कंप्यूटर साइंस और AI को छोड़ सिविल इंजीनियरिंग क्यों चुन रहे हैं टॉपर्स? बदला IIT का ट्रेंड

सालों तक आईआईटी का मतलब सिर्फ 'कंप्यूटर साइंस' (CSE) माना जाता था. लेकिन AI के दौर में बदलते करियर और देश में जारी इंफ्रास्ट्रक्चर बूम ने समीकरण बदल दिए हैं. जेईई एडवांस्ड (JEE Advanced) के देश के कुछ टॉप रैंकर्स अब सिविल इंजीनियरिंग को एक नए नजरिए से देख रहे हैं. यह बदलाव भारत के भविष्य के इंजीनियरों की बदलती सोच और दूरदर्शी रणनीति को दर्शाता है.

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भारत के सबसे होनहार दिमाग अब भविष्य को लेकर कैसे सोच रहे हैं? भारत के सबसे होनहार दिमाग अब भविष्य को लेकर कैसे सोच रहे हैं?

अपूर्वा आनंद

  • नई दिल्ली,
  • 22 जून 2026,
  • अपडेटेड 2:58 PM IST

पिछले करीब एक दशक से IIT एडमिशन की कहानी बिल्कुल तय मानी जाती थी. जेईई की टॉप रैंक हासिल करने वाले छात्र आंख मूंदकर कंप्यूटर साइंस के पीछे भागते थे. पैरेंट्स शान से IIT बॉम्बे या IIT दिल्ली में मिली CSE की सीट का जश्न मनाते थे. सोशल मीडिया पर स्टार्टअप्स की सफलता की कहानियां छाई रहती थीं और 'करोड़ प्लस' के प्लेसमेंट पैकेज राष्ट्रीय सुर्खियां बनते थे.

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आईआईटी की ये हेरार्की बिल्कुल सेट थी, यानी पहले कंप्यूटर साइंस, बाकी सब बाद में. इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल और सिविल जैसी कोर ब्रांचों का सम्मान तो था, लेकिन सीएसई के क्रेज के आगे सब फीके थे. इसी दौर में सिविल इंजीनियरिंग, जो कभी भारत की सबसे प्रतिष्ठित ब्रांच मानी जाती थी, छात्रों की प्रेफरेंस लिस्ट में लगातार नीचे खिसकती चली गई. हर किसी ने मान लिया था कि भविष्य सिर्फ 'कोडिंग' का है.

लेकिन आज, आईआईटी सीटों की इस चिर-परिचित होड़ के बीच एक गहरी बहस आकार ले रही है: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस युग में, एक 'फ्यूचर-प्रूफ' इंजीनियरिंग करियर आखिर कैसा दिखता है?

एक तरफ जहां जनरेटिव एआई सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री को नए सिरे से री-शेप कर रहा है और एंट्री-लेवल कोडिंग जॉब्स के भविष्य पर सवाल खड़े कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ भारत दशकों के अपने सबसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर बूम से गुजर रहा है. नए एक्सप्रेसवे, मेट्रो नेटवर्क, हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर, रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स और स्मार्ट सिटी देश का भूगोल बदल रहे हैं. इन दोनों ट्रेंड्स के चौराहे पर एक बेहद हैरान करने वाला बदलाव दिख रहा है, सिविल इंजीनियरिंग एक बार फिर देश के सबसे होनहार जेईई एस्पिरेंट्स को अपनी ओर आकर्षित कर रही है.

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आईआईटी एडमिशंस में कंप्यूटर साइंस आज भी निर्विवाद रूप से राजा है. लेकिन सालों में पहली बार, इंजीनियरिंग करियर को लेकर होने वाली चर्चाओं का रुख बदला है, और यह साल 2026 के एडमिशन सीजन की सबसे दिलचस्प कहानी बनती दिख रही है.

