केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के मनमाने फैसलों और नई शिक्षा नीति के नाम पर होने वाले प्रयोगों के खिलाफ अब देश की सबसे बड़ी अदालत ने अपना हंटर चला दिया है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEEP 2020) के तहत कक्षा 9वीं और 10वीं में दो भारतीय भाषाओं सहित तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य करने के सीबीएसई के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में सीधी चुनौती मिल गई है. देश की सर्वोच्च अदालत ने इस संवेदनशील मामले पर दायर जनहित याचिकाओं (PIL) पर कड़ा संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार और सीबीएसई बोर्ड को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है.
सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच सख्त, कहा- 'इस मामले पर विचार करना बेहद जरूरी'
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (CJI) जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की तीन जजों की विशेष पीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सीबीएसई और सरकार को नोटिस जारी कर 4 हफ्ते के भीतर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने का अल्टीमेटम दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि इस नीति और इसके दूरगामी परिणामों पर विचार किया जाना बेहद जरूरी है. शीर्ष अदालत इस महा-सुनवाई को अब आने वाली 15 या 16 जुलाई को आगे बढ़ाएगी. हालांकि, कोर्ट ने इस मामले में फिलहाल त्रिभाषा फॉर्मूले पर कोई अंतरिम रोक नहीं लगाई है, लेकिन बोर्ड की पूरी प्रणाली को कटघरे में ज़रूर खड़ा कर दिया है.
1 जुलाई से लागू होना है नियम
आगामी 1 जुलाई 2026 से कक्षा 9वीं के छात्रों के लिए लागू होने वाले सीबीएसई के इस नए 'त्रिभाषा नियम' के खिलाफ छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों ने मिलकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. याचिकाकर्ताओं का सबसे तीखा और जायज तर्क यह है कि 10वीं की बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी कर रहे मासूम छात्रों पर अचानक दो अतिरिक्त भाषाएं थोप देना सीधे तौर पर उनके ऊपर अनुचित मानसिक दबाव बनाना है.
सीबीएसई की इस नई विवादित नीति के मुताबिक, अब कक्षा 9 और 10 के छात्रों के लिए तीन भाषाएं यानी R1, R2 और R3 पढ़ना अनिवार्य कर दिया गया है. तानाशाही यह है कि इन तीन भाषाओं में से कम से कम दो भाषाएं विशुद्ध रूप से भारतीय मूल की ही होनी चाहिए. कोई भी छात्र विदेशी भाषा का विकल्प तभी चुन सकता है, जब बाकी की दो भाषाएं अनिवार्य रूप से भारतीय हों.
बिना पूछे रातों-रात बदल दिए नियम, 'मनमाना और बोझिल' करार
जनहित याचिका में सीबीएसई के इस रवैए को पूरी तरह से "मनमाना, निरंकुश और बोझिल" बताया गया है. याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट के सामने गंभीर आरोप लगाया है कि बोर्ड ने शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सबसे मुख्य स्तंभों यानी छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों (Stakeholders) से किसी भी प्रकार का उचित परामर्श किए बिना, एसी कमरों में बैठकर रातों-रात इस पूरी प्रक्रिया को बदल डाला. शीर्ष अदालत ने इन याचिकाओं पर तत्काल संज्ञान लेते हुए मामले को विस्तृत सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है, जिससे अब सीबीएसई के आला अधिकारियों के पसीने छूट रहे हैं.
संजय शर्मा