एक तरफ देश के लाखों छात्र हर साल नीट (NEET) और नेट (NET) जैसी परीक्षाओं में पेपर लीक, धांधली, एग्जाम कैंसिलेशन और मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ इन परीक्षाओं को कराने वाली नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) चुपचाप 'करोड़ों के मुनाफे' की तिजोरी पर बैठी है!
संसद की एक हाई-लेवल स्टैंडिंग कमेटी ने NTA की वित्तीय कुंडली खोलकर एक ऐसा चौंकाने वाला खुलासा किया है, जिसने पूरे देश के शिक्षा जगत को हिला दिया है. राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह की अगुवाई वाली संसदीय समिति की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 6 साल में NTA ने परीक्षाओं के आयोजन और छात्रों की फीस से करीब 448 करोड़ रुपये का शुद्ध सरप्लस (मुनाफा) कमाया है.
इस भारी-भरकम कमाई पर गहरी चिंता जताते हुए संसदीय पैनल ने NTA और शिक्षा मंत्रालय को आड़े हाथों लिया है और पूछा है कि जब तिजोरी में इतना पैसा है, तो देश का परीक्षा सिस्टम अब तक 'फूलप्रूफ' क्यों नहीं बन पाया?
3,512 करोड़ की वसूली, खर्च सिर्फ 3,064 करोड़
संसदीय समिति की 381वीं 'एक्शन टेकेन रिपोर्ट' में NTA की बैलेंस शीट का जो ब्योरा सामने आया है, वो आंखें खोलने वाला है. पिछले 6 सालों में NTA ने छात्रों के फॉर्म, फीस और अन्य जरियों से कुल ₹3,512.98 करोड़ बटोरे. इस विशालकाय रकम में से NTA ने देश भर में परीक्षाएं आयोजित करने, सेंटर्स बुक करने और वेंडर्स को भुगतान करने में कुल ₹3,064.77 करोड़ खर्च किए.
मुनाफा कहां गया?
खर्च निकालने के बाद NTA के पास ₹448.21 करोड़ का शुद्ध सरप्लस बचा रहा, यानी हर साल औसतन ₹74.5 करोड़ रुपये नेट प्रॉफिट के तौर पर एजेंसी की तिजोरी में जमा होते रहे. संसदीय कमेटी ने कड़े शब्दों में कहा है कि NTA इस फंड का इस्तेमाल अपने अंदरूनी इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने, आधुनिक तकनीक अपनाने और परीक्षा कराने वाले वेंडर्स (प्राइवेट एजेंसियों) पर सख्त रेगुलेटरी और मॉनिटरिंग सिस्टम बिठाने के लिए करे, न कि इसे बैंक में जमा रखे.
समिति ने इस बात पर गहरा दुख और आक्रोश जताया कि पिछले साल हुए बड़े विवादों और हंगामे के बाद भी देश में परीक्षाओं की शुचिता बहाल नहीं हो सकी है. रिपोर्ट में साफ कहा गया कि शिक्षा मंत्रालय ने इसरो के पूर्व चेयरमैन के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में एक्सपर्ट कमेटी (HLCE) तो बना दी, लेकिन इसके बावजूद देश में पेपर से जुड़ी गड़बड़ियां और धांधलियां लगातार जारी हैं.
बार-बार पेपर लीक होने और परीक्षाएं रद्द होने के कारण देश के करोड़ों युवाओं और छात्रों के बीच भारी बेचैनी (Anxiety) और असुरक्षा का माहौल है. कमेटी ने उच्च शिक्षा विभाग को निर्देश दिया है कि वे राधाकृष्णन कमेटी के सुझावों को जमीन पर उतारने के लिए एक 'टाइम-बाउंड रोडमैप' (समयबद्ध योजना) तुरंत पब्लिश करें.
इस रिपोर्ट में एक और बेहद गंभीर मुद्दा उठाया गया है, जो सीधे तौर पर परीक्षा माफियाओं के सिंडिकेट की पोल खोलता है.
एक राज्य में बैन, दूसरे में ठेका!
कमेटी ने उंगली उठाते हुए कहा कि जो कंपनियां पेपर सेट करने, एग्जाम कराने या कॉपियों के मूल्यांकन में गड़बड़ी के चलते किसी एक राज्य सरकार या संगठन द्वारा 'ब्लैकलिस्ट' (प्रतिबंधित) कर दी जाती हैं, वे चोर दरवाजे से दूसरे राज्यों या परीक्षाओं के ठेके हथिया लेती हैं. संसद ने मांग की है कि ऐसी धोखेबाज फर्मों की एक 'नेशनल ब्लैकलिस्ट' बनाई जाए ताकि उन्हें देश में कहीं भी काम न मिले.
इस पर उच्च शिक्षा विभाग और NTA ने सफाई देते हुए कहा कि वे पेपर सेटिंग और इवैल्यूएशन (मूल्यांकन) का कोर काम आउटसोर्स नहीं करते. उन्होंने दावा किया कि NTA अपनी परीक्षाओं के लिए किसी भी ऐसी फर्म को काम नहीं देता जो पहले से कहीं ब्लैकलिस्टेड हो, और बोली लगाने वाली कंपनियों से इसका बकायदा डिक्लेरेशन लिया जाता है.
आजतक एजुकेशन डेस्क