कैसे मिली इस बहस को हवा
आईआईटी एडमिशन के पहले राउंड (JoSAA Round 1) के आंकड़ों ने एक चौंकाने वाला ट्रेंड सामने रखा है. 

आईआईटी बॉम्बे (IIT Bombay) में सिविल इंजीनियरिंग में प्रवेश पाने वाले छात्रों की ओपनिंग रैंक उछलकर 385 पर पहुंच गई, जबकि पिछले साल यह 2,666 थी. वहीं आईआईटी दिल्ली (IIT Delhi) में इससे भी बड़ा बदलाव देखा गया, जहां सिविल की ओपनिंग रैंक 3,030 से सीधे 179 पर आ गई.

आईआईटी रुड़की और आईआईटी भुवनेश्वर के आंकड़ों ने भी साफ संकेत दिए कि इस साल के एडमिशन चक्र में कुछ बहुत ही असामान्य और नया घटित हो रहा है.

बेशक ये आंकड़े कंप्यूटर साइंस से किसी सामूहिक पलायन की ओर इशारा नहीं करते, लेकिन ये यह जरूर बताते हैं कि बड़ी संख्या में टॉपर्स अब उन धारणाओं पर दोबारा विचार कर रहे हैं जिन्हें कभी पत्थर की लकीर माना जाता था. अकादमिक रूप से मजबूत छात्र अब पारंपरिक भेड़चाल के बजाय लॉन्ग-टर्म करियर कैलकुलेशन के आधार पर फैसले ले रहे हैं.

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'शिक्षा नेशन' के सीईओ और फाउंडर डॉ. सौरभ कुमार कहते हैं कि JoSAA 2026 के राउंड 1 का डेटा एक साफ कहानी कहता है. आईआईटी बॉम्बे में सीएसई करीब 65 ऑल इंडिया रैंक (AIR) पर बंद हो गई, जबकि सिविल 4,300 के पार बंद हुई. टॉप-100 रैंकर्स में से लगभग हर कोई अब भी कंप्यूटर साइंस ही चुन रहा है. इसलिए हम सिलिकॉन (सॉफ्टवेयर) से सीमेंट की ओर कोई सामूहिक पलायन नहीं देख रहे हैं. असली दिलचस्प कहानी यह है कि टॉप 100 रैंक के बाद के छात्र अब भेड़चाल के बजाय बहुत सोच-समझकर फैसले ले रहे हैं.

यही बारीक अंतर इस साल की सबसे बड़ी यूएसपी है. साल 2026 की कहानी यह नहीं है कि कंप्यूटर साइंस ने अपना ताज खो दिया है, बल्कि कहानी यह है कि छात्रों ने अब भविष्य को लेकर अधिक कठिन और व्यावहारिक सवाल पूछने शुरू कर दिए हैं.

  AI ने बदलना शुरू किया छात्रों का मन?
सालों तक कंप्यूटर साइंस के साथ एक किस्म की 'निश्चितता और गारंटी' का दौर जुड़ा था. फॉर्मूला सीधा था कि सीएसई की सीट पक्की करो, बूम पर चल रही सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री में ग्रेजुएट बनो और देश के सबसे हाई-पेइंग जॉब्स तक पहुंच जाओ. लेकिन अब वह निश्चितता गायब हो रही है.

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जनरेटिव एआई (AI) के तेजी से बढ़ते कदम इस इक्वेशन में एक नया वेरिएबल बनकर आए हैं. कोड लिखने, सॉफ्टवेयर को डीबग करने और रूटीन प्रोग्रामिंग टास्क को ऑटोमेट करने में सक्षम एआई टूल्स ने छात्रों को उस सवाल के सामने ला खड़ा किया है, जो कुछ साल पहले तक वजूद में ही नहीं था, 'क्या होगा जब मशीनें वो काम खुद करने लगेंगी जो कल तक जूनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर किया करते थे?'

