगाल विधानसभा चुनाव के लिए हुमायूं कबीर और ओवैसी की सियासी केमिस्ट्री ने ममता बनर्जी की टेंशन बढ़ा दी थी.हुमायूं कबीर की पार्टी (AJUP) 182 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया तो ओवैसी की पार्टी ने 8 सीटों अपने उम्मीदवार उतारे. हुमायूं कबीर और असदुद्दीन ओवैसी ने मुस्लिमों का विश्वास जीतने के लिए ममता बनर्जी और कांग्रेस को निशाने पर ले रहे थे, लेकिन वोटिंग से पहले ही गेम बदल गया. हुमायूं कबीर के वायरल वीडियो ने सीन ही बदल दिया, जिसके चलते ओवैसी की पार्टी ने गठबंधन तोड़ लिया. 

हुमायूं के वीडियो से क्यों घबराए ओवैसी
असदुद्दीन ओवैसी ने जिस मकसद के लिए हुमायूं कबीर से हाथ मिलाया था, वो वीडियो वायरल होने के बाद फायदा कम नुकसान का सौदा ज्यादा बन गया था. हुमायूं कबीर वीडिया में जिस तरह से बीजेपी के नेता शुभेंदु अधिकारी और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव के संपर्क की बात कर रहे थे. ममता बनर्जी को हराने के लिए मुस्लिम वोटों के काटने का फॉर्मूला बता रहे थे, उससे सिर्फ हुमायूं कबीर ही नहीं बल्कि ओवैसी की सियासत पर भी सवाल खड़े होने लगे थे. ओवैसी पर विपक्ष पहले से ही बीजेपी के साथ मिली भगत का आरोप लगाती रही है औऱ हुमायूं कबीर के वीडियो आने के बाद विपक्ष के मजबूत आधार मिल गया था. 

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वायरल वीडियो को लेकर टीएमसी ने हुमायूं कबीर और ओवैसी को घेरने में जुट गई थी. टीएमसी के तीन बड़े नेताओं ने इस पर प्रेस कॉन्फ्रेंस भी कर दी. वायरल वीडियो में कबीर को कथित तौर पर बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं से अपने संबंध बताते हुए और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को आगामी विधानसभा चुनाव में हराने की कोशिश करने की बात करते हुए सुना जा सकता है. 

टीएमसी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस वीडियो को सार्वजनिक किया और आरोप लगाया कि इसमें कबीर ने बीजेपी के साथ मिलकर करोड़ों रुपये के प्लान के तहत ममता बनर्जी को हराने की बात कही है. इसके चलते ही ओवैसी ने हुमायूं से गठबंधन तोड़ लेना ही बेहतर समझा. इसीलिए AIMIM ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करके हुमायूं कबीर के साथ गठबंधन तोड़ने का ऐलान कर दिया. 

AIMIM ने कहा, 'हुमायूं कबीर के खुलासों ने बंगाल के मुसलमानों की असुरक्षा को उजागर किया है. एआईएमआईएम ऐसे किसी भी बयान का समर्थन नहीं कर सकती, जिससे मुसलमानों की गरिमा पर सवाल उठे. एआईएमआईएम ने कबीर की पार्टी से अपना गठबंधन वापस ले लिया है. बंगाल के मुसलमान सबसे गरीब, उपेक्षित और शोषित समुदायों में से एक हैं. दशकों के धर्मनिरपेक्ष शासन के बावजूद उनके लिए कुछ नहीं किया गया है. किसी भी राज्य में चुनाव लड़ने के संबंध में पार्टी की नीति यही है कि हाशिए पर पड़े समुदायों को एक स्वतंत्र राजनीतिक आवाज मिले. 

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हुमायूं-ओवैसी का गठबंधन टूटने का इम्पैक्ट
बंगाल चुनाव में वोटिंग से ठीक पहले हुमायूं कबीर और असदुद्दीन ओवैसी के गठबंधन टूटने का सियासी असर पड़ सकता है. राज्य में 30 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं, जिसके  बिखराव का खतरा कम हो गयआ है.टीएमसी का सबसे बड़ा डर मुस्लिम वोटों का AIMIM और हुमायूं कबीर के बीच बंटना था, गठबंधन टूटने से यह मोर्चा कमजोर हो गया है.

टीएमसी के वरिष्ठ नेता और मंत्री फिरहाद हाकिम ने कहा कि हुमायूं कबीर बीजेपी के साथ मिलकर अल्पसंख्यक मतदाताओं को गुमराह कर रहे हैं. उन्होंने मुस्लिम समुदाय की भावनाओं के साथ खिलवाड़ न करने की चेतावनी दी और कहा कि यह वीडियो गहरी साजिश को दिखाता है. ऐसे में टीएमसी को मौका मिल गया है ओवैसी और हुमायूं कबीर को घेरने का. टीएमसी ने कहना शुरू कर दिया है कि ओवैसी और कबीर भाजपा की 'B और C टीम' हैं. इससे मुस्लिम मतदाता ममता के पक्ष में 'कंसोलिडेट' (एकजुट) हो सकते हैं. इसका सीधा फायदा ममता बनर्जी को हो सकता है, क्योंकि 2011 से मुस्लिमों का वोट टीएमसी को एकमुश्त मिलता रहा है. 

हुमायूं और ओवैसी की राजनीति पर ग्रहण
बंगाल में त्रिकोणीय चुनावी मुकाबला के संभावना पर भी ग्रहण लग गया है.  ओवैसी और हुमायूं कबीर के एक साथ मिलकर चुनाव लड़ने से 5-10 फीसदी मुस्लिम वोट कट काटते थे, जिसका लाभ सीधे तौर पर बीजेपी को मिलता, लेकिन अब गेम बदल गया है. मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे इलाकों में हुमायूं कबीर का अपना रसूख था, लेकिन इस स्टिंग और ओवैसी के साथ छोड़ने के बाद उनकी छवि 'सौदागर' जैसी बन गई है, जिससे उनका समर्थक बेस डगमगा सकता है.

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ओवैसी बंगाल में एक मजबूत स्थानीय चेहरा (हुमायूं) के कंधे पर सवार होकर पैर जमाना चाहते थे, अकेले चुनाव लड़ने से AIMIM के लिए सीटें जीतना नामुमकिन जैसा हो सकता है, और वे सिर्फ 'वोट कटवा' के ठप्पे तक सीमित रह सकते हैं. पिछले चुनाव में ओवैसी ने अकेले लड़कर अपना सियासी हश्र देख लिया है. इसीलिए हुमायूं कबीर के साथ गठबंधन किया था. 

बंगाल की 294 सीटों में से करीब 100 सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक हैं,. हुमायूं और ओवैसी का गठबंधन टूटना ममता बनर्जी के लिए किसी सियासी 'संजीवनी'से कम नहीं है, लेकिन चुनावी ऊंट किस करवट बैठेगा, यह 4 मई के नतीजे ही बताएंगे. अब मुस्लिम वोटों को साधना टीएमसी के लिए और भी आसान हो गया है, जो लेफ्ट और कांग्रेस के लिए भी सियासी टेंश बढ़ा सकता है?

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