डॉ. सौरभ कुमार आगे जोड़ते हैं कि एआई बिल्कुल उसी एंट्री-लेवल कोडिंग वर्क को ऑटोमेट कर रहा है जिसके दम पर सीएसई को करियर की पक्की गारंटी वाली टिकट माना जाता था. पिछले एक दशक में पहली बार, इस धारणा पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं कि सीएसई स्वचालित रूप से करियर की आजीवन सुरक्षा की गारंटी देता है.

आईटी सेक्टर की नियुक्तियों में हालिया उतार-चढ़ाव ने इन चिंताओं को और बढ़ा दिया है. सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री बेशक बहुत बड़ी है और बेहतरीन मौके देती रहेगी, लेकिन छात्र अब यह समझ चुके हैं कि आगे की राह उतनी सीधी और सपाट नहीं है जितनी पहले दिखती थी. अब लड़ाई सिर्फ शुरुआती सैलरी की नहीं, बल्कि लॉन्ग-टर्म रेलेवेंस की है.

'दुनिया का सबसे बड़ा कंस्ट्रक्शन साइट' बना भारत
एक तरफ जहां टेक करियर बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ भारत की इंफ्रास्ट्रक्चर स्टोरी अपने सबसे स्वर्णिम और निर्णायक दौर में प्रवेश कर चुकी है. देश इस वक्त हाईवे, मेट्रो रेल, लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर, एयरपोर्ट्स, रिन्यूएबल एनर्जी और स्मार्ट सिटी प्रोग्राम्स में अरबों का निवेश कर रहा है. दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे से लेकर हर शहर में बिछते मेट्रो नेटवर्क और ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर गवाह हैं कि इस पैमाने का निर्माण देश के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ.

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एक सिविल इंजीनियर के लिए इसका सीधा मतलब है अपार अवसर.

एडटेक कंपनी 'टीमलीज एडटेक' के फाउंडर और सीईओ शांतनु रूज कहते हैं कि भारत का इंफ्रास्ट्रक्चर पुश कोर इंजीनियरिंग करियर को एक मजबूत विजिबिलिटी दे रहा है. छात्रों को अच्छी तरह पता है कि एआई एंट्री-लेवल टेक रोल्स को बदल रहा है, जबकि फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर, सस्टेनेबिलिटी, शहरीकरण और पब्लिक इन्वेस्टमेंट ऐसे क्षेत्र हैं जो आने वाले कई दशकों तक डिमांड में रहने वाले हैं.

इसके साथ ही सिविल इंजीनियरिंग की पुरानी छवि भी बदल रही है. आज का सिविल इंजीनियर सिर्फ सीमेंट, कंक्रीट और स्टील के बीच काम नहीं करता. आज वे डेटा एनालिटिक्स, डिजिटल ट्विंस, जियोग्राफिक इंफॉर्मेशन सिस्टम (GIS), सस्टेनेबिलिटी मॉडल्स और एआई-संचालित प्लानिंग टूल्स का उतना ही इस्तेमाल करते हैं. आज यह फील्ड कोर इंजीनियरिंग, टेक्नोलॉजी और एनवायर्नमेंटल साइंस का एक बेहतरीन फ्यूजन बन चुकी है.

IIT के क्लासरूम्स में भी बदली सिविल इंजीनियरिंग
सिविल इंजीनियरिंग के प्रति इस दोबारा जागते क्रेज की एक बड़ी वजह यह भी है कि खुद आईआईटी के भीतर इसकी पढ़ाई का तरीका पूरी तरह मॉडर्नाइज (आधुनिक) हो चुका है. 

आईआईटी बॉम्बे (IIT Bombay): यहां सिविल इंजीनियरिंग के छात्र अपने 'सेंटर फॉर स्टडीज इन रिसोर्सेज इंजीनियरिंग' (CSRE) के जरिए 'मशीन लर्निंग फॉर रिमोट सेंसिंग' जैसे एडवांस कोर्स पढ़ रहे हैं, जो इंफ्रास्ट्रक्चर और एआई के मिलन को दिखाता है.

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आईआईटी हैदराबाद (IIT Hyderabad): यहां छात्र 'रिमोट सेंसिंग एंड जीआईएस एप्लीकेशंस' के साथ-साथ 'स्मार्ट मोबिलिटी' जैसे भविष्य के ट्रांसपोर्टेशन सिस्टम्स पर काम कर रहे हैं.

ये बदलाव साफ करते हैं कि सिविल अब सिर्फ कंस्ट्रक्शन साइट्स तक सीमित नहीं है. 21वीं सदी की जटिल इंफ्रास्ट्रक्चर चुनौतियों से निपटने के लिए अब इसमें डेटा साइंस, एआई और अर्बन प्लानिंग को शामिल कर लिया गया है. जैसे-जैसे देश के इंफ्रास्ट्रक्चर स्मार्ट और ग्रीन हो रहे हैं, कोर इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी के बीच की दूरी लगातार धुंधली होती जा रही है.

आज के 40 लाख या 40 साल की प्रासंगिकता?
पिछले एक दशक में, ब्रांच चुनने का पूरा गणित अक्सर केवल एक ही आंकड़े के इर्द-गिर्द घूमता था यानी 'प्लेसमेंट पैकेज'. लेकिन अब छात्र इस शॉर्ट-टर्म कैलकुलेशन से आगे का सोच रहे हैं.

आज भी टॉप आईआईटी के सीएसई ग्रेजुएट्स सालाना 20 से 40 लाख रुपये (और अंतरराष्ट्रीय ऑफर्स में इससे कहीं ज्यादा) का पैकेज आसानी से हासिल कर लेते हैं. इसके मुकाबले सिविल इंजीनियरिंग के ग्रेजुएट्स का शुरुआती एवरेज पैकेज प्रमुख आईआईटी में लगभग 8 लाख रुपये सालाना से शुरू होता है.

इसके बावजूद, छात्र अब एक बड़े ट्रेड-ऑफ (नफा-नुकसान) का मूल्यांकन कर रहे हैं. टेक करियर असाधारण गति से चलते हैं, जहां प्रोडक्ट साइकिल चंद महीनों में बदल जाते हैं और स्किल्स आउटडेटेड हो जाती हैं. इसके विपरीत, इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स अक्सर दशकों तक चलते हैं. रेलवे, जल प्रबंधन और लोक निर्माण जैसे सरकारी समर्थन वाले क्षेत्रों का करियर ग्राफ एक अलग तरह की दीर्घकालिक स्थिरता प्रदान करता है.

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IIT रुड़की के फैकल्टी इन-चार्ज (प्लेसमेंट) प्रोफेसर विवेक पंचोली के मुताबिक ब्रांचों का यह चयन करियर के अवसरों को लेकर बदलती सोच को दर्शाता है. छात्र अब तात्कालिक सैलरी से आगे बढ़कर लॉन्ग-टर्म करियर स्कोप, रिसर्च की संभावनाएं, हायर स्टडीज और मैन्युफैक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन, FMCG और सस्टेनेबिलिटी जैसे कोर सेक्टर्स में ग्रोथ पोटेंशियल को देख रहे हैं. प्लेसमेंट ट्रेंड्स सिर्फ एक फैक्टर हैं, निर्णय लेने का एकमात्र आधार नहीं.

इसके साथ ही, क्लाइमेट चेंज से जुड़े करियर विकल्पों ने भी कोर ब्रांचेज का आकर्षण बढ़ाया है. एनवायर्नमेंटल इंजीनियरिंग, सस्टेनेबिलिटी और वॉटर रिसोर्स मैनेजमेंट आज वैश्विक स्तर पर सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र बनकर उभरे हैं.

IIT का 'ब्रांड नेम' फिर पड़ा भारी
एक और सूक्ष्म लेकिन बड़ा बदलाव छात्रों की 'संस्थान बनाम ब्रांच' की चॉइस में दिख रहा है. कुछ साल पहले तक, कई छात्र नए IIT  में कंप्यूटर साइंस (CSE) को पुराने और स्थापित IIT की कोर ब्रांचों (जैसे सिविल या मैकेनिकल) के ऊपर चुन लेते थे. लेकिन अब यह ट्रेंड पलट रहा है.

विशेषज्ञों का कहना है कि छात्र अब नए IIT में सीएसई लेने के बजाय आईआईटी बॉम्बे, दिल्ली या मद्रास जैसे टॉप संस्थानों में सिविल इंजीनियरिंग चुनना ज्यादा पसंद कर रहे हैं, क्योंकि वे वहां के इकोसिस्टम, एलुमनाई नेटवर्क, रिसर्च के अवसरों और पीयर ग्रुप को ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं.

डॉ. सौरभ कुमार बताते हैं कि ऑल इंडिया रैंक 2,000 से 15,000 के बीच वाले ब्रैकेट में असली कहानी छिपी है. इस रेंज के छात्र अब नए IIT में CSE की सीट छोड़ने का हौसला दिखा रहे हैं और टॉप-3 आईआईटी में कोर ब्रांचेज चुन रहे हैं. वे केवल 'ब्रांच लेबल' के बजाय संस्थान की विरासत और पीयर नेटवर्क को ज्यादा वैल्यू दे रहे हैं.

यह सिर्फ भारत नहीं, एक ग्लोबल ट्रेंड है
कोर इंजीनियरिंग के प्रति दोबारा जगता यह अनुराग सिर्फ भारत की कहानी नहीं है, बल्कि दुनिया भर में ऐसा ही ट्रेंड देखा जा रहा है:

अमेरिका (USA): अपने 'इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट एंड जॉब्स एक्ट' के जरिए अमेरिका दशकों का सबसे बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश कर रहा है.

यूरोप (Europe): यूरोपियन 'ग्रीन डील' के तहत सस्टेनेबल ट्रांसपोर्टेशन और क्लाइमेट-रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी खर्च किया जा रहा है.

चीन (China): चीन के इंफ्रा बूम ने इंजीनियरों की एक पूरी पीढ़ी तैयार की जिसने दुनिया का सबसे बड़ा हाई-स्पीड रेल नेटवर्क और दर्जनों शहरों में मेट्रो सिस्टम खड़े कर दिए.

सबक बिल्कुल साफ है, जब कोई देश अपने फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी निवेश करता है, तो इंजीनियरिंग टैलेंट की डिमांड स्वतः उसके पीछे-पीछे आती है. भारत की मौजूदा विकास यात्रा भी इसी दिशा में आगे बढ़ रही है.

शुरुआती संकेत या किसी बड़े बदलाव की शुरुआत?
विशेषज्ञ अभी इसे एक स्थायी या फिक्स ट्रेंड घोषित करने में थोड़ी सावधानी बरत रहे हैं. प्रोफेसर विवेक पंचोली कहते हैं, "इसे एक तय ट्रेंड के बजाय छात्रों की बदलती प्राथमिकताओं के रूप में देखा जाना चाहिए. हर एडमिशन चक्र प्राथमिकताओं का एक मिलाजुला रूप होता है."

शांतनु रूज भी इससे इत्तेफाक रखते हैं, "इसे फिलहाल एक 'शुरुआती सिग्नल' मानना ही बेहतर होगा. एक या दो एडमिशन साइकल मीडिया नैरेटिव या तात्कालिक टेक हायरिंग की खबरों से प्रभावित हो सकते हैं. लेकिन अगर आईआईटी इसी तरह कोर ब्रांचेज को एआई, एनालिटिक्स और सस्टेनेबिलिटी के साथ मॉडर्नाइज करते रहे, तो आने वाले समय में बहस 'कोर वर्सेस टेक' की नहीं, बल्कि 'टेक्नोलॉजी से संचालित कोर इंजीनियरिंग' की होगी."
 